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‘दख़ल देने का हक़ नहीं’, सहमति से शादी करने वालों की जांच को लेकर कोर्ट ने यूपी पुलिस पर जुर्माना लगाया

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस को फटकार लगाई है. पुलिस दो बालिग लोगों की शादी की जांच कर रही थी, जबकि दोनों ने कहा था कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की है. द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, ज…

thewirehindi.com के अनुसार31 जुलाई 2026 को 07:18 am बजे
‘दख़ल देने का हक़ नहीं’, सहमति से शादी करने वालों की जांच को लेकर कोर्ट ने यूपी पुलिस पर जुर्माना लगाया

सौजन्य से:- thewirehindi.com

नई दिल्ली: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में उत्तर प्रदेश पुलिस को फटकार लगाई है. पुलिस दो बालिग लोगों की शादी की जांच कर रही थी, जबकि दोनों ने कहा था कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की है.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की डिवीजन बेंच ने कहा कि पुलिस को ऐसे मामलों में ‘बिना वजह दखल देने’ का कोई अधिकार नहीं है.

इस संबंध में हाईकोर्ट ने कहा, ‘किसी बालिग महिला द्वारा अपने जीवनसाथी को चुनने और देश के दो बालिग नागरिकों के बीच हुई शादी की जांच करना न सिर्फ़ आपराधिक कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है, बल्कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का भी गंभीर उल्लंघन है.’

उल्लेखनीय है कि यह युगल तब कोर्ट पहुंचा, जब महिला के पिता की शिकायत पर पुलिस ने महिला के पति के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी. पिता का आरोप था कि उस व्यक्ति ने ‘उनकी बेटी को शादी के लिए बहला-फुसला लिया था.’

हालांकि, दोनों याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से शादी की है और पुलिस उन्हें गैर-कानूनी तरीके से अलग करने की कोशिश कर रही थी, जबकि महिला ने साफ़ तौर पर अपने पति के साथ रहने का फैसला किया था.

अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा, ‘एक बालिग व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति से शादी करने की आज़ादी है. पुलिस को इस मामले में दखल देने का कोई अधिकार नहीं है. हमने बार-बार पुलिस को याद दिलाया है कि शादियों की जांच करना उनका काम नहीं है. उन्हें अपराधों की जांच करनी चाहिए. यह ऐसा मामला नहीं है, जिसमें किसी जांच की ज़रूरत हो.’

कोर्ट ने यह भी माना कि पुलिस महिला के पिता का पक्ष ले रही थी. इसके बाद अदालत ने पुलिस अधिकारियों और शिकायतकर्ता, दोनों पर जुर्माना लगाया.

कोर्ट ने पुलिस अधीक्षक (एसपी) और थाना प्रभारी (एसएचओ) को संयुक्त रूप से महिला याचिकाकर्ता को 1,000 रुपये देने का आदेश दिया, जबकि उसके पिता को 5,000 रुपये का जुर्माना भरने का आदेश दिया.

गौरतलब है कि इससे पहले भी इलाहबाद हाईकोर्ट ने अप्रैल के महीने में अपने एक फैसले के दौरान एक पिता द्वारा उनकी बालिग बेटी के ‘अपहरण’ और विवाह के लिए मजबूर करने संबंधी एफआईआर रद्द करते हुए कहा था कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है तो किसी को भी यह बताने का अधिकार नहीं है कि वह किसके साथ रहेगा, किससे शादी करेगा या अपना जीवन कैसे बिताएगा.

तब भी जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की पीठ थी और अदालत ने पुलिस द्वारा अन्य अपराधों की जांच करने के बजाय सहमति से हुए विवाहों की एफआईआर दर्ज कर, जांच करने की ‘चिंताजनक प्रवृत्ति’ को उजागर करते हुए उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को ऐसे मामलों में सुधारात्मक कार्रवाई करने का निर्देश दिया था.

वहीं, दिल्ली हाईकोर्ट भी इस साल फरवरी के महीने में दिए अपने एक फैसले में यह साफ कर चुका है कि सहमति से विवाह करने वाले वयस्कों को शादी करने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है. उनके इस फैसले में न तो समाज, न ही सरकारी मशीनरी और न ही उनके माता-पिता दख़ल दे सकते हैं.

अदालत ने अपने फैसले में दोहराया था कि विवाह करने का अधिकार मानवीय स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और यह इंसान की व्यक्तिगत पसंद का मामला है. यह अधिकार न केवल मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा में निहित है, बल्कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का भी अहम पहलू है.

न्यायालय ने कहा था कि अनुच्छेद 21 जीवन के अधिकार की गारंटी देता है और सभी व्यक्तियों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें सहमति देने वाले वयस्क भी शामिल हैं जिन्हें व्यक्तिगत विकल्प चुनने का अंतर्निहित अधिकार है, विशेष रूप से विवाह से संबंधित मामलों में.

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