चुनाव से पहले फिर चर्चा में 2013 का मुजफ्फरनगर दंगा, क्या पश्चिमी यूपी में मुद्दा बनाएगी बीजेपी?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में 13 साल पुराना मुजफ्फरनगर दंगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. दंगे की 13वीं बरसी के मौके पर बीजे…

सौजन्य से:- AajTak
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत में 13 साल पुराना मुजफ्फरनगर दंगा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है. दंगे की 13वीं बरसी के मौके पर बीजेपी के कई मंत्रियों, विधायकों और नेताओं की ओर से 2013 की हिंसा का जिक्र किए जाने के बाद सवाल उठने लगा है कि क्या बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले इस मुद्दे को एक बार फिर चुनावी बहस के केंद्र में लाने की तैयारी कर रही है?
7 सितंबर को मुजफ्फरनगर दंगे की बरसी के दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों और लखनऊ में एक पोस्टर दिखाई दिया. पोस्टर पर लिखा था- 'मुजफ्फरनगर के इस दंगे को भूल तो नहीं गए?' चूंकि पोस्टर पर किसी संगठन या व्यक्ति का नाम नहीं था, इसलिए शुरुआत में यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो गया कि आखिर 13 साल बाद मुजफ्फरनगर दंगे के घाव को फिर से हरा करने की कोशिश क्यों हुई.
लेकिन जैसे ही बीजेपी के हिंदूवादी नेता संगीत सोम ने इस पोस्ट को अखिलेश यादव से जोड़ा और बीजेपी के मंत्री और विधायकों ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट पर 2013 के इस मुजफ्फरनगर दंगे का जिक्र करना शुरू किया तो अंदाजा लग गया कि बीजेपी इस मुद्दे को एक बार फिर जिंदा करना चाहती है. अभी तक डेढ़ दर्जन से ज्यादा मंत्री और कई दर्जन विधायकों ने मुजफ्फरनगर दंगे को लेकर सोशल मीडिया पोस्ट किए हैं. यह दिखा रहा है कि भाजपा ने 2027 चुनाव के पहले मुजफ्फरनगर दगे को एक बार फिर चुनाव के मुद्दे के तौर पर सामने ला दिया है.
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पश्चिमी यूपी की राजनीति में मुजफ्फरनगर का असर
बता दें कि मुजफ्फरनगर दंगा पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक बेहद संवेदनशील अध्याय रहा है. 2013 में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 60 से अधिक लोगों की जान गई थी और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए थे. इस हिंसा का असर लंबे समय तक पश्चिमी यूपी की राजनीति पर दिखाई दिया.
2013 के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण बीजेपी की चुनावी राजनीति के महत्वपूर्ण पहलुओं में रहा है. यही वजह है कि दंगे की बरसी पर अचानक इसके राजनीतिक जिक्र ने 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
बीजेपी के लिए पश्चिमी यूपी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां कानून-व्यवस्था, किसान, रोजगार और स्थानीय विकास जैसे मुद्दों के साथ सामाजिक समीकरण चुनावी नतीजों को प्रभावित करते हैं. ऐसे में मुजफ्फरनगर दंगे का मुद्दा फिर से उठना राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.
क्या हिंदू-मुस्लिम मुद्दा बनेगा चुनावी रणनीति?
बीजेपी के लिए सामाजिक ध्रुवीकरण का मुद्दा चुनावी रणनीति का एक अहम हिस्सा हो सकता है. कारण, बीजेपी को मालूम है कि मुसलमान बीजेपी को वोट नहीं करता और अगर उसे पश्चिम जीतना है तो ध्रुवीकरण की राजनीति के परवान चढ़ने पर ही ऐसा हो सकता है. वैसे भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था का मुद्दा सबसे बड़ा है.
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बीजेपी के नेताओं की ओर से मुजफ्फरनगर दंगे का लगातार जिक्र इसी रणनीति की ओर इशारा करता है, हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि पार्टी आधिकारिक तौर पर इसे 2027 के चुनाव का केंद्रीय मुद्दा बनाएगी.
वहीं दूसरी ओर कानून व्यवस्था के साथ-साथ मुजफ्फरनगर दंगे का जिक्र समाजवादी पार्टी को असहज करता है. बीजेपी नेता 2013 की घटनाओं को उठाकर सपा सरकार के कार्यकाल और उस समय की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर सकते हैं.
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