लखनऊ की पहचान ‘इंडियन कॉफी हाउस’ पर ताला, 3 महीने से बंद; यहीं बैठते थे लोहिया-चंद्रशेखर
लखनऊ की पहचान ‘इंडियन कॉफी हाउस’ पर ताला, 3 महीने से बंद; यहीं बैठते थे लोहिया-चंद्रशेखर कॉफी की चुस्कियों के साथ यहां साहित्य, राजनीति और समाज से जुड़े मुद्दों पर घंटों बहस होती थी. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर आजाद और…

सौजन्य से:- ABP News
लखनऊ की पहचान ‘इंडियन कॉफी हाउस’ पर ताला, 3 महीने से बंद; यहीं बैठते थे लोहिया-चंद्रशेखर
कॉफी की चुस्कियों के साथ यहां साहित्य, राजनीति और समाज से जुड़े मुद्दों पर घंटों बहस होती थी. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर आजाद और उत्तर प्रदेश के कई पूर्व सीएम भी इसकी चुस्की के शौकीन है.
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज चौराहे पर स्थित इंडियन कॉफी हाउस कभी लखनऊ की पहचान और शहर की वैचारिक दुनिया का बड़ा केंद्र हुआ करता था. 1938 में स्थापित इस कॉफी हाउस में साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनेताओं की नियमित आवाजाही रहती थी. कुछ लोग इसको 80 के दशक का सबसे बड़ा अड्डा भी मानते थे.
कॉफी की चुस्कियों के साथ यहां साहित्य, राजनीति और समाज से जुड़े मुद्दों पर घंटों बहस होती थी. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर आजाद और उत्तर प्रदेश के कई पूर्व सीएम भी इसकी चुस्की के शौकीन है. लेकिन आज यही ऐतिहासिक कॉफी हाउस करीब तीन महीने से बंद है. कॉफी हाउस से जुड़े लोगों के मुताबिक, स्टाफ की कमी के कारण इसे बंद किया गया. वहीं आसपास के दुकानदारों का कहना है कि कॉफी हाउस को बंद हुए करीब तीन महीने हो चुके हैं.
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चार रुपये की कॉफी से 50 रुपये तक का सफर
एक दौर था जब इंडियन कॉफी हाउस में एक कप कॉफी सिर्फ चार रुपये में मिलती थी. लोग एक कप कॉफी लेकर सुबह से शाम तक यहां बैठकर चर्चा किया करते थे. अब यही कॉफी करीब 50 रुपये की हो चुकी है.
कॉफी हाउस की पुरानी यादों को याद करते हुए लेखक नवीन जोशी ने बताया कि युवा अवस्था में लोग सिर्फ यह देखने के लिए भी कॉफी हाउस पहुंचते थे कि शहर के कौन-कौन से बड़े लोग वहां बैठे हैं. उस समय कॉफी हाउस में बैठना अपने आप में एक अनुभव हुआ करता था.
लोहिया से लेकर चंद्रशेखर तक आते थे
इंडियन कॉफी हाउस की पहचान सिर्फ आम लोगों के बैठने की जगह के तौर पर नहीं रही. यहां देश और प्रदेश की कई बड़ी राजनीतिक और साहित्यिक हस्तियां आती रही हैं. डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, जनेश्वर मिश्र, राजनारायण, जॉर्ज फर्नांडीस, नारायण दत्त तिवारी और वीर बहादुर सिंह जैसे नेताओं की यहां मौजूदगी रही.
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और लालजी टंडन का सबसे ज्यादा कॉफी हाउस से लगाव रहा है. साहित्य की दुनिया से यशपाल, भगवती चरण वर्मा, अमृतलाल नागर, मजाज लखनवी, ठाकुर प्रसाद सिंह समेत कई बड़े नाम यहां बैठते थे.
कॉफी हाउस लखनऊ का महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अड्डा था
वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी ने कहा कि इंडियन कॉफी हाउस लखनऊ का एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक अड्डा हुआ करता था. उन्होंने कहा, मैंने बचपन से कॉफी हाउस को देखा है. शहर के बड़े-बड़े साहित्यकार वहां आते थे. अगर नाम लूं तो यशपाल, भगवती चरण वर्मा और ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे लोग कॉफी हाउस में बैठते थे. राजेश शर्मा, वीरेंद्र गोपाल उपाध्याय समेत बहुत से लोगों को मैंने वहां देखा. उनकी बातें सुन-सुनकर मुझे साहित्य और पत्रकारिता की समझ मिली.
नवीन जोशी ने कहा कि उस दौर में शहर में न टेलीफोन थे और न मोबाइल फोन. ऐसे में कॉफी हाउस पहुंचने पर शहर के तमाम लोगों से मुलाकात हो जाती थी. उन्होंने कहा, अगर आप टहलते हुए कॉफी हाउस चले जाइए तो वहां शहर के तमाम लोग मिल जाते थे. शहर की सारी खबरें भी आपको वहीं मिल जाती थीं. कॉफी हाउस का एक कोना साहित्यकारों का था और एक कोना राजनेताओं का. नरेंद्र दत्त तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा समेत तमाम नेता वहां आकर बैठते थे. समाजवादियों की भी कॉफी हाउस में काफी दिलचस्पी थी.
उन्होंने कहा कि 1970, 1980 और 1990 के दशक तक कॉफी हाउस एक मजबूत अड्डे के रूप में चलता रहा. यह कोई सामान्य व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं था, बल्कि सहकारी प्रतिष्ठान था. इसलिए जब भी बीच में बंद होता था, शहर के लोग इसे खुलवाने के लिए अपील करते थे और सरकार से बात करते थे. कई बार बंद होने के बाद यह दोबारा खुला.
नवीन जोशी के मुताबिक, वर्ष 2000 के बाद कॉफी हाउस के सामने लगातार संकट आने लगे. कई बार यह बंद हुआ. एक बार किसी ने इस पर कब्जा करने की कोशिश की, तो एक बार इसे कमर्शियल रेस्टोरेंट में बदलने की कोशिश हुई. कई बार कॉफी हाउस पर ताला लगा. इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है.
नवीन जोशी ने कहा, कॉफी हाउस में राजनीतिक और साहित्यिक बहस इतनी होती थी कि कई बार झगड़े तक हो जाते थे, लेकिन वहां लोगों में अपनापन था. वहां आजादी से अपनी बात रखने का माहौल था. कॉफी हाउस में काम करने वाला मुन्ना बेहरा हम सबका चहेता था. वह यशपाल और नागर जी का भी चहेता था. आज हमारा पूरा जीवन सांस्कृतिक संकट से घिर गया है. हमारे पास कोई सांस्कृतिक अड्डा नहीं बचा है. हमें दुख है कि कॉफी हाउस बंद है और अभी इसके खुलने के कोई स्पष्ट संकेत नजर नहीं आ रहे हैं.
70-80 के दशक में कॉफी हाउस ही सबसे बड़ा मिलन स्थल था
इंडियन कॉफी हाउस पर किताब लिखने वाले लेखक प्रदीप कपूर ने कहा कि उन्हें भी कॉफी हाउस के करीब तीन महीने से बंद होने की जानकारी मिली है. उन्होंने कहा कि कॉफी हाउस को चलाने में लंबे समय से आर्थिक दिक्कतें आ रही थीं.
प्रदीप कपूर ने कहा, कॉफी हाउस लंबे समय से आर्थिक संकट से गुजर रहा था. 70 और 80 के दशक में लोग कहीं और बैठना पसंद नहीं करते थे. वे कॉफी हाउस में बैठना पसंद करते थे, क्योंकि यहां कम दाम में अच्छी कॉफी मिलती थी और साहित्य, राजनीति तथा कला से जुड़े तमाम लोग एक ही जगह मिल जाते थे.
उन्होंने पुराने दौर को याद करते हुए कहा, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह बिना किसी तामझाम और बिना सुरक्षा के कई बार कॉफी हाउस आकर हम लोगों के बीच बैठकर कॉफी पीते थे. ऐसा एक बार नहीं, बल्कि कई बार हुआ.
प्रदीप कपूर ने कहा कि साहित्य की तीन बड़ी हस्तियां भी कॉफी हाउस में साथ बैठती थीं. यशपाल, भगवती चरण वर्मा और अमृतलाल नागर बैठकर कॉफी पीते थे. जब ये लोग बैठे होते थे तो लोग आकर उनसे जुड़ते थे और उनकी बातें सुनते थे.
उन्होंने कहा कि उर्दू साहित्य से जुड़े लोग भी यहां बड़ी संख्या में आते थे. मजाज लखनवी, अली सरदार जाफरी, हयातुल्लाह अंसारी और हसन कमाल जैसे लोग भी कॉफी हाउस में बैठते थे. हसन कमाल ने 'निकाह' फिल्म का गाना भी लिखा था.
कॉफी हाउस से जुड़े कई बड़े राजनीतिक सफर
प्रदीप कपूर ने कहा कि कॉफी हाउस सिर्फ साहित्य और राजनीति पर चर्चा का स्थान नहीं था, बल्कि यहां से कई राजनीतिक आंदोलनों और अभियानों को भी दिशा मिली. उन्होंने जस्टिस आनंद नारायण मुल्ला का उदाहरण देते हुए कहा कि 1996 में उन्होंने सी.आर. मोहन के खिलाफ चुनाव लड़ा था और निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की थी. उनके मुताबिक, इस राजनीतिक अभियान से जुड़े लोगों की गतिविधियां भी कॉफी हाउस से संचालित होती थीं.
उन्होंने कहा, जब वीर बहादुर सिंह ने सीएम पद से इस्तीफा दिया तो वह तुरंत कॉफी हाउस में कॉफी पीने आए थे. पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर 2002 में लखनऊ आए तो सबसे पहले कॉफी हाउस पहुंचे और वहां कॉफी पी.
प्रदीप कपूर के मुताबिक, कॉफी हाउस में बैठने वाले कई लोगों ने आगे चलकर बड़े पद हासिल किए. मधुकर, विजय हो या एनडी तिवारी, हेमवती नंदन बहुगुणा समेत कई लोग यहां बैठते थे. बाद में किसी ने राज्यपाल का पद संभाला तो कोई मंत्री बना. कॉफी हाउस का अपना एक आइकॉनिक इतिहास है.
यह मेरी राजनीति की पाठशाला है
प्रदीप कपूर ने लालजी टंडन के कॉफी हाउस से जुड़ाव को भी याद किया. उन्होंने कहा, लालजी टंडन नियमित रूप से कॉफी हाउस आते थे. जब-जब कॉफी हाउस के ऊपर संकट आया, उन्होंने इसे बचाने की कोशिश की. वह कई बार संकटमोचक के रूप में सामने आए, क्योंकि उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत कॉफी हाउस से ही की थी. उनके मुताबिक, लालजी टंडन कहा करते थे, यह मेरी राजनीति की पाठशाला है और यह पाठशाला चलती रहनी चाहिए.
अब करीब तीन महीने से बंद कॉफी हाउस को लेकर पुराने दौर से जुड़े साहित्यकार, पत्रकार और शहर के लोग चिंतित हैं. कभी जहां कॉफी की चुस्कियों के साथ लखनऊ की साहित्यिक और राजनीतिक दुनिया गुलजार रहती थी, वहां अब ताला लगा हुआ है.
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