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कानपुर चिड़ियाघर में गिद्ध संरक्षण के लिए बनेगा ब्रीडिंग सेंटर, पांच साल में आधे से कम रह गए गिद्ध

कानपुर चिड़ियाघर में गिद्ध संरक्षण के लिए बनेगा ब्रीडिंग सेंटर, पांच साल में आधे से कम रह गए गिद्ध बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.अल्का दुबे ने जानकारी साझा की. By ETV Bharat Uttar Pradesh Team Pub…

ETV Bharat के अनुसार21 अगस्त 2026 को 09:56 am बजे
कानपुर चिड़ियाघर में गिद्ध संरक्षण के लिए बनेगा ब्रीडिंग सेंटर, पांच साल में आधे से कम रह गए गिद्ध

सौजन्य से:- ETV Bharat

कानपुर चिड़ियाघर में गिद्ध संरक्षण के लिए बनेगा ब्रीडिंग सेंटर, पांच साल में आधे से कम रह गए गिद्ध

बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.अल्का दुबे ने जानकारी साझा की.

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : August 21, 2026 at 3:00 PM IST

कानपुर : पिछले पांच साल में जिस तरह सूबे में गिद्धों की संख्या घटी, उससे वन विभाग से लेकर पूरे देश के पर्यावरणविदों समेत अन्य जन काफी चिंतित हैं. खुद बॉम्बे नेचुलर हिस्ट्री सोसाइटी के वैज्ञानिकों ने इसका कारण पता लगाया तो वे भी हैरान रह गए. पांच साल पहले यूपी में जिन गिद्धों की संख्या 700-800 के बीच थी, वह घटकर अब 200-300 रह गई, पर आसमान में इनकी संख्या एक बार फिर बढ़े और यह स्वतंत्र होकर उड़ सकें इसके लिए अब कानपुर जू में जल्द ही गिद्धों के लिए ब्रीडिंग सेंटर बनाया जाएगा.

कानपुर जू पहुंची बॉम्बे नेचुलर हिस्टी सोसाइटी की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ.अल्का दुबे ने यह जानकारी मीडिया से साझा की. उन्होंने बताया, ब्रीडिंग सेंटर बनाए जाने के संदर्भ में जू निदेशक से बात हो गई है. चिड़ियाघर का परिसर बहुत बड़ा है, यहां की हरियाली बहुत अच्छी है. कई वन्यजीव ऐसे हैं, जिनका लगातार प्रजनन होता है और प्रजनन दर भी अच्छी है. इसे देखते हुए गिद्धों को यहां हम प्रजनन का मौका देंगे.

डाॅ. अल्का दुबे ने बताया कि यूपी में गिद्धों की आठ प्रजातियां मिलती हैं. गिद्धों की संख्या तेजी से बढ़ाने के लिए हमें पूरे देश में अधिक से अधिक ब्रीडिंग सेंटर बनाने होंगे. गिद्ध सालभर में एक बार ही अंडे देते हैं. इसलिए दूसरे पक्षियों की अपेक्षा उनकी संख्या धीरे-धीरे बढ़ती है. गिद्ध केवल मृत जीवों को ही खाते हैं. इसलिए उनका संरक्षण करने में किसी भी जू के अफसरों को कोई परेशानी भी नहीं होगी. ब्रीडिंग सेंटर बनने से गिद्धों की संख्या में इजाफा होगा, जो इस प्रकृति के लिए भी फायदेमंद साबित होगा.

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