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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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वाराणसी में इस मानसून 33% कम हुई बारिश:15 साल में पहली बार जून में इतना कम गिरा पानी, मौसम वैज्ञानिक ने बताए 4 कारण
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सावन-भादो में जहां काशी की गलियां बारिश से सराबोर रहती थीं, वहीं इस बार मानसून ने लोगों को तरसा दिया है। एक जून से 15 अगस्त तक वाराणसी में करीब 329 मिमी बारिश दर्ज की गई, जबकि इस अवधि में सामान्य वर्षा 492.2 मिमी के आसपास होनी चाहिए थी। यानी बारिश में करीब 33 फीसदी की कमी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे धान, मक्का और गन्ने की फसलों पर खराब असर पड़ेगा। किसानों को सिंचाई के लिए निजी संसाधनों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है, जिससे लागत बढ़ जाएगी।
जून में ही दिख गया था कमजोर मानसून का संकेत
इस साल मानसून की कमजोरी का संकेत जून में ही मिल गया था। एक से 30 जून के बीच वाराणसी में महज 6.8 मिमी बारिश रिकॉर्ड हुई। यह पिछले करीब 15 वर्षों में जून महीने का सबसे कम आंकड़ा बताया गया। मानसून की शुरुआत में ही बारिश की गतिविधियां कमजोर रहने से वर्षा का घाटा लगातार बढ़ता गया। जुलाई के अंत तक कई इलाकों में बारिश की कमी काफी अधिक थी। बाद में कुछ सक्रिय मौसमी प्रणालियों के कारण बारिश हुई और घाटा कम हुआ।
1 जून के 15 अगस्त के बीच कम बारिश होने का कारण
एल नीनो का प्रभाव - 2026 के मानसून सीजन में प्रशांत महासागर में 'एल नीनो' की स्थिति मजबूत हुई है। एल नीनो के कारण भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर का पानी गर्म हो जाता है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप की ओर आने वाली मानसून पवनों की नमी खींच जाती है और मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं।
वेस्टलीं जेट स्ट्रीम और वायुमंडलीय असंतुलन - मानसून के शुरूआती दौर (जून से जुलाई) में ऊपरी वायुमंडल में वेस्टालीं जेट स्ट्रीम का झुकाव असामान्य रूप से दक्षिण की ओर रहा। इस कारण पूर्व की ओर से आने वाली मानसूनी हवाएं सही ढंग से स्थापित नहीं हो सकीं। नमी होने के बावजूद हवा के दबाव और टकराव के चलते वर्षा करने वाले बादलों का निर्माण नहीं हो पाया।
मॉनसून ट्रफ का खिसकना- गंगा के मैदानी भागों (जिसमें वाराणसी शामिल है) में अच्छी बारिश तब होती है जब 'मानसून ट्रफ' मध्य भारत से उत्तर भारत की ओर स्थिर रहती है। 2026 के इस सीजन में मानसून ट्रफ लंबे समय तक या तो दक्षिण भारत /हिमालय की तलहटी की तरफ खिसकी रही या निष्क्रिय रही, जिससे उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों में लंबे समय तक सूखा स्पेल बना रहा।
बंगाली की खाड़ी में कम दबाव के तंत्र का कमजोर होना- वाराणसी और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ज्यादातर मानसूनी बारिश बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव के क्षेत्रो से होती है। इस बार खाड़ी में बनने वाले सिस्टम या तो कम बने या फिर वे ओड़िशा और मध्य प्रदेश की ओर मुड़ गए, जिससे पूर्वाचल तक पर्याप्त नमी नहीं पहुँच पाई।
2025 से क्यों अलग है 2026 का मानसून?
2025 में 15 अगस्त तक वाराणसी में बारिश का वितरण अपेक्षाकृत नियमित रहा था और कुल वर्षा 500 मिमी का आंकड़ा पार कर गई थी। इसके विपरीत 2026 में जून लगभग सूखा रहा, जुलाई में भी बारिश का वितरण असमान रहा और अगस्त में अचानक तेज बारिश के दौर आए। यही वजह है कि इस बार लोगों को मानसून की मौजूदगी के बावजूद लगातार बारिश का अनुभव कम हुआ है। बारिश की कुल मात्रा के साथ उसका वितरण भी बेहद महत्वपूर्ण है।
उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए सलाह
उत्तर प्रदेश में खेती पूरी तरह मानसूनी बारिश पर टिकी होती है। धान, मक्का और गन्ने जैसी मुख्य खरीफ फसलों को सही समय पर और भरपूर पानी की जरूरत होती है, लेकिन मौसम विभाग के ताजा अनुमानों ने किसानों की धड़कनें बढ़ा दी हैं। जानकारों का मानना है कि अगर इस बार बादल कम बरसते हैं, तो किसानों को अपनी फसलों को बचाने के लिए निजी संसाधनों जैसे ट्यूबवेल और नहरों का सहारा लेना पड़ेगा।
इससे न केवल मेहनत बढ़ेगी, बल्कि डीजल और बिजली के भारी खर्च के कारण खेती की लागत भी काफी ज्यादा हो जाएगी। इसे देखते हुए कृषि विशेषज्ञों ने सलाह दी है कि किसान अब ऐसी फसलों को प्राथमिकता दें जिन्हें कम पानी की जरूरत होती है. साथ ही, सिंचाई की आधुनिक तकनीकों को अपनाकर इस मुश्किल समय में होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है।
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