उत्तर प्रदेश : गन्ने की खोई से बनेगा प्लास्टिक! इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने विकसित की नई तकनीक - ChiniMandi
प्रयागराज: गन्ने की खेती और चीनी उद्योग से निकलने वाली खोई (बैगास) अब प्लास्टिक निर्माण में भी काम आ सकती है। हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर के अनुसार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने गन्ने क…

सौजन्य से:- ChiniMandi
प्रयागराज: गन्ने की खेती और चीनी उद्योग से निकलने वाली खोई (बैगास) अब प्लास्टिक निर्माण में भी काम आ सकती है। हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर के अनुसार, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने गन्ने की खोई से एफडीसीए (FDCA-फ्यूरान डाइकार्बोक्सिलिक एसिड) तैयार करने की तकनीक विकसित की है। एफडीसीए का इस्तेमाल पेट्रोलियम आधारित प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल प्लास्टिक तैयार करने में किया जा सकता है। इस शोध को 18 से 20 अगस्त के बीच आयोजित शुगर टेक्नोलॉजिस्ट्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (STAI) के 84वें वार्षिक अधिवेशन में प्रस्तुत किया गया।
गन्ने की खोई से तैयार होगा प्लास्टिक का कच्चा माल
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक और रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर विष्णु प्रभाकर श्रीवास्तव ने बताया कि गन्ने से चीनी निकालने के बाद बड़ी मात्रा में रेशेदार पदार्थ बचता है, जिसे गन्ने की खोई या बैगास कहा जाता है। फिलहाल खोई का इस्तेमाल मुख्य रूप से ईंधन, बिजली और भाप उत्पादन के अलावा कागज और बोर्ड बनाने में किया जाता है। वैज्ञानिकों के शोध के तहत अब इसी खोई से एफडीसीए तैयार किया गया है, जिसे प्लास्टिक निर्माण के लिए कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है।
बोतल और खाद्य पैकेजिंग में हो सकता है इस्तेमाल
शोधकर्ताओं के अनुसार, एफडीसीए की मदद से पीईएफ (PEF) प्लास्टिक तैयार किया जा सकता है। इसका इस्तेमाल भविष्य में प्लास्टिक की बोतल, खाद्य पैकेजिंग और फिल्मों जैसे उत्पादों में किया जा सकता है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें कृषि और चीनी उद्योग से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ को उपयोगी औद्योगिक कच्चे माल में बदला जा सकता है।
पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में मदद
प्रो. श्रीवास्तव के मुताबिक, वर्तमान में पीईटी (PET) प्लास्टिक बनाने में इस्तेमाल होने वाला प्रमुख रसायन पेट्रोलियम आधारित स्रोतों से तैयार किया जाता है। ऐसे में यदि गन्ने की खोई से एफडीसीए का बड़े स्तर पर उत्पादन संभव होता है, तो इससे पेट्रोलियम आधारित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा शोध के दौरान एफडीसीए के साथ जाइलोज (Xylose) और लिग्निन (Lignin) जैसे अन्य उपयोगी पदार्थ भी प्राप्त किए गए हैं। इससे गन्ने की खोई के बेहतर और अधिक मूल्यवर्धित उपयोग की संभावनाएं बढ़ी हैं।
उत्तर प्रदेश सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद से मिला सहयोग
इस शोध को उत्तर प्रदेश काउंसिल ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की ओर से वित्तीय सहयोग मिला है।शोध टीम में श्रुति पांडेय, मणि प्रभा, एमएससी छात्र रजत कुमार सिंह, दीपक वर्मा और नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर की डॉ. सीमा पारोहा शामिल हैं। गन्ने की खोई से एफडीसीए तैयार करने की यह तकनीक चीनी उद्योग के अपशिष्ट के बेहतर उपयोग के साथ-साथ बायो-बेस्ड और पर्यावरण-अनुकूल प्लास्टिक के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।
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