हारे हुए 18,900 बूथों के लिए बीजेपी का 'रिकवरी प्लान', यूपी में बनाई ये रणनीति
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए भाजपा अब पूरी तरह से एक्टिव हो गई है. सीएम योगी आदित्यनाथ अलग-अलग इलाकों में…

सौजन्य से:- AajTak
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सियासी जंग फतह करने के लिए भाजपा अब पूरी तरह से एक्टिव हो गई है. सीएम योगी आदित्यनाथ अलग-अलग इलाकों में जनसभाएं कर भले ही सियासी माहौल बनाने में जुटे हों, लेकिन भाजपा एक रिकवरी प्लान पर भी काम कर रही है. इसके तहत 2024 में जिन विधानसभा सीटों पर हार मिली है, उनके एक-एक बूथ की रिपोर्ट तैयार की जा रही है.
भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए 'हाइपर-लोकल' मोड में उतर गई है. मकसद बिल्कुल साफ है, हर बूथ, हर नंबर और हर वोट पर ध्यान देना. पार्टी 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली हार को सिर्फ़ एक बड़ी राजनीतिक हार के तौर पर नहीं देख रही है. उसने डेटा की गहराई से जांच की है और उन खास पोलिंग बूथों की पहचान की है, जहां 2022 के विधानसभा चुनावों और 2024 के लोकसभा चुनावों के बीच उसका सपोर्ट बेस कम हुआ.
भाजपा सूत्रों ने बताया कि पार्टी ने 2022 में जिन 18,900 बूथों पर जीत हासिल की थी, 2024 के चुनाव में उन्हीं बूथों पर वोट कम मिले हैं. यह संख्या अब पार्टी की संगठनात्मक रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है. इसीलिए भाजपा ने पहले इन बूथों का हिसाब-किताब करने, कमजोर जगहों की पहचान कर उन्हें मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए रिकवरी प्लान बनाया है.
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भाजपा के सामने ग्रामीण बूथों की चुनौती
भाजपा की बूथ स्तरीय कवायद से मिली सबसे अहम जानकारी भौगोलिक है. भाजपा ने जिन 18,900 बूथों को चिह्नित किया है, उनमें से लगभग 80 फीसदी बूथ ग्रामीण इलाकों के हैं. खासकर छोटे गांवों और बिखरी हुई बस्तियों वाले बूथ हैं। लखनऊ, वाराणसी, गोरखपुर और कानपुर जैसे शहरी केंद्र अपेक्षाकृत ज़्यादा मज़बूत रहे. इससे साफ है कि भाजपा का आधार ग्रामीण इलाकों में घट रहा है, जिसे दुरुस्त करने की दिशा में कदम बढ़ा दिए गए हैं.
भाजपा के सामने अब सिर्फ़ पूरे राज्य में राजनीतिक संदेश पहुंचाने की चुनौती नहीं है; चुनौती यह पहचानना है कि कौन-से ग्रामीण समुदाय दूर हो गए, वे क्यों दूर हुए और उन्हें वापस कैसे लाया जाए.
वॉर रूम से जमीनी लड़ाई तक का प्लान
यूपी में भाजपा की रणनीति डेटा एनालिसिस से आगे बढ़कर संगठन को जमीनी स्तर पर मज़बूत करने की ओर बढ़ रही है. भाजपा के यूपी प्रभारी विनोद तावड़े 16 से 22 सितंबर के बीच फिर से यूपी का दौरा करेंगे. उनकी समीक्षा में जिन मुद्दों पर खास तौर पर चर्चा होगी, उनमें वे बूथ शामिल हैं जहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा था और उन्हें वापस जीतने की रणनीति बनाना शामिल है.
भाजपा की यह प्रक्रिया असल में एक पॉलिटिकल फीडबैक लूप है: बूथ की पहचान करना, सामाजिक बदलाव को समझना, स्थानीय मुद्दों की पहचान करना, और उसके बाद संगठन को फिर से खड़ा करके दोबारा से बूथ को वापस जीतना. भाजपा का मानना है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव का नतीजा पूरे राज्य के औसत आंकड़ों से तय नहीं होता; यह हज़ारों अलग-अलग बूथों पर जीत-हार से तय होता है, जहां वोटों के अंतर को मापा जा सकता है, वोटरों की पहचान की जा सकती है और संगठन की कमियों को सुधारा जा सकता है.
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भाजपा का यूपी में रिकवरी प्लान
भाजपा के यूपी में नए गणित का आधार बूथ प्रबंधन है. यूपी में 18,900 का आंकड़ा सिर्फ़ एक संख्या नहीं है, बल्कि यह 2024 में मिली हार को माइक्रो-लेवल पर चुनावी रिकवरी प्लान में बदलने की भाजपा की रणनीति है. अवध और पूर्वांचल सबसे ज़्यादा जोखिम वाले इलाके हैं. ग्रामीण बूथ मुख्य चुनावी मैदान हैं, तथा गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोटों को एकजुट करना एक अहम चिंता है.
बसपा के कमज़ोर होने से विपक्ष के वोट ट्रांसफर का पैटर्न बदल गया है. इसके अलावा बुंदेलखंड जैसे इलाकों में स्थानीय मुद्दे अभी भी अहम हैं. भाजपा अब इसी गणित को ज़मीनी स्तर पर लागू करने की तैयारी कर रही है ताकि 2027 में दोबारा वापसी कर सके.
अवध और पूर्वांचल में भाजपा की चुनौती
डेटा से पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में हर जगह नुकसान एक जैसा नहीं था. अवध क्षेत्र में भाजपा ने 2022 में इलाके की 154 विधानसभा सीटों में से 101 सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में वह इनमें से सिर्फ़ 51 सीटों पर आगे थी.
यह कुल मिलाकर 50 सीटों का नुकसान है, 2022 के नतीजों के मुकाबले 49.5 फीसदी की गिरावट. अमेठी, फैज़ाबाद, कन्नौज, सुल्तानपुर और सीतापुर जिलों में यह नुकसान साफ़ तौर पर देखा गया, जिससे अवध भाजपा के चुनावी नक्शे में सबसे ज़्यादा दबाव वाले इलाकों में से एक बन गया है।
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अवध की तरह ही पूर्वांचल इलाके में भी भाजपा को झटका लगा था. 2022 में भाजपा ने पूर्वांचल इलाके की 102 विधानसभा सीटों में से 53 सीटें जीती थीं. इसके दो साल बाद, लोकसभा चुनाव के दौरान वह सिर्फ़ 36 सीटों पर आगे थी। यह कुल मिलाकर 17 सीटों या 32.1 फीसदी की गिरावट रही.
बूथ-लेवल पर यह गिरावट खास तौर पर जौनपुर, गाज़ीपुर, मछलीशहर, चंदौली और ग्रामीण प्रयागराज में देखी गई। भाजपा जिन राजनीतिक वजहों पर गौर कर रही है, उनमें गैर-यादव ओबीसी वोटरों के एक हिस्से का समाजवादी पार्टी की तरफ़ जाना शामिल है, जहां अखिलेश यादव का 'पीडीए' फार्मूला प्रभावी रहा.
पश्चिमी यूपी और बुंदेलखंड में नफा-नुकसान
पश्चिमी इलाके में भी गिरावट देखी गई, हालांकि अवध और पूर्वांचल के मुकाबले नुकसान कम था. पश्चिमी यूपी में भाजपा ने 2022 में 76 विधानसभा सीटों में से 57 सीटें जीती थीं; 2024 में वह 43 सीटों पर आगे रही. इस तरह कुल 14 सीटों या 24.6 फीसदी का नुकसान हुआ
रुहेलखंड में 2022 के चुनाव में भाजपा ने 52 सीटों में से 30 सीटें जीती थीं. 2024 के लोकसभा चुनाव में उसकी बढ़त घटकर 22 सीटों पर आ गई, यानी कुल आठ सीटों या 26.7 फीसदी की गिरावट हुई। पश्चिमी यूपी और रुहेलखंड को मिलाकर कुल 128 विधानसभा सीटें हैं; भाजपा ने 2022 के चुनाव में इनमें से 87 सीटें जीती थीं और 2024 के लोकसभा चुनाव में 65 सीटों पर बढ़त बनाए रखीच
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वहीं, बुंदेलखंड की तस्वीर कुछ अलग हैय 2022 में भाजपा ने 19 में से 14 विधानसभा सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में वह सिर्फ़ नौ सीटों पर आगे रही. यानी कुल मिलाकर पांच सीटों या 35.7 फीसदी की कमी हुई. यहां पार्टी का आकलन राज्य-स्तर की किसी एक राजनीतिक लहर के बजाय स्थानीय मुद्दों और मौजूदा सरकार के प्रति नाराज़गी (एंटी-इनकंबेंसी) की ओर ज़्यादा इशारा करता है. लगता है कि इन वजहों से इस इलाके के कुछ हिस्सों में भाजपा की बढ़त कमज़ोर हुई है.
सपा के 'पीडीए' फ़ैक्टर पर भाजपा की नज़र
भाजपा के अंदरूनी आकलन में भी सामाजिक समीकरण को समस्या की जड़ माना गया हैय ऐसा प्रतीत होता है कि सपा की 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (PDA) रणनीति ने भाजपा के गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित वोट बैंक में सेंध लगाई है. यह ज़रूरी नहीं कि पूरे समुदाय ने ही पाला बदल लिया हो, बल्कि अहम जातियों के समूहों में होने वाले छोटे-मोटे बदलाव भी बूथ स्तर पर नतीजों को पूरी तरह बदल सकते हैं.
माना जाता है कि कई इलाकों में कुर्मी, कुशवाहा और दूसरे ओबीसी वोटरों का एक हिस्सा सपा में शिफ्ट हो गया. साथ ही बसपा के कमज़ोर होने से विपक्ष के वोट का गणित भी बदला है. 2022 में बसपा का वोट शेयर लगभग 13 फीसदी था, जो 2024 में घटकर 9 फीसदी हो गया. ऐसे में उसके ग्रामीण वोट बैंक का एक हिस्सा अलग-अलग पार्टियों में बंटने के बजाय 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन की तरफ़ जाता दिखा.
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2022 का गेम कैसे 2024 में बदल गया
2024 का चौंकाने वाला नतीजा आज भी परेशान कर रहा है. ये आंकड़े बताते हैं कि भाजपा क्यों 2024 के लोकसभा नतीजों को एक चेतावनी मान रही है, जिस पर बारीकी से ध्यान देने की ज़रूरत है. पार्टी ने 2024 में उत्तर प्रदेश में 33 लोकसभा सीटें जीतीं, जो 2019 में जीती गई 62 सीटों के मुकाबले काफी कम थीं.
वहीं, सपा ने 37 सीटें हासिल कीं, जबकि 2019 में उसे सिर्फ़ पांच सीटें मिली थीं, लेकिन संसदीय सीटों के ये आंकड़े भाजपा के लिए नतीजों के विश्लेषण की सिर्फ़ शुरुआत भर हैं. जब 2024 के लोकसभा नतीजों को राज्य की 403 विधानसभा सीटों के हिसाब से देखा जाता है, तो पार्टी की पकड़ कमज़ोर होने का दायरा और भी साफ़ हो जाता है.
2022 के विधानसभा चुनावों में भाजपा की 255 सीटों की संख्या असल में घटकर लगभग 161 विधानसभा क्षेत्रों की बढ़त तक सिमट जाती है, जब 2024 के लोकसभा वोटिंग पैटर्न को उन पर लागू करके देखा जाता है. और इस मुख्य आंकड़े के पीछे एक और बारीक आंकड़ा छिपा है: 18,900 बूथ, जहां नतीजे पलट गए.
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