सपा का दलित महासम्मेलन आगरा से शुरू क्यों? जानें अखिलेश यादव का प्लान
सपा का दलित महासम्मेलन आगरा से शुरू क्यों? जानें अखिलेश यादव का प्लान यूपी चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. इसी क्रम में वो आगरा से दलित सम…

सौजन्य से:- ABP News
सपा का दलित महासम्मेलन आगरा से शुरू क्यों? जानें अखिलेश यादव का प्लान
यूपी चुनाव को लेकर समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने दलित वोटरों को अपने पाले में लाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं. इसी क्रम में वो आगरा से दलित सम्मेलन की शुरुआत करेंगे.
बहुजन समाज पार्टी में मची उठापटक और यूपी चुनाव को देखते हुए समाजवादी पार्टी ने दलित वोटरों पर फोकस बढ़ा दिया है. इसकी क्रम में सपा 15 नवंबर को दलित महासम्मेलन आयोजन करेगी. जिसकी शुरुआत आगरा से होने जा रही है. इस कार्यक्रम में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव भी मौजूद रहेंगे. इस कार्यक्रम में आसपास से बड़ी संख्या में सपा कार्यकर्ता शामिल होंगे.
यूपी की दलित राजनीति में आगरा बेहद अहम है. यही वजह है कि सपा ने दलित सम्मेलन की शुरुआत यहां से करने का फैसला लिया है. इस जिले का डॉ अंबेडकर और बसपा संस्थापक कांशीराम से भी ऐतिहासिक संबंध रहा है. 18 मार्च 1956 को आगरा में ही अंबेडकर ने यहां चक्री पाट जाटव बस्ती में अपना आखिरी बड़ा भाषण दिया था. उसी भाषण में उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने की घोषणा का संकेत दिया था ये भाषण नागपुर के दीक्षा समारोह से कुछ महीने पहले था.
बसपा के संस्थापक कांशीराम ने 1978 में बमासेफ (BAMCEF) Backward and Minority Communities Employees Federation की औपचारिक स्थापना की. उत्तर प्रदेश में इस संगठन की पहली इकाई 1978 में आगरा में ही शुरू हुई. बाद में लखनऊ में भी इकाई बनाई गई.
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आगरा से ही दलित सम्मेलन की शुरुआत क्यों?
समाजवादी पार्टी ने आगरा का चुनाव भी इसलिए किया है क्योंकि यहां जाटव समुदाय पहले से ही अपेक्षाकृत संगठित, शिक्षित और आर्थिक रूप से थोड़ा मजबूत था. अंबेडकरवादी चेतना भी यहां गहरी थी. कांशीराम ने इन्हीं शहरी, शिक्षित दलित कर्मचारियों और छोटे व्यापारियों को बामसेफ के जरिए जोड़ा. यही आधार बाद में डीएस-4 और बसपा का बना.
कांशीराम ने आगरा को उत्तर भारत में बहुजन राजनीति का शुरुआती प्रयोगशाला बनाया. यहां की सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अंबेडकरवादी पृष्ठभूमि ने उनके संगठन को जड़ें जमाने में मदद की. यही वजह है कि आज भी आगरा को दलित राजनीति का केंद्र माना जाता है.
दलित राजनीति का केंद्र रहा है आगरा
आगरा को यूपी में दलित राजनीति की राजधानी कहा जा सकता है क्योंकि यहां दलित चेतना, अंबेडकरवादी आंदोलन और चुनावी राजनीति का सबसे गहरा और संगठित आधार बना. यह सिर्फ आबादी के आंकड़ों की बात नहीं है. बल्कि इतिहास, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और राजनीतिक प्रयोग का नतीजा है.
दलित आंदोलन का पुराना गढ़ 1950-60 के दशक से ही आगरा में दलित संगठन सक्रिय रहे. जाटव समुदाय ने अंबेडकर की मूर्तियाँ निकालकर, जुलूस निकालकर और बौद्ध धर्म अपनाकर अपनी पहचान और अधिकारों का दावा किया. यह आंदोलन बाद में कांशीराम के BAMCEF और बहुजन समाज पार्टी का आधार बना.
कांशीराम और मायावती दोनों के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर आगरा, प्रयोगशाला जैसा था. आगरा मंडल में 4 जिले आते हैं. आगरा, मथुरा, मैनपुरी, फिरोजाबाद इसके अलावा इटावा और हाथरस की सीमा भी इस जिले से सटती है, इन जिलों में दलित आबादी करीब 20 फीसदी से ज्यादा है. जिसमें जाटव की संख्या सबसे अधिक है. जो बसपा का कोर वोटर रहा है. सपा की कोशिश इसी वोटबैंक में सेंध लगाने की है.
इस क्षेत्र में दलित वोटरों की ताकत
एक अनुमान के मुताबिक आगरा में करीब 23 फीसदी जाटव हैं. जबकि मथुरा में 20 फीसदी, मैनपुरी में 20 फीसदी, फिरोजाबाद में 19 फीसदी, इटावा में 25 फीसदी और हाथरस में करीब 24 फीसदी जाटव वोटरों की संख्या है.
पिछले कई सालों से अखिलेश यादव की नजर यूपी के दलित वोटरों पर है. इसी वजह से उन्होंने पहले मायावती से गठबंधन किया था हालांकि 2019 लोकसभा में उन्हें इसका फायदा नहीं हुआ था. लेकिन, मायावती के साथ आने से उन पर दलित विरोधी होने का आरोप फीका पड़ गया. 2022 और 2024 के चुनाव में अखिलेश यादव को इसका फायदा हुआ.
बसपा के वोटबैंक पर नजर
यही वजह है कि अखिलेश यादव को अब नीला रंग भी पसंद आने लगा है और उन्होंने अपनी पार्टी के गमछे से लेकर टी शर्ट तक को नीला कर दिया है. यही नहीं पार्टी के दलित नेताओं को भी अहमियत देना शुरू कर दिया है. सपा का ये सम्मेलन भी ऐसे वक्त में हो रहा है जब बसपा में लगातार उठापटक मची हुई है. आकाश आनंद और ईशान आनंद पार्टी से बाहर कर दिए गए हैं. साथ ही पार्टी का युवा कार्यकर्ता परेशान है और वो नए नेतृत्व की ओर देख रहे हैं.
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