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कौमी एकता की मिसाल: प्रयागराज के लालगोपालगंज में मुस्लिम कारीगर चार पीढ़ियों से तैयार कर रहे हिंदू आस्था का कलावा और चुनरी

कौमी एकता की मिसाल: प्रयागराज के लालगोपालगंज में मुस्लिम कारीगर चार पीढ़ियों से तैयार कर रहे हिंदू आस्था का कलावा और चुनरी देवीमंदिरों में चढ़ाई जानेवाली चुनरी पर इब्राहिमपुर में काम कर रहे मुस्लिम समाज पर अनिल कुमार पाण…

ETV Bharat के अनुसार23 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
कौमी एकता की मिसाल: प्रयागराज के लालगोपालगंज में मुस्लिम कारीगर चार पीढ़ियों से तैयार कर रहे हिंदू आस्था का कलावा और चुनरी

सौजन्य से:- ETV Bharat

कौमी एकता की मिसाल: प्रयागराज के लालगोपालगंज में मुस्लिम कारीगर चार पीढ़ियों से तैयार कर रहे हिंदू आस्था का कलावा और चुनरी

देवीमंदिरों में चढ़ाई जानेवाली चुनरी पर इब्राहिमपुर में काम कर रहे मुस्लिम समाज पर अनिल कुमार पाण्डेय के संपादन में अक्षय कुमार की स्पेशल रिपोर्ट...

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : September 23, 2026 at 10:56 AM IST

|Updated : September 23, 2026 at 11:30 AM IST

प्रयागराज: शारदीय नवरात्र की शुरुआत से पहले ही देवी मंदिरों में मां के जयकारे और अनुष्ठान गूंजने लगे हैं. देवी के चरणों में लाल-पीली चुनरी और कलावा (रक्षासूत्र) अर्पित करने की सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा है. लेकिन इस आस्था के रंग में गंगा-जमुनी तहज़ीब का एक ऐसा अनूठा धागा जुड़ा है, जिससे आम लोग कम ही वाकिफ हैं.

संगमनगरी प्रयागराज के मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर लालगोपालगंज कस्बे के इब्राहिमपुर में मुस्लिम समाज के सैकड़ों परिवार पीढ़ियों से देवी मंदिरों में चढ़ाए जाने वाले कलाई नारे, कलावा और चुनरी को रंगने और तैयार करने का काम कर रहे हैं.

विंध्याचल धाम से लेकर अयोध्या, काशी और देवघर तक जाने वाले ये रक्षासूत्र न केवल सांप्रदायिक सौहार्द की जीती-जागती मिसाल हैं, बल्कि इन कारीगरों की आजीविका की रीढ़ भी है.

डेढ़ सौ साल पुरानी विरासत, चौथी-पांचवीं पीढ़ी संभाल रही जिम्मेदारी

लालगोपालगंज नगर पंचायत के इब्राहिमपुर मोहल्ले में घुसते ही खुली धूप में सूखते लाल और पीले धागों की कतारें दूर से ही नजर आने लगती हैं.

स्थानीय स्तर पर रंगरेज बिरादरी के नाम से पहचाने जाने वाले इन कारीगरों के लिए यह काम सिर्फ कारोबार नहीं, बल्कि पुरखों से मिली विरासत है.

पूर्व सभासद और चौथी पीढ़ी के कारीगर मोहम्मद ताहिर बताते हैं कि उनके इलाके में करीब 1400 से 1500 की आबादी इसी रंगाई और कलावा तैयार करने के पुश्तैनी काम से जुड़ी हुई है. यह सिलसिला आज या कल का नहीं, बल्कि पिछले करीब 150 वर्षों से बदस्तूर चला आ रहा है.

त्योहारों से दो महीने पहले शुरू हो जाती है चौबीसों घंटे की तैयारी

शारदीय नवरात्र और सावन के महीने में जब देश भर के प्रमुख तीर्थस्थलों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है, तो लालगोपालगंज की यह बस्ती रात-दिन काम में जुट जाती है.

कारीगरों के मुताबिक, मांग पूरी करने के लिए त्योहार से डेढ़ से दो महीने पहले ही धागे का स्टॉक मंगाकर रंगाई और सुखाने का काम शुरू कर दिया जाता है.

दोनों बड़े सीजनों (नवरात्र और सावन) को मिलाकर यहां करीब 25 से 30 लाख रुपये का कच्चा कारोबार होता है, जिससे सैकड़ों परिवारों की गृहस्थी चलती है.

विंध्याचल, अयोध्या से लेकर देवघर तक सप्लाई

लालगोपालगंज के मुस्लिम कारीगरों के हाथों रंगा गया कलावा और चुनरी किसी एक जिले तक सीमित नहीं है. मिर्जापुर के विश्व विख्यात मां विंध्यवासिनी धाम, कौशांबी के शक्तिपीठ कड़ा धाम, जौनपुर के चौकिया धाम और प्रयागराज के अलोप शंकरी देवी मंदिर के अलावा अयोध्या धाम, बनारस (काशी), गोरखपुर, मैहर और यहां तक कि बिहार और झारखंड के प्रसिद्ध बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) तक यह माल भेजा जाता है. सावन में कांवड़ियों के लिए और नवरात्र में कलश स्थापना व रक्षासूत्र के लिए यहीं से थोक में सप्लाई जाती है.

सरकारी उपेक्षा और नई पीढ़ी के सामने चुनौतियां

हालांकि, गंगा-जमुनी तहज़ीब और हस्तशिल्प की इस मिसाल के पीछे कारीगरों का दर्द भी छुपा हुआ है. मोहम्मद ताहिर का कहना है कि सरकारें कुटीर और लघु उद्योगों को बढ़ावा देने की बात तो करती हैं, लेकिन इस पारंपरिक हुनर को बचाने के लिए आज तक कोई ठोस सरकारी मदद या प्रोत्साहन नहीं मिला.

कच्चे माल की बढ़ती लागत और सीमित मुनाफे के चलते नई पीढ़ी के सामने विकल्प कम हैं. कारीगरों का कहना है कि मजबूरी में वे इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं, लेकिन बच्चों को पढ़ा-लिखा रहे हैं, ताकि वे अन्य नौकरियों या व्यवसायों की तरफ रुख कर सकें. ऐसे में अगर शासन स्तर पर इस कुटीर उद्योग को क्लस्टर या आर्थिक मदद दी जाए, तो यह पारंपरिक हुनर न केवल आर्थिक मजबूती पा सकता है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी और मजबूत कर सकता है.

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