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गोरखपुर एम्स का बड़ा शोध; अब छह हफ्ते नहीं दो घंटे में पता चल जाएगा टीबी का लक्षण, इलाज होगा आसान

गोरखपुर एम्स का बड़ा शोध; अब छह हफ्ते नहीं दो घंटे में पता चल जाएगा टीबी का लक्षण, इलाज होगा आसान माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर के नेतृत्व में हुए अध्ययन में नई जांच तकनीक का मूल्यांकन किया गया है. By ETV Bha…

ETV Bharat के अनुसार12 अगस्त 2026 को 01:18 pm बजे
गोरखपुर एम्स का बड़ा शोध; अब छह हफ्ते नहीं दो घंटे में पता चल जाएगा टीबी का लक्षण, इलाज होगा आसान

सौजन्य से:- ETV Bharat

गोरखपुर एम्स का बड़ा शोध; अब छह हफ्ते नहीं दो घंटे में पता चल जाएगा टीबी का लक्षण, इलाज होगा आसान

माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर के नेतृत्व में हुए अध्ययन में नई जांच तकनीक का मूल्यांकन किया गया है.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : August 12, 2026 at 5:50 PM IST

गोरखपुर : टीबी की जांच में लगने वाला छह सप्ताह तक का समय अब घटकर करीब दो घंटे हो सकता है. गोरखपुर एम्स के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरूप मोहंती के नेतृत्व में हुए अध्ययन में नई जांच तकनीक का मूल्यांकन किया गया है. अध्ययन में दवा-संवेदनशील और दवा-प्रतिरोधी दोनों तरह की टीबी को शामिल किया गया है. शोध के निष्कर्ष नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुए हैं.

माइक्रोबायोलॉजी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अरुण मोहंती का दावा है कि यदि तकनीक को देश भर में व्यापक स्तर पर अपनाया जाए तो दवा प्रतिरोधी टीबी की पहचान में होने वाली देरी काफी कम हो जाएगी और रोगियों का सटीक उपचार शुरू हो सकेगा.

वह बताते हैं कि अध्ययन में एक्सपर्ट एमटीबी/एक्सडीआर (माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरकोलोसिस/एक्सटेंसिवली ड्रग रेसिस्टेंट) जांच तकनीक की उपयोगिता का मूल्यांकन किया गया. यह तकनीक टीबी के जीवाणुओं में मौजूद दवा प्रतिरोध का पता सीधे मरीज के नमूने से लगा देती है.

वह बताते हैं कि खास बात यह है कि यह केवल रिफैम्पिसिन ही नहीं, बल्कि आइसोनियाजिड, फ्लोरोक्विनोलोन, एथियोनामाइड और दूसरी पंक्ति की इंजेक्टेबल एंटी-टीबी दवाओं के प्रति प्रतिरोध की भी पहचान कर सकती है.

विशेषज्ञों के अनुसार, अब तक दवा प्रतिरोधी टीबी की पुष्टि के लिए कल्चर आधारित ड्रग ससेप्टिबिलिटी टेस्ट किया जाता था. इसकी रिपोर्ट आने में लगभग छह सप्ताह लग जाते थे. इस दौरान कई मरीजों का उपचार अनुमान के आधार पर चलता था, जिससे बीमारी बढ़ने और संक्रमण फैलने का खतरा बना रहता था.

वह बताते हैं कि नई तकनीक इस समस्या का समाधान बन सकती है. प्रदेश में फिलहाल यह आधुनिक जांच सुविधा केवल दो संस्थानों एसजीपीजीआई, लखनऊ और एम्स गोरखपुर में ही उपलब्ध है. एसजीपीजीआई के बाद एम्स गोरखपुर में इस जांच के लिए एक्सपर्ट अल्ट्रा मशीन स्थापित की गई है.

वह बताते हैं कि उन्होंने अपनी टीम के साथ टीबी के 100 पॉजिटिव नमूने पर अध्ययन किया. इनमें से 89 नमूने नई तकनीक से भी पॉजिटिव मिले. जांच में 22.5% रोगियों में आइसोनियाजिड, 19.1 प्रतिशत फ्लोरोक्विनॉलोन और 2.2% मरीजों में दूसरी पंक्ति की इंजेक्टबल दावों के प्रति प्रतिरोध पाया गया. वह बताते हैं कि इससे स्पष्ट हुआ कि कई मरीजों को सामान्य दावों की बजाय अलग उपचार की आवश्यकता होती है, जिसकी जानकारी अब बहुत कम समय में मिल सकेगी.

कार्यकारी निदेशक डॉ. विभा दत्ता ने कहा कि दवा प्रतिरोधी टीबी की समय पर पहचान रोगियों के बेहतर उपचार के लिए बेहद जरूरी है. इसे राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम को भी मजबूती मिलेगी. इस तरह के अध्ययन साक्ष्य आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करते हैं और देश को टीबी मुक्त बनाने के लक्ष्य तक पहुंचने में मदद करेंगे.

इन बातों का रखें ध्यान : डॉ मोहंती ने बताया कि दो हफ्ते से ज्यादा खांसी, बुखार, छाती में तेज दर्द के साथ वजन का अचानक घटना. भूख में भी कमी आना और बलगम के साथ खून आना. सांस लेने में तकलीफ हो तो यह ट्यूबरक्लोसिस का लक्षण हो सकता है. ऐसी स्थिति में इसकी जांच का माध्यम लोगों को अपनाना चाहिए. जिसमें एक्स-रे, बलगम की जांच, स्किन टेस्ट आदि होती है.

उन्होंने कहा कि सरकार टीबी के मरीजों को मुफ्त में दवा दे रही है. खान-पान के लिए प्रतिमाह भत्ता भी दे रही है. जांच भी फ्री हो रही है. उन्होंने बताया कि दो हफ्ते से अधिक समय तक खासी रहती है तो इसे चिकित्सक को दिखाना चाहिए.

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