उत्तर प्रदेश: किसान नेताओं का मेरठ पुलिस पर हिरासत में यातना देने का आरोप, जांच के आदेश
नई दिल्ली: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो किसान नेताओं ने आरोप लगाया है कि 19 अगस्त को मेरठ के जिला पुलिस प्रमुख और अन्य पुलिस अधिकारियों ने उन्हें अपने कार्यालय और एक दूसरी जगह पर बेरहमी से पीटा, अपमानित किया और प्रताड़ित क…

सौजन्य से:- The Wire - Hindi
नई दिल्ली: पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दो किसान नेताओं ने आरोप लगाया है कि 19 अगस्त को मेरठ के जिला पुलिस प्रमुख और अन्य पुलिस अधिकारियों ने उन्हें अपने कार्यालय और एक दूसरी जगह पर बेरहमी से पीटा, अपमानित किया और प्रताड़ित किया.
मेरठ पुलिस ने शुरुआत में इन आरोपों से इनकार करते हुए दावा किया था कि दोनों व्यक्ति – दिग्विजय सिंह भाटी और मोहित जाटव – पुलिस से मुलाकात के बाद घर लौटते समय स्कूटर फिसलने से घायल हुए थे. हालांकि, भारी विरोध और आक्रोश के बीच शुक्रवार (21 अगस्त) को मेरठ जोन के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक ने मामले की जांच शुरू कर दी.
इस बीच, मेरठ के सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (एसएसपी) अविनाश पांडे, जिन पर कथित प्रताड़ना की साज़िश रचने का आरोप है, का 20 अगस्त को लखनऊ में डीजीपी मुख्यालय में तबादला कर दिया गया. वह उन नौ आईपीएस अधिकारियों में शामिल थे जिनका तबादला किया गया था, लेकिन दूसरों के विपरीत, उन्हें कोई नया ज़िला नहीं दिया गया.
पिछले महीने पांडे की उस समय कड़ी आलोचना हुई थी जब एक वीडियो सामने आया था जिसमें वह एक वैन के पास जाते और दलित कार्यकर्ता व वकील रवि गौतम को बार-बार थप्पड़ मारते दिख रहे थे, जबकि गौतम पहले से ही गाड़ी के अंदर थे. यह घटना मेरठ की दलित समुदाय की छात्रा ललिता गौतम की हत्या की बेहतर जांच की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान हुई थी. प्रताड़ना के ताज़ा आरोप उसी विरोध प्रदर्शन और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई से जुड़े हैं.
भाटी और जाटव के पुलिस पर आरोप
बाईं आंख में सूजन के साथ अमरोहा निवासी और भारतीय किसान यूनियन (बीआर आंबेडकर गुट) के अध्यक्ष दिग्विजय सिंह भाटी ने भावुक होते हुए मीडिया के सामने कथित यातना की बात कही.
भाटी ने बताया कि वह और उनके सहयोगी जाटव 19 अगस्त को जुलाई में हुए प्रदर्शन के मामले पर चर्चा करने के लिए एसएसपी पांडे से उनके कार्यालय में मिलने गए थे. उस प्रदर्शन के मामले में पुलिस ने भाटी और अन्य लोगों के खिलाफ हिंसा के आरोप में मामला दर्ज किया था और उन पर रास्ता रोकने की घटना का मुख्य साजिशकर्ता होने का आरोप लगाया गया था.
भाटी गुर्जर समुदाय से आते हैं, जो अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में आता है, जबकि जाटव दलित समुदाय से हैं.
सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में भाटी ने बताया कि उन्होंने और जाटव ने करीब सुबह 11:30 बजे एसएसपी से मुलाकात की थी. उन्होंने उनसे ललिता गौतम प्रदर्शन के मामले से अपने नाम हटाने का अनुरोध किया था. भाटी का कहना था कि प्रदर्शन वाले दिन वह मेरठ में थे ही नहीं.
भाटी का आरोप है कि इतना कहते ही एसएसपी पांडे ने गाली-गलौज शुरू कर दी और उनकी सामाजिक सक्रियता को ‘नेतागिरी’ कहकर अपमानित किया और उन्हें ‘गुंडा’ कहा. जब उन्होंने अधिकारी से गाली देने को लेकर सवाल किया तो भाटी के मुताबिक उन्हें एसएसपी कार्यालय से लगे एक कमरे में घसीटकर ले जाया गया और बेरहमी से पीटा गया.
भाटी ने कहा, ‘मुझे इतनी बुरी तरह पीटा गया कि मैं अपनी आंख तक नहीं खोल पा रहा हूं.’
उन्होंने आरोप लगाया कि पांडे ने पहले उन्हें कई बार कोहनी मारी और फिर बेल्ट से पीटा. उनके मुताबिक, भाटी के फर्श पर गिर जाने के बाद एसएसपी ने अपने बूट से उनकी आंख पर कई बार लात मारी.
भाटी ने आगे आरोप लगाया कि बाद में एसओजी के जवान दोनों कार्यकर्ताओं को एक अज्ञात जगह पर ले गए, जहां कई घंटों तक उनके साथ मारपीट की गई. उनका आरोप है कि मेरठ के सिविल लाइंस थाने में तैनात इंस्पेक्टर अखिलेश गौर और 4-5 अन्य पुलिसकर्मियों ने उन्हें यातनाएं दीं.
भाटी के मुताबिक, उन्हें और जाटव को बेल्ट से पीटा गया, फिर उनके पैर बांधकर पैरों के तलवों पर बार-बार लाठियां मारी गईं. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि पुलिसकर्मियों ने उनकी कनपटी पर कई बार मुक्के मारे.
भाटी ने कहा, ‘उन्होंने हमें इस तरह पांच दौर में पीटा… जब मैंने पानी मांगा तो बोतल के ढक्कन में पानी दिया. उन्होंने हमें बहुत यातना दी. मैं उठ भी नहीं पा रहा हूं.’
आरोप है कि दोनों को अपमानित भी किया गया. भाटी का आरोप है कि बेरहमी से पीटने के बाद पुलिसकर्मियों ने मोबाइल फोन पर हिंदी गाना ‘चोली के पीछे क्या है’ बजाया और दोनों को उस पर नाचने के लिए मजबूर किया, जबकि वे मुश्किल से खड़े हो पा रहे थे.
भाटी की सूजी हुई आंखों और शरीर पर चोट के निशान वाली तस्वीरें सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा होने के बाद मेरठ पुलिस और योगी आदित्यनाथ सरकार की विपक्षी नेताओं ने कड़ी आलोचना की.
समाजवादी पार्टी के विधायक अतुल प्रधान ने भाटी के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इस दौरान चोट के कारण भाटी की बाईं आंख पर पट्टी लगी हुई थी. जाटव भी उनके साथ मौजूद थे.
प्रधान ने कहा, ‘भाजपा सरकार पूरी तरह तानाशाही और बर्बरता पर उतर आई है. सत्ता के अहंकार में आवाजों को दबाने की कोशिश बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जाएगी.’
उन्होंने कहा कि इस तरह के बर्बर व्यवहार की कल्पना मात्र से ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं. प्रधान ने कहा, ‘अगर भाजपा सरकार नामी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करती है, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि आम नागरिक किस तरह उसका शिकार हो रहा है.’
‘झूठे और निराधार’: पुलिस का शुरुआती इनकार
भाटी के आरोप सामने आने के बाद मेरठ पुलिस ने एक बयान जारी कर इन्हें ‘झूठा और निराधार’ बताया.
पुलिस के मुताबिक, भाटी और जाटव सिविल लाइंस थाने स्थित पुलिस कार्यालय में अपने खिलाफ दर्ज प्रदर्शन से संबंधित पिछली एफआईआर पर चर्चा करने आए थे. पुलिस ने कहा कि घर लौटते समय उनका स्कूटर फिसल गया, जिससे दोनों गिरकर घायल हो गए.
मेरठ पुलिस के अनुसार, इस संबंध में भाटी और जाटव ने खुद थाने में एक लिखित शिकायत दी थी, जिसे शाम 5:31 बजे जनरल डायरी की प्रविष्टि संख्या 53 के रूप में दर्ज किया गया. हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि उस लिखित आवेदन में वास्तव में क्या कहा गया था.
पुलिस ने यह भी कहा कि भाटी और जाटव दोनों अपने-अपने थानों में ‘हिस्ट्रीशीटर’ के रूप में दर्ज हैं और उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज हैं – भाटी के खिलाफ 10 और जाटव के खिलाफ 7 मामले.
जांच की घोषणा
हालांकि, 21 अगस्त को मेरठ जोन के अपर पुलिस महानिदेशक (एडीजी) भानु भास्कर ने कहा कि एसएसपी के कार्यालय के भीतर भाटी और जाटव के साथ कथित अभद्रता और मारपीट के आरोपों का संज्ञान लिया गया है. भास्कर ने मीडिया को बताया कि सहारनपुर के डीआईजी इन आरोपों की जांच करेंगे और उनके द्वारा सौंपी गई रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी.
भास्कर ने कहा, ‘19 अगस्त को मेरठ के एसएसपी कार्यालय में एक विवाद हुआ था. दोनों के बीच मामूली कहासुनी हुई और उसके बाद हिंसा हुई. हमने जांच के आदेश दे दिए हैं.’
इस बीच नगीना से सांसद चंद्रशेखर आजाद ने कहा है कि पुलिस हिरासत में दोनों लोगों के साथ की गई कथित बर्बरता कानून-व्यवस्था और पुलिस की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करती है. आजाद ने मांग की कि सरकार तत्काल पुलिस कार्यालय की सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित करे, पीड़ितों की स्वतंत्र मेडिकल जांच कराए, निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करे और दोषी पाए जाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई करे.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संबोधित अपने एक ट्वीट में आजाद ने कहा, ‘यह पुलिसिंग नहीं है, बल्कि वर्दी में मिले अधिकार का खुला दुरुपयोग है और यह हिरासत में यातना के बराबर है. किसी भी अधिकारी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है.’
इन आरोपों की निंदा करते हुए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पूरी घटना की गहन जांच और दोषी पाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति के खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई की मांग की. उन्होंने दोषियों को बर्खास्त करने की भी मांग की.
उन्होंने एक्स पर कहा, ‘किसान नेताओं को दी गई यातना – जिसमें थाने में ‘थर्ड डिग्री’ के तरीकों का इस्तेमाल भी शामिल है – उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की उस घबराहट को उजागर करती है, जो उसे हार के डर से हो रही है.’
पृष्ठभूमि
बता दें कि इसी साल जुलाई में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने एसएसपी पांडे के नेतृत्व में मेरठ में हुई पुलिस कार्रवाई का संज्ञान लिया था. आयोग ने मानवाधिकारों के उल्लंघन के शुरुआती सबूत मिलने के बाद उत्तर प्रदेश के गृह सचिव और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को नोटिस जारी किए थे.
एनएचआरसी ने भोपाल स्थित डॉ. आंबेडकर जन कल्याण समिति की ओर से दायर शिकायत के आधार पर यह कार्रवाई की थी. संगठन ने स्वतंत्र जांच कराने और पुलिसकर्मियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की मांग की थी. संगठन का आरोप था कि पुलिस ने ‘बिना किसी उकसावे के बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें कई प्रदर्शनकारियों को गंभीर शारीरिक चोटें आईं.’
यह पूरा विवाद ललिता गौतम की हत्या के बाद पैदा हुआ था. युवा दलित महिला ललिता 15 मई को ट्रांसपोर्ट नगर थाने के इलाके से लापता हुई थीं. दो दिन बाद 17 मई को उनका शव रोहटा इलाके के एक गांव से बरामद हुआ था. 48 घंटे के भीतर पुलिस ने ललिता के एक परिचित अंकुश को मुख्य संदिग्ध के रूप में गिरफ्तार कर लिया था. बाद में सबूत नष्ट करने के आरोप में दो अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया गया.
8 जुलाई को एक भीड़ मेरठ के कमिश्नर कार्यालय के बाहर जमा हुई और मुख्य आरोपी के परिवार के सदस्यों की गिरफ्तारी की मांग की. प्रदर्शनकारियों का दावा था कि आरोपी के परिवार के सदस्य भी इस मामले में शामिल थे.
इसके बाद मेरठ पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर गैर-कानूनी जमावड़ा, दंगा और ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मियों के साथ कथित मारपीट करने के आरोप लगाए. पुलिस ने कई लोगों को गिरफ्तार भी किया और उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई. एफआईआर में हत्या के प्रयास और महिला पुलिसकर्मियों की गरिमा भंग करने जैसी धाराएं भी शामिल थीं.
पुलिस ने भाटी को रास्ता रोकने की घटना का मुख्य साजिशकर्ता बताया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
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