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ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार बढ़ी, तो बढ़ेगा भूकंप का खतरा ! IIT कानपुर ने बताया कैसे बदल रहा हिमालय का संतुलन

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय में भूगर्भीय संतुलन बदल सकता है और भूकंप का खतरा बढ़ सकता है। गंगा के मैदानी इलाकों में भूगर्भ जल के ज्यादा दोहन से जमीन धंसने की घटनाएं भ…

Navbharat Times के अनुसार10 सितंबर 2026 को 09:04 am बजे
ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार बढ़ी, तो बढ़ेगा भूकंप का खतरा ! IIT कानपुर ने बताया कैसे बदल रहा हिमालय का संतुलन

सौजन्य से:- Navbharat Times

आईआईटी कानपुर के प्रोफेसर जावेद एन. मलिक के अनुसार ग्लेशियरों के पिघलने से हिमालय में भूगर्भीय संतुलन बदल सकता है और भूकंप का खतरा बढ़ सकता है। गंगा के मैदानी इलाकों में भूगर्भ जल के ज्यादा दोहन से जमीन धंसने की घटनाएं भी बढ़ रही हैं।

कानपुर: ग्लेशियर टूटने के बाद नेपाल में आई तबाही पर आईआईटी कानपुर के अर्थ साइंसेज विभाग ने कहा है कि ग्लेशियर पिघलने या टूटने की घटनाएं बढ़ी तो भूकंप का खतरा भी बढ़ सकता है। प्रफेसर जावेद एन. मलिक ने कहा कि ग्लेशियरों पर मौजूद बर्फ के कारण नीचे चट्टानों पर दबाव है। भूगर्भ में यूरेशियन और तिब्बती प्लेटों के चलते चट्टानों में दरारें बनती हैं ग्लेशियर पिघलेंगे या टूटेंगे तो पानी दरारों में जाएगा और चट्टानों की ताकत कम होगी। ज्यादा मात्रा में बर्फ पिघलेगी और ग्लेशियर पीछे हटेंगे तो प्लेटों पर दबाव कम होगा। ये प्रक्रिया एक किस्म का 'संतुलन' है। इससे भूगर्भीय प्लेट ऊपर की तरफ आएंगी। इससे भी भूकंप आने की आशंका बढ़ जाएगी। विज्ञान की भाषा में इसे 'आइसोस्टेटिक बैलेंस' कहा जाता है।

प्रफेसर मलिक ने कहा कि हिमालय की क्षमता अधिकतम 8.5 मेग्निट्यूड तक भूकंप की है। हमें ये देखना होगा कि ग्लेशियर किस रफ्तार से पिघल रहे हैं।

यदि हम मान लेते हैं कि ग्लेशियरों के पिघलने का क्रम शुरू हुआ हो गया है, तो इस प्रक्रिया पर नज़र रखनी होगी।

अनलोडिंग की प्रक्रिया में हिमालय भूकंप की वजह बन सकता है।

एक सवाल के जवाब में प्रफेसर मलिक ने कहा कि 2015 में नेपाल में आए भूकंप से ऊर्जा पूरी तरहबाहर नहीं निकली थी।

मंगलवार रात भी नेपाल में रिक्टर स्केल पर 5 की तीव्रता का भूकंप आया था।

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि इस ऊर्जा को निकालने के क्रम में नेपाल में अगले 50-100 साल में नए भूकंप आने की आशंका है।

भूगर्भ जल खींचने से भी जलजले

नेपाल में 2015 के भूकंप के बाद जारी अलग-अलग अध्ययनों से एक बात साफ हुई कि गंगा के मैदानी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर जमीन से पानी का दोहन किया जा रहा है। इस पानी का खेती में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है। ज़मीन से पानी निकालने से नीचे मौजूद मिट्टी या बालू में खाली जगह बनती है। इस खाली जगह में 'कॉम्पैक्शन' होता है। इससे उत्तर के मैदानी इलाकों में ज़मीन धंसने की घटनाएं बढ़ी हैं। लेकिन शहर के छोटे गड्ढों का इससे कोई लेनादेना नहीं है। चंडीगढ़ और पंजाब में लगे जीपीएस स्टेशनों से इसके बारे में पता चलता है। माना जा रहा है कि नेपाल में 2015 के भूकंप की एक संभावित वजह अनलोडिंग भी हो सकती है।

दब रही पेसिफिक प्लेट

रूस, वेनेजुएला, जापान में भूकंपों और इंडोनेशिया में ज्वालामुखी फटने की घटनाएं आपस में जुड़ी हुई हैं। इसे रिंग ऑफ फायर कहते हैं। इसकी वजह पेसिफिक प्लेट का नीचे जाना है। ऐसे पहले भी हो चुका है। हर सदी में सेस्मिक गतिविधियां जारी रहती हैं, लेकिन ये कभी कम तो कभी ज्यादा होती हैं। हिमालय के मध्य क्षेत्र में 20वीं सदी के बाद अब तक कोई बड़ा भूकंप नहीं आया है। इसे 'सेंट्रल सेस्मिक गैप' कहते हैं। इससे पंजाब और हिमाचल में भूकंप की आशंका ज्यादा है। इसके अलावा अंडमान-निकोबार भी भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील प्रतीत हो रहा है।

लेखक के बारे मेंप्रवीन मोहताप्रवीन मोहता पत्रकारिता की दुनिया में 21 साल से हैं। शुरुआती कई साल डेस्क पर देने के बाद 2013 में रिपोर्टिंग का मौका मिला। कर्मभूमि बनी अपना ही शहर कानपुर। कभी कासगंज , फिरोजा़ाबाद से लेकर बुंदेलखंड और प्रयागराज का कुंभ तक कवर किया। कई चुनाव, बवाल, ट्रेन एक्सिडेंट्स और आईआईटी कानपुर से टेक की खबरें कवर कीं। अध्यात्म, साइंस, टेक्नॉलजी, पर्सावरण और सामाजिक मुद्दों में विशेष दिलचस्पी।... और पढ़ें

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