कौन थीं अहिल्याबाई होलकर? जिनके नाम पर यूपी में 60+ महिलाओं को मिली उम्रभर मुफ्त बस यात्रा
अहिल्याबाई होलकर ने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया था- भूखों के लिए खाना, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, प्यासों के लिए कुएं और समाज के ल…

सौजन्य से:- aajtak.in
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अहिल्याबाई होलकर ने सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया था- भूखों के लिए खाना, यात्रियों के लिए धर्मशालाएं, प्यासों के लिए कुएं और समाज के लिए घाट. अब उत्तर प्रदेश में उनके नाम पर 60 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं को आजीवन मुफ्त बस यात्रा का अधिकार दिया जा रहा है.
लखनऊ की एक कैबिनेट बैठक ने इतिहास की एक असाधारण महिला शासक को आज के जनजीवन से जोड़ दिया है. उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने लोकमाता अहिल्याबाई मातृशक्ति योजना को मंजूरी दी है. इस योजना के तहत 60 साल या उससे ज्यादा उम्र की महिलाएं UPSRTC की सभी बसों में जिंदगीभर मुफ्त यात्रा कर सकेंगी.
मुफ्त बस यात्रा के लिए आधार कार्ड या मतदाता पहचान-पत्र मान्य होगा. आशंका है कि एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं को इसका लाभ मिल सकता है.
ये सिर्फ बस का किराया माफ करने का फैसला नहीं है. ये उस लोकमाता की स्मृति में लिया गया फैसला है, जिसने करीब ढाई सौ साल पहले शासन को जनता के जीवन से जोड़ा था.
एक विधवा जिसने सत्ता को चुनौती दी
अहिल्याबाई होलकर का जन्म 1725 में महाराष्ट्र के चोंडी गांव में हुआ था. कम उम्र में उनका विवाह खंडेराव होलकर से हुआ, जो मालवा के प्रभावशाली होलकर परिवार के उत्तराधिकारी थे. लेकिन उनका जीवन लगातार त्रासदियों से भरा रहा. 1754 में पति खंडेराव की युद्ध में मौत हो गई. 1766 में उनके ससुर और मार्गदर्शक मल्हारराव होलकर का निधन हो गया. इसके बाद उनके पुत्र मालेराव की भी असमय मृत्यु हो गई.
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ये वो दौर था जब एक विधवा महिला को आसानी से परदे के पीछे धकेला जा सकता था. दरबार में उनके अधिकार को चुनौती दी गई. मंत्री गंगाधर यशवंत चंद्रचूड़ ने दत्तक उत्तराधिकारी लेने का सुझाव दिया, जबकि रघोबा दादा का समर्थन भी उनके विरोधियों को मिल रहा था.
लेकिन अहिल्याबाई ने सत्ता की डोर किसी और के हाथ में देने से इनकार कर दिया. प्रो. एन. एन. नागराले के लेख 'Ahilyabai and Her Benevolent Administration' के मुताबिक, उन्होंने राजनीतिक दबाव और दरबारी षड्यंत्रों का सामना किया, पेशवा माधवराव से अपने उत्तराधिकार की मान्यता हासिल की और खुद प्रशासन की बागडोर संभाली. उन्होंने तुकोजी होलकर को सेना की जिम्मेदारी सौंपी, लेकिन मालवा के नागरिक प्रशासन और जनकल्याण की कमान अपने हाथों में रखी.
1767 से 1795 तक उनका शासन सिर्फ एक महिला शासक का शासन नहीं था. वो न्याय, साहस और जनसेवा की ऐसी मिसाल बना, जिसकी चर्चा आज भी भारत के सार्वजनिक जीवन में होती है.
'आशीर्वाद भी, अग्नि भी'
अहिल्याबाई को सिर्फ धार्मिक और दानशील रानी मानना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा. वो दूरदर्शी प्रशासक, निर्णायक नेता और जरूरत पड़ने पर कठोर राजनीतिक शक्ति भी थीं. नागराले के लेख में मराठा राजनेता नाना फडणवीस का जिक्र आता है.
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उन्होंने अहिल्याबाई को महिलाओं में ऐसी शक्ति बताया जो 'आशीर्वाद भी दे सकती है और जला भी सकती है.' नाना फडणवीस के मुताबिक, लोग उनके धार्मिक आचरण और तपस्या की चर्चा सुनते थे, लेकिन उनकी बहादुरी और राजनीतिक उद्यम ने सभी को हैरान कर दिया. उन्होंने कहा कि देवी की दूरदृष्टि और त्वरित निर्णय क्षमता की बराबरी कोई नहीं कर सकता.
हैदराबाद के निजाम के बारे में भी लिखा गया है कि उन्होंने कहा था. समकालीन शासकों में कोई भी देवी की बराबरी नहीं कर सकता. उनके मुताबिक, अहिल्याबाई ने मल्हारराव होलकर की संचित संपदा का सबसे बेहतरीन इस्तेमाल किया और अपने तन-मन-धन को लोकहित के लिए समर्पित कर दिया.
महाराष्ट्र के कवि मोरोपंत ने उन्हें 'गुणों का दुर्लभ संगम' कहा और उनकी तुलना गंगा से की.
वहीं, अंग्रेज अधिकारी और इतिहासकार सर जॉन माल्कम ने अहिल्याबाई को ऐसी विलक्षण शासक बताया जिसमें विनम्रता, गहरी आस्था, सहिष्णुता, नैतिक अनुशासन और लोगों की कमजोरियों को लेकर उदारता एक साथ मौजूद थी. मालवा की लोकस्मृति में वो सिर्फ रानी नहीं रहीं- उन्हें देवी का अवतार माना गया.
जब दान नहीं, शासन की नीति बना जनकल्याण
अहिल्याबाई की असली महानता सिर्फ उनके मंदिरों या धार्मिक पहचान में नहीं है. उनकी महानता इस बात में है कि उन्होंने जनकल्याण को शासन की व्यवस्था बनाया.
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अमृत राज और डॉ. अनिल कुमार के 2024 के शोधपत्र 'Philanthropy, Governance, And Public Welfare In The Reign Of Ahilya Bai Holkar: An Analytical Study Of Khasgi Sanad (1771)', जो Educational Administration: Theory and Practice में प्रकाशित हुआ, में 1771 के खासगी सनद के आय-व्यय का अध्ययन किया गया है.
इस लेखा-जोखा में अहिल्याबाई के प्रशासन की प्राथमिकताएं साफ दिखती हैं:
- गेहूं, चावल, दाल और अन्य खाद्य सामग्री की खरीद पर 55,516 रुपए का खर्च.
- जरूरतमंदों के लिए अल्म-हाउसों में भोजन पर 31,300 रुपए का खर्च
- श्रावण मास के अनुष्ठानों और भोजन वितरण के लिए 30,000 रुपए का खर्च
- गया, प्रयाग, काशी, अयोध्या, द्वारका, हरिद्वार और बद्री-केदार जैसे तीर्थों के मंदिरों पर 31,030 रुपए का खर्च
- बगीचों और सार्वजनिक हरित स्थलों के रखरखाव के लिए 29,500 रुपए का खर्च
- गोशालाओं, पशुओं के चारे, मंदिर कर्मचारियों, वार्षिक दान और अनाथों की सहायता के लिए अलग प्रावधान
ये रकम 18वीं सदी की हैं, इन्हें आज की मुद्रा में बदलना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा. लेकिन इनके पीछे की सोच साफ है- राजकोष का इस्तेमाल भूख मिटाने, आश्रय देने, जल-सुविधा बनाने, यात्रियों को सहारा देने और सामाजिक संस्थाओं को मजबूत करने के लिए होना चाहिए.
यह भी पढ़ें: बस दिखाना होगा एडमिट कार्ड... फिर NEET के लिए मिल जाएगी मुफ्त बस सुविधा
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अहिल्याबाई ने काशी से लेकर केदारनाथ, गया से लेकर सोमनाथ और महेश्वर से लेकर हरिद्वार तक मंदिर, घाट, कुएं, तालाब और धर्मशालाएं बनवाईं या उनका पुनर्निर्माण कराया. उनकी इमारतें सिर्फ आस्था की पहचान नहीं थीं, वो यात्रियों, तीर्थयात्रियों, गरीबों और स्थानीय समाज के लिए उपयोगी जन-सुविधाएं थीं.
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