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यूपी 2027 चुनाव के शोर में मुस्लिमों के लिए सपा की 'साइलेंट' रणनीति, आजम के बहाने भी संतुलन साधने की कोशिश - sp silent strategy for muslim voters in up 2027 polls

यूपी 2027 चुनाव के शोर में मुस्लिमों के लिए सपा की 'साइलेंट' रणनीति, आजम के बहाने भी संतुलन साधने की कोशिश सपा 2027 के यूपी चुनावों के लिए पीडीए विस्तार के साथ मुस्लिम मतदाताओं को साधने की 'साइलेंट' रणनीति अपना रही है। आ…

Jagran के अनुसार18 अगस्त 2026 को 12:55 am बजे
यूपी 2027 चुनाव के शोर में मुस्लिमों के लिए सपा की 'साइलेंट' रणनीति, आजम के बहाने भी संतुलन साधने की कोशिश
 - sp silent strategy for muslim voters in up 2027 polls

सौजन्य से:- Jagran

यूपी 2027 चुनाव के शोर में मुस्लिमों के लिए सपा की 'साइलेंट' रणनीति, आजम के बहाने भी संतुलन साधने की कोशिश

सपा 2027 के यूपी चुनावों के लिए पीडीए विस्तार के साथ मुस्लिम मतदाताओं को साधने की 'साइलेंट' रणनीति अपना रही है। आजम खान के बहाने पार्टी मुस्लिम समाज को यह संदेश दे रही है कि नई रणनीति के बावजूद पुराने रिश्तों से दूरी नहीं है।

HighLights

- सपा 2027 चुनावों के लिए मुस्लिम मतदाताओं पर 'साइलेंट' रणनीति।

- पीडीए विस्तार के साथ मुस्लिम वोट बैंक को साधने की चुनौती।

- आजम खान के बहाने मुस्लिम समाज को संदेश दे रही पार्टी।

दिलीप शर्मा, लखनऊ। वर्ष 2027 की चुनावी बिसात पर समाजवादी पार्टी कई मोर्चों पर 'गेम' बदल रही है। पीडीए का विस्तार, सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार, ब्राह्मण आउटरीच और सनातन पर बदली भाषा से अखिलेश यादव अपने समर्थन के समीकरण का दायरा बढ़ाने में जुटे हैं, लेकिन इस 'विस्तार' के बीच पार्टी के सामने अपने सबसे पुराने और भरोसेमंद सामाजिक आधार, मुस्लिम मतदाता को साथ बनाए रखने की चुनौती है।

ऐसे में सपा 'साइलेंट' रणनीति पर काम कर रही है। बिना शोर-शराबे के मुस्लिम समाज से संपर्क-संवाद का सिलसिला जारी है। इसके साथ आजम खां के बहाने भी समाज को संदेश दिया जा रहा है कि बदली हुई सियासी भाषा का मतलब पुराने रिश्तों से दूरी नहीं है।

अखिलेश के मुस्लिम मुद्दों पर अपेक्षाकृत संयमित तेवर के बीच शिवपाल यादव का आजम के पक्ष में खुलकर उतरना, अपने पुराने एमवाइ (मुस्लिम-यादव) समीकरण के इसी 'एम' को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

सपा, धार्मिक आस्था से जुड़े मुद्दों के सहारे भाजपा के परंपरागत राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण को सीमित करने की कोशिश में है। इस बहुस्तरीय रणनीति में सबसे दिलचस्प पहलू, उसका मुस्लिम वोट को लेकर अपेक्षाकृत 'साइलेंट' रवैया है।

पार्टी सार्वजनिक मंचों पर मुस्लिम मुद्दों को पहले की तरह राजनीतिक केंद्र में रखने से बच रही है। सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना, संविधान, रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर जोर है। हालांकि पार्टी का पुराना मुस्लिम मतदाता हमेशा उसके साथ रहा है, लेकिन एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी अब इसे चुनौती दे रहे हैं।

200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात भी कह चुके हैं। सपा पर मुस्लिमों और दलितों को पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व न देने के आरोप लगा रहे हैं। बसपा और कांग्रेस भी इस वोट बैंक पर नजर लगाए हैं।

ऐसे में सपा की रणनीतिक चुनौती है कि यदि वह मुस्लिम मुद्दों पर बहुत मुखर होते हैं तो भाजपा को ध्रुवीकरण का नैरेटिव बनाने का अवसर मिल सकता है और पार्टी की पीडीए-प्लस रणनीति प्रभावित हो सकती है।

वहीं यदि वह पूरी तरह चुप रहते हैं तो मुस्लिमों में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी अब उनके मुद्दों को प्राथमिकता नहीं देती। ऐसे में जिलों में संगठन द्वारा किए जा रहे पीडीए सम्मेलनों के साथ समाजवादी अल्पसंख्यक सभा अपने स्तर पर संपर्क में जुटी है। दूसरी तरफ पार्टी राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल यादव ने हाल में आजम से मुलाकात की।

इसके बाद सार्वजनिक रूप से कहा कि सपा सरकार बनने पर आजम को गृह मंत्री बनाया जाएगा। सपा प्रमुख की पत्नी सांसद डिंपल यादव ने भी आजम के साथ हो रहे व्यवहार को अन्याय बताया। राजनीतिक तौर पर ये बयान कई संदेश देते हैं। एक तो ये कि आजम अभी भी सपा के राजनीतिक परिवार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

दूसरा, पार्टी उनके प्रति अपनी प्रतिबद्धता से पीछे नहीं हटी है और तीसरा, मुस्लिम मतदाताओं को यह संकेत कि विस्तार की नई रणनीति के बावजूद सपा उनके पुराने नेतृत्व और मुद्दों को पूरी तरह नहीं छोड़ रही है। साफ है की विधान सभा चुनाव में सपा की एक परीक्षा इसी संतुलन की होगी।

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