Lucknow-Kanpur Expressway Ground Report: शिलान्यास से उद्घाटन तक लगे साढ़े चार साल, 13 दिन भी न चला एक्सप्रेसवे - lucknow kanpur expressway ground report 4200 crore road damaged after 13 days of inauguration
Lucknow-Kanpur Expressway Ground Report: शिलान्यास से उद्घाटन तक लगे साढ़े चार साल, 13 दिन भी न चला एक्सप्रेसवे 4200 करोड़ रुपये की लागत से बना लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के 13 दिन बाद ही धंसने लगा है, जिससे इसकी नि…

सौजन्य से:- Jagran
Lucknow-Kanpur Expressway Ground Report: शिलान्यास से उद्घाटन तक लगे साढ़े चार साल, 13 दिन भी न चला एक्सप्रेसवे
4200 करोड़ रुपये की लागत से बना लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के 13 दिन बाद ही धंसने लगा है, जिससे इसकी निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। 2 ...और पढ़ें
HighLights
- उद्घाटन के मात्र 13 दिन बाद एक्सप्रेसवे धंसने लगा
- 24 दिन में 15 जगह सड़क धंसी, 60 पैच लगे
- एनएचएआई जांच कर रहा, पीएनसी ने मामूली क्षति बताई
जागरण संवाददाता, उन्नाव/कानपुर। 63 किमी लंबे लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे की कहानी सिर्फ सड़क परियोजना की नहीं, बल्कि देरी और निर्माण गुणवत्ता पर उठते सवालों की भी बन गई है। करीब साढ़े चार साल के लंबे इंतजार और 4200 करोड़ रुपये खर्च कर तैयार एक्सप्रेसवे की सड़क उद्घाटन के 13वें दिन से ही दिन धंसने लगी। छोटी-छोटी समस्याएं छोड़ दी जाएं तो अब तक 24 दिन में 15 जगह सड़क धंस चुकी है।
उन्नाव सीमा क्षेत्र में 45 किमी के ग्रीनफील्ड हिस्से में 60 जगह पैच लग चुके हैं। कई जगह तो स्थिति ऐसी है कि चूके तो हादसा तय है। अब उन दावों पर सवाल हैं, जिनमें कहा गया था कि सड़क आधुनिक तकनीक से बनेगी। एक दशक तक इसमें गड्ढे नहीं होंगे। एनएचएआइ लखनऊ इकाई के परियोजना निदेशक नवरत्न के मुताबिक कारणों का पता लगाया जा रहा है। सात दिन में जांच रिपोर्ट तैयार हो जाएगी। इसके बाद ही कुछ कहना उचित रहेगा। इस बीच उन्नाव से लखनऊ की ओर भारी वाहन नहीं जाने दिए जा रहे, लेकिन लखनऊ की ओर से रोक नहीं है।
2018 में बनी थी डीपीआर, पीएम ने किया था शिलान्यास
परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) नवंबर 2018 में तैयार हुई थी। मार्च 2019 में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने भूमिपूजन किया और पांच जनवरी 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शिलान्यास किया। एनएचएआइ और निर्माण एजेंसी पीएनसी इन्फ्राटेक के बीच हुए अनुबंध के अनुसार परियोजना को 30 माह में पूरा कर नवंबर-दिसंबर 2025 तक चालू किया जाना था।
13 जुलाई को हुआ था उद्घाटन
लखनऊ के एलीवेटेड सेक्शन में देरी से निर्माण समय पर पूरा नहीं हो सका। परियोजना को 11 जून 2026 को पूर्णता प्रमाणपत्र मिला। 13 जुलाई 2026 को उद्घाटन और दूसरे दिन से वाहन चलने शुरू हो गए। 26 जुलाई को कोरारी के पास किमी संख्या 64 पर करीब 30 मीटर रोड धंस गया। इसके बाद सात अगस्त तक अलग-अलग स्थानों पर 15 जगह लंबी दूरी में सड़क धंसने के मामले सामने आए।
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कब और कहां धंस जाएगा एक्सप्रेसवे, जिम्मेदारी कौन लेगा?
सेवानिवृत्त सहायक अभियंता एके शुक्ल का कहना है कि शुरुआती बारिश में ही सड़क क्षतिग्रस्त हो जाए तो डिजाइन, निर्माण सामग्री, जल निकासी व्यवस्था और गुणवत्ता नियंत्रण सभी की निष्पक्ष जांच जरूरी हो जाती है। टोल वसूली बंद कर दी गई है, इससे लोगों को फायदा है, लेकिन सड़क कब और कहां धंस जाएगी, इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। मिट्टी भराई और बिटुमिन की लेयर बिछाते समय और निगरानी में लापरवाही हुई। सड़क चलने लायक नहीं बची। पैचवर्क के बजाय सड़क नए सिरे से बननी चाहिए।
किमी संख्या 64 पर मरम्मत पूरी, डायवर्जन खत्म
उन्नाव-लखनऊ लेन पर छह छह दिन से किमी संख्या 64 पर 200 मीटर के दायरे में चल रहा मरम्मत कार्य शुक्रवार को पूरा हो गया। पूर्वाह्न 11 बजे डायवर्जन भी खत्म कर दिया गया। अब बाबा खेड़ा के पास किमी संख्या 30.9 से लेकर 29.8 के बीच 800 मीटर सड़क फूलने और फटने की समस्या दूर करने के लिए मरम्मत हो रही है।
ये हैं जिम्मेदार
- गौतम विशाल, क्षेत्रीय परियोजना निदेशक
- संजीव शर्मा, पूर्व क्षेत्रीय परियोजना निदेशक
- नुकल वर्मा, पूर्व परियोजना निदेशक, एनएचएआइ लखनऊ इकाई
- विवेक कुमार गुप्ता, निर्माणकारी संस्था के प्रोजेक्ट मैनेजर-सह-डीजीएम (हाइवे)
- सुरेंद्र कुमार, स्वतंत्र इंजीनियर
- यतेंद्र कुमार, रेसिडेंट इंजीनियर
पीएनसी ने कहा, सिर्फ 300 मीटर हिस्सा प्रभावित
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे पर सड़क धंसने के मामले में पीएनसी इंफ्राटेक ने शुक्रवार को स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि लगातार बारिश से केवल करीब 300 मीटर हिस्सा प्रभावित हुआ है, जो पूरे एक्सप्रेसवे का 0.5 प्रतिशत से भी कम है। अधिकांश मरम्मत पूरी हो चुकी है और यातायात सामान्य है।
NHAI ने न डिबार किया न नान परफार्मर घोषित
कंपनी ने कहा कि उसे एनएचएआइ ने न तो डिबार किया है और न ही 'नान-परफार्मर' घोषित किया है। एनएचएआइ के नोटिस का जवाब जल्द दिया जाएगा। कंपनी के अनुसार, 15 वर्ष तक रखरखाव उसकी जिम्मेदारी है। हालांकि एनएचएआइ सुरक्षा राशि का दो प्रतिशत जुर्माना, अधिकारियों पर कार्रवाई और रेटिंग घटाने जैसी कार्रवाई की है।
एक्सप्रेसवे की सड़क बनाने में ये होते मानक
एक्सप्रेसवे की जांच कर रहे एनआइटी वारंगल के इंजीनियर रवींद्र यादव के अनुसार सड़क निर्माण में सबसे पहले मिट्टी की मजबूती की जांच परीक्षण के जरिये होती है। यदि मिट्टी की भार सहन क्षमता निर्धारित मानक से कम हो तो पूरी सड़क भविष्य में बैठ सकती है। इसके बाद ग्रेन्युलर सब-बेस और वेट मिक्स मैकडम (यह सड़क की सबसे नीचे वाली मजबूत दो परत होती है, जो तैयार की गई मिट्टी के ऊपर बिछाई जाती है, की जांच की जाती है। इन दोनों परतों की मोटाई, घनत्व और कंप्रेशन की जांच न्यूक्लियर डेंसिटी गेज (वह आधुनिक मशीन,जिससे सड़क की परत को बिना खोदे ही उसका घनत्व और कंप्रेशन मापा जाता है) या सैंड रिप्लेसमेंट टेस्ट (सड़क की परत में छोटा गड्ढा बनाकर उसमें भरी जाने वाली रेत की मात्रा से घनत्व और कंपेक्शन की जांच) की जाती है। मानकों के अनुसार परत को निर्धारित प्रतिशत तक दबाना अनिवार्य होता है।
दबाव कम होने से वर्षा का पानी अंदर पहुंचकर सड़क को करता कमजोर
इंजीनियर रवींद्र यादव ने बताया कि यदि सड़क पर दबाव (कंप्रेशन) कम हुआ तो वर्षा का पानी अंदर पहुंचकर सड़क को कमजोर कर देता है। इसके बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण बिटुमिनस परत का होता है। डामर और पत्थर का अनुपात पहले प्रयोगशाला में मार्शल स्टेबिलिटी टेस्ट से तय किया जाता है। यह परीक्षण बताता है कि सड़क भारी वाहनों का कितना भार सहन करेगी। यदि मिश्रण में बिटुमेन कम या अधिक हुआ तो सड़क जल्दी उखड़ने लगेगी या गर्मी में नरम पड़ जाएगी।
मानकों की जांच जरूरी
निर्माण के दौरान बिछाई गई प्रत्येक परत की कोर कटिंग टेस्ट भी की जाती है। मशीन से सड़क का गोल नमूना निकालकर उसकी वास्तविक मोटाई मापी जाती है। इसी तरह बिटुमेन कंटेंट टेस्ट से यह जांचा जाता है कि मिश्रण में डामर की मात्रा अनुबंध के अनुरूप है या नहीं। सड़क की समतलता भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। इसके लिए स्ट्रेट एज, बंप इंटीग्रेटर या लेजर प्रोफाइलर से जांच होती है। यदि सड़क पूरी तरह समतल नहीं होगी तो पानी रुकने लगेगा और वहीं से गड्ढे बनने की शुरुआत होगी। निर्माण पूरा होने के बाद भी सड़क का अंतिम निरीक्षण होता है। इसमें पूरी लंबाई की विजुअल इंस्पेक्शन, ड्रेनेज सिस्टम, शोल्डर, क्रास फाल, ढाल, सड़क की चौड़ाई और सुरक्षा मानकों की जांच की जाती है।
उठ रहे यह सवाल
- यदि कोर कटिंग टेस्ट में मोटाई मानक के अनुरूप पाई गई थी, तो परत इतनी जल्दी क्यों उखड़ी।
- मार्शल स्टेबिलिटी टेस्ट सफल था, तो पहली वर्षा और सामान्य यातायात में सड़क की पकड़ क्यों कमजोर हुई
- यदि कंपेक्शन 98 प्रतिशत तक मानकों के अनुसार हुआ, तो सड़क बैठने या गड्ढे बनने की स्थिति क्यों आई।
- यदि ड्रेनेज और क्रास-फाल सही था तो सड़क पर पानी रुकने की नौबत सामने क्यों आई।
- इंजीनियर और विभागीय अधिकारियों ने गुणवत्ता प्रमाणित की थी, तो उद्घाटन के कुछ सप्ताह बाद ही मरम्मत की जरूरत क्यों पड़ गई।
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