यूपी में क्या है मदरसों की शिक्षा का भविष्य
यूपी में क्या है मदरसों की शिक्षा का भविष्य ७ अगस्त २०२६यूपी कैबिनेट ने फैसला किया है कि राज्य मदरसा बोर्ड अब कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियां नहीं देंगे. सरकार ने ये फैसला क्यों लिया और इस फैसले के बाद यूपी…

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यूपी में क्या है मदरसों की शिक्षा का भविष्य
७ अगस्त २०२६यूपी कैबिनेट ने फैसला किया है कि राज्य मदरसा बोर्ड अब कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियां नहीं देंगे. सरकार ने ये फैसला क्यों लिया और इस फैसले के बाद यूपी में क्या होगा मदरसा शिक्षा का भविष्य?
सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में साफ कर दिया था कि उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा बोर्ड स्नातक और परास्नातक स्तर की डिग्रियां नहीं दे सकता. लगभग दो साल बाद अब योगी सरकार ने उस फैसले को कानून का हिस्सा बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम, 2004 में संशोधन को मंजूरी दे दी है. इसके बाद मदरसा बोर्ड कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा की डिग्रियां नहीं देगा. फाजिल और कामिल मदरसे की कॉलेज स्तर की डिग्रियां हैं.
सवाल सिर्फ इतना नहीं कि कामिल और फाजिल की डिग्रियां क्यों खत्म हुईं बल्कि बड़ा सवाल यह है कि क्या उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा अब सिर्फ स्कूली स्तर तक सीमित हो जाएगी? और ऐसे समय में, जब मदरसों में दाखिले पहले ही घट रहे हैं, इस बदलाव का असर किस पर पड़ेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने मदरसों पर क्या कहा था?
मार्च 2024 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक घोषित कर दिया था. इस फैसले के खिलाफ मदरसा प्रबंधकों, शिक्षकों और कुछ संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का फैसला पलटते हुए अधिनियम को बहाल कर दिया, हालांकि एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की.
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अदालत ने कहा कि कामिल और फाजिल जैसी उच्च शिक्षा स्तर की डिग्रियां मदरसा बोर्ड के दायरे में नहीं आ सकतीं क्योंकि उच्च शिक्षा का नियमन विश्वविद्यालयों और संबंधित वैधानिक संस्थाओं के अधिकार क्षेत्र में आता है. चूंकि राज्य मदरसा बोर्ड विश्वविद्यालय नहीं है, इसलिए वह उच्च शिक्षा की डिग्री नहीं दे सकता. यानी सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा शिक्षा को समाप्त नहीं किया, बल्कि उसकी सीमा तय कर दी.
यूपी के अल्पसंख्यक कल्याण राज्य मंत्री दानिश अंसारी ने मीडिया को बताया, "अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय के तहत मदरसा बोर्ड को सुप्रीम कोर्ट से जो निर्देश मिले थे कि मदरसा बोर्ड की यूजी-पीजी की डिग्री को किसी यूनिवर्सिटी से संबद्ध करके मुस्लिम समाज के छात्रों के उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित किया जाए. तो उस दिशा में योगी सरकार पूरी संजीदगी से काम कर रही है.”
सुप्रीम कोर्ट का फैसला नवंबर 2024 में आया था, लेकिन संशोधन को मंजूरी 2026 में मिली. सरकार का तर्क है कि कानून में बदलाव, वैकल्पिक व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की वजह से समय लगा. इस दौरान कामिल और फाजिल कोर्सों में नए दाखिले भी रुके रहे.
मुस्लिम धर्मगुरु और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खालिद रशीद फिरंगीमहली कहते हैं कि इस फैसले की वजह से छात्रों का भविष्य खराब ना हो, इसके लिए सरकार को कोई कदम उठाना चाहिए.
डीडब्ल्यू से बातचीत में फिरंगीमहली कहते हैं, "बारहवीं तक की पढ़ाई का मदरसों का पाठ्यक्रम भी वही है जो अन्य स्कूलों में है. इसलिए मदरसों की डिग्री को भी मान्य बनाने का कोई तरीका सरकार को निकालना चाहिए ताकि छात्रों का भविष्य खराब ना हो. मदरसों को लेकर बेबुनियाद बातें करने वाले मदरसों के बारे में नहीं जानते हैं. देश की आजादी में मदरसों का क्या योगदान रहा है, ये सब जानते हैं.”
मदरसों में घटते दाखिले और अनिश्चितता
उत्तर प्रदेश में हजारों मान्यता प्राप्त मदरसे हैं और लाखों छात्र इनमें पढ़ते हैं लेकिन शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मदरसों के सामने कई नई चुनौतियां उभरी हैं. मदरसा प्रबंधन से जुड़े लोग कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में दाखिलों में कमी आई है, हालांकि राज्य सरकार ने इस पर कोई समेकित आधिकारिक आंकड़ा जारी नहीं किया है.
साल 2022 में हुए एक सर्वे में यूपी में आठ हजार से ज्यादा मदरसे गैर-मान्यता प्राप्त पाए गए थे. बाद में एसआईटी ने विदेशी फंडिंग के आधार पर कई मदरसों की जांच की और कार्रवाई की सिफारिशें कीं. बड़ी संख्या में मदरसों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई है. सैकड़ों मदरसों की मान्यता भी समाप्त की गई है.
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद राज्य के मदरसों की कानूनी स्थिति पर विवाद हुआ था, जिस पर बाद में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाते हुए मदरसों को राहत दी थी.
यूपी में कितने मदरसे हैं
मदरसा शिक्षा बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक, यूपी में कुल मान्यता प्राप्त मदरसों की संख्या सोलह हजार है. इनमें 558 मदरसे ऐसे हैं जो पूरी तरह से राज्य सरकार के अनुदान से चलते हैं. मान्यता प्राप्त और गैर मान्यता प्राप्त मदरसों की कुल संख्या 25 हजार से ज्यादा है.
लखनऊ स्थित सामाजिक-धार्मिक संस्थाम अंजुमन इस्लाहुल मुसलमीन के संयुक्त सचिव और मदरसा बोर्ड से जुड़े रहे सैयद बिलाल नूरानी कहते हैं कि कामिल और फाजिल डिग्रियों को अवैध करने की बात सुप्रीम कोर्ट ने जरूर कही है लेकिन मौजूदा सरकार का रुख भी मदरसों को लेकर कुछ ज्यादा ही आक्रामक है.
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डीडब्ल्यू से बातचीत में बिलाल नूरानी कहते हैं, "सरकारी सख्ती की वजह से मदरसों की संख्या में भी और वहां पढ़ने वाले छात्रों की संख्या में भी गिरावट आई है. हालांकि यह भी सही है कि बहुत से मदरसे वालों ने फर्जीवाड़ा भी खूब किया है लेकिन कहते हैं ना कि गेहूं के साथ घुन भी पिसता है. तो उसी में अच्छे मदरसे भी पिस रहे हैं. लेकिन बहुत से मदरसे अच्छे हैं और बहुत अच्छी तालीम दे रहे हैं. सरकार को कम से कम यह स्पष्ट करना चाहिए कि कामिल और फाजिल पढ़ रहे छात्रों का भविष्य क्या होगा.”
कामिल-फाजिल बंद होने से क्या असर होगा?
जानकारों का कहना है कि कामिल-फाजिल कोर्स बंद होने से मदरसा बोर्ड की भूमिका अब माध्यमिक स्तर तक सीमित हो जाएगी और उच्च शिक्षा के लिए छात्रों को विश्वविद्यालयों या अन्य मान्यता प्राप्त संस्थानों का रुख करना होगा. जिन संस्थानों में कामिल और फाजिल चल रहे थे, उन्हें नई व्यवस्था में खुद को ढालना पड़ेगा.
इस फैसले को लेकर मतभेद भी हैं. सरकार का कहना है कि इससे मदरसा शिक्षा संविधान और उच्च शिक्षा व्यवस्था के अनुरूप होगी लेकिन दूसरी ओर कुछ मदरसा संचालकों और मुस्लिम संगठनों का तर्क है कि इससे पारंपरिक इस्लामी उच्च शिक्षा की संरचना प्रभावित हो सकती है और छात्रों के लिए संक्रमण का दौर आसान नहीं होगा.
उत्तर प्रदेश के सभी मदरसों में राष्ट्रगान गाना अनिवार्य
यूपी में साल 2004 में 'उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम-2004' के तहत की गई थी. उस वक्त यूपी में मायावती के नेतृत्व में बीएसपी की सरकार थी. इस बोर्ड के तहत निम्नलिखित स्तर की शिक्षा और परीक्षाएं संचालित होती थीं- तहतानिया (प्राथमिक), फोकानिया (उच्च प्राथमिक), मौलवी / मुंशी (हाईस्कूल स्तर), आलिम (इंटरमीडिएट स्तर), कामिल (स्नातक यानी ग्रेजुएट स्तर) और फाजिल (परास्तनाक यानी पोस्ट ग्रेजुएट स्तर.)
वरिष्ठ पत्रकार और शिक्षाविद ओबैद नासिर कहते हैं कि मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा वर्ग शिक्षा से दूर था, उसी को ध्यान में रखकर इस बोर्ड की स्थापना की गई थी. मुस्लिमों के लिए उच्च शिक्षा की भी व्यवस्था की गई थी ताकि यहां से डिग्री लेकर आगे की पढ़ाई के लिए विश्वविद्यालयों में भी जा सकें.
सरकारी फैसले पर उठ रहे सवाल
ओबैद नासिर कहते हैं कि फैसला भले ही सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हुआ है लेकिन इसके पीछे राजनीतिक कारण भी हैं. डीडब्ल्यू से बातचीत में वो कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के सामने सही तस्वीर पेश नहीं की गई. आखिर, शास्त्री और आचार्य जैसे कोर्स को तो मान्यता मिली हुई है. मदरसों को लेकर सरकारी रवैया साफ दिखाता है कि विशेष समुदाय को टार्गेट किया जा रहा है. मदरसों को आतंकी फैक्ट्री तक कहा जा रहा है. लेकिन इन लोगों को ये नहीं मालूम कि राजा राम मोहन राय, मुंशी प्रेमचंद, पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जैसे लोग भी मदरसों में पढ़े थे. मदरसों में पढ़े छात्र कई विश्वविद्यालयों के वीसी तक हुए हैं.”
सुप्रीम कोर्ट ने मदरसा शिक्षा को खत्म नहीं किया बल्कि उसकी संवैधानिक सीमा तय की. उत्तर प्रदेश में इस फैसले का असर सिर्फ दो डिग्रियों तक सीमित रहेगा या आगे चलकर मदरसा शिक्षा के पूरे ढांचे को बदल देगा, यह आने वाले वर्षों में तय होगा. फिलहाल सबसे बड़ा सवाल उन हजारों छात्रों का है जिन्होंने कामिल और फाजिल को सिर्फ धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा और रोजगार के एक रास्ते के रूप में चुना था.
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