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दैन‍िक जागरण वाराणसी के 45 वर्ष पूरे, 'जागरण' का अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों - dainik jagran varanasi completes 45 years the meaning of jagran encompasses both to awaken and to rouse others

दैनिक जागरण वाराणसी के 45 वर्ष पूरे, 'जागरण' का अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों दैनिक जागरण वाराणसी ने अपनी स्थापना के 45 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसका अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों है। इस अवसर पर सनबीम वरुणा में एक भव्य आयो…

Jagran के अनुसार21 अगस्त 2026 को 06:55 am बजे
दैन‍िक जागरण वाराणसी के 45 वर्ष पूरे, 'जागरण' का अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों
 - dainik jagran varanasi completes 45 years the meaning of jagran encompasses both to awaken and to rouse others

सौजन्य से:- Jagran

दैनिक जागरण वाराणसी के 45 वर्ष पूरे, 'जागरण' का अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों

दैनिक जागरण वाराणसी ने अपनी स्थापना के 45 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जिसका अर्थ 'जागना' और 'जगाना' दोनों है। इस अवसर पर सनबीम वरुणा में एक भव्य आयोजन किया गया, जहां वक्ताओं ने जागरण की पत्रकारिता और सांस्कृतिक योगदान पर प्रकाश डाला।

HighLights

- दैनिक जागरण वाराणसी ने पूरे किए 45 गौरवशाली वर्ष।

- 'जागरण' का अर्थ है 'जागना' और 'जगाना' दोनों।

- पत्रकारिता, संस्कृति और समाज में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। जागरण का अर्थ जागना और जगाना दोनों है। इसी सातत्य में इसे नवजागरण, पुनर्जागरण आदि नामों से जाना जाता है। यह बताता है कि रोज ही जागरण की जरूरत बनी रहती है। एक बार जगा देने से जो हमेशा के लिए जाग जाए, ऐसा कोई समाज है ही नहीं। बार-बार जगाना पड़ता है, फिर सोते हैं, फिर जगाना पड़ता है।

यह हमारे उस दर्शन से मेल खाता है जहां मृत्यु के बाद जीवन है। काशी में 21 अगस्त 1981 को स्थापित दैनिक जागरण ने अपने नाम के अनुरूप दैनिक जागरण के रूप में अपने आप को स्थापित किया। यह स्थापित तो था ही फिर भी इसने इसे इंगित किया। शुक्रवार को दैनिक जागरण काशी में अपनी स्थापना के 45 वर्ष को हर्षोल्लास के साथ मना रहा है। 45वें स्थापना दिवस पर प्रमुख आयोजन सनबीम वरुणा में आयोजित किया गया है।

जागरण एक दैनिक जरूरत : डा. रामसुधार सिंह

कोई भी अखबार, टीवी चैनल तथा साहित्य सभी जनता के भीतर अपनी जगह दो तरीके से बनाते हैं, पहला-जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे और दूसरा- हम आपकी पसंद बदल देंगे। दैनिक जागरण के बारे में मैं नहीं कह सकता कि उसने दोनों में कौन सा मार्ग चुना है। यह दैनिक जागरण को विचार करना है। कोई भी अखबार राजनीति, खेल, सिनेमा, साहित्य, बच्चे, गृहिणी जैसे सेक्शन से अपने को समृद्ध करता है। इसके लिए अलग-अलग पन्ने होते हैं। दैनिक जागरण ने इस दिशा में सही भूमिका निभाई है।

दिन के अनुसार इन स्तंभों को प्रस्तुत करना इस अखबार की अपनी नीति है। एक सामान्य पाठक के दिमाग में हमेशा सनसनी वाली खबरें होती हैं। जरूरी यह है कि कोई अखबार नकारात्मक व सकारात्मक किस पर जोर दे रहा है। अखबार एक प्रभाव पैदा करता है और प्रभावित भी होता है। अगर यह आरोप लगता है कि वह किसी खास पक्ष से प्रभावित है तो उसकी चुनौती बढ़ जाती है। दैनिक जागरण जैसे अखबार के लिए भी इस चुनौती का सामना अवश्य करना पड़ता होगा।

एक पाठक के रूप में मैं कह सकता हूं कि दैनिक जागरण जो खबरें देता है प्रमाण है कि वह किसी पक्ष से प्रभावित नहीं है। अखबार को सदा इस कसौटी पर खरा उतरना होगा। एक यह जुमला चलता है कि आज का ताजा समाचार कल का रद्दी अखबार। जागरण इसका अपवाद है। कई लोग हैं जो दैनिक जागरण के संपादकीय पन्ने को काट कर रखते हैं। संपादकीय आलेखों का एक और महत्वपूर्ण उपयोग मैंने देखा है। संपादकीय पृष्ठ पर अक्सर लिखने वाले प्रोफेसर गिरीश्वर मिश्र तथा ठाकुर जगमोहन सिंह की इन्हीं आलेखों की पुस्तक प्रकाशित हुई है।

बनारस में अध्ययन हेतु मेरा आना पिछली सदी के सातवें दशक में हुआ, उस समय यहां एक ही महत्पूर्ण अखबार था। शहर ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वांचल के गांव-गांव तक उसकी पहुंच थी। एक विद्यार्थी के रूप में सभी उसकी प्रतीक्षा करते थे। वह साहित्य का दस्तावेज हुआ करता था। संध्याकालीन अखबारों का भी अपना बोलबाला था। उसकी अपनी खूबियां थीं। अस्सी के बाद समय बदला, शहर का मिजाज बदला और पाठक की रुचि भी बदली। इसी समय दैनिक जागरण ने यहां पदार्पण किया।

दैनिक जागरण की मूल विचारधारा राष्ट्रहित, भारतीय सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता, लोकतांत्रिक मूल्यों और विकास केंद्रित राष्ट्रवाद के इर्द-गिर्द है। जागरण की स्थापना उन्नीस सौ बयालीस में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हुई थी। इसके संस्थापक पूर्णचंद्र गुप्त का घोषित उद्देश्य था ऐसा अखबार बनाना जो जनता की स्वतंत्र आवाज बने। इसके संपादकीय लेखों में सशक्त भारत, समरस भारत, सामाजिक एकता और विकसित राष्ट्र लगातार दिखाई देते हैं।

मुझे ज्ञात है कि आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधान संपादक नरेंद्र मोहन द्वारा सेंसरशिप के विरोध में संपादकीय कालम खाली छोड़ना पत्रकारिता के इतिहास का महत्वपूर्ण उदाहरण है। मैं जागरण के वाराणसी संस्करण के पैंतालीस वर्ष पूर्ण होने पर शुभकामनाएं देता हूं। एक और बात जो उल्लेखनीय रही है, वो ये कि कोरोना काल में जान की परवाह न करते हुए इसके पत्रकारों ने लोगों तक सूचनाएं पहुंचाईं। यह दिखाता है कि कितने समर्पित लोगों के कारण दैनिक जागरण ने आज अपना यह मुकाम बनाया है।

नई इबारत की शुरुआत : पं. व्योमेश शुक्ल

बनारस का सांस्कृतिक कैलेंडर पर्व, नहान, व्रत-उपवास और मेलों-ठेलों से गुंजायमान रहता आया है। धुरंधर शहर का यह धुरंधर कैलेंडर सभ्यता की शोभा है, शहर की पहचान और प्रतिष्ठा का कभी धुंधला न पड़नेवाला बिंब है। इस शहर में परंपरा की स्लेट पहले से ही इबारतों से भरी है। उस पर अल्पविराम की जगह मुश्किल से मिलेगी। ऐसी परिस्थिति में आज से 45 बरस पहले दैनिक जागरण ने अपनी खड़िया से बीच की खाली जगह में एक नई इबारत लिखने का आगाज किया था।

बनारस-हिंदी भाषा, नागरी लिपि और पत्रकारिता का विशाल वटवृक्ष जिसका अतीत इतना महान था कि उसके अभिनंदन के लिए हर बार विशेषण कम पड़ जाते थे। वहीं अपना नन्हा गुलाब रोपना था। व्यतीत के सम्मुख वर्तमान को प्रबल बनाना था। साथ ही उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा भी तैयार करनी थी। जो हो चुका था, बेशक उसकी महत्ता को स्वीकार करना था, लेकिन उसके आगे हार नहीं मान लेनी थी। मैं 46 बरस का हूं और बनारस का दैनिक जागरण आज 45 बरस पूरे कर रहा है। हम दोनों हमउम्र हैं।

मैंने बड़ा होने में पर्याप्त समय लगाया, लेकिन जागरण के पास यह सुविधा नहीं थी। उसे जन्म के दिन से ही वयस्कों से पंजा लड़ाना था। मूर्धन्यता का अपना दबाव होता है, लेकिन जागरण ने इसका सामना पूरे उत्साह और आत्मवत्ता के साथ किया और आज, तारीख गवाह है, उसने अपने ढंग से इबारत को पलटकर रख दिया। बीते साढ़े चार दशकों में इस शहर ने दंगे देखे, प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया, राग और रंग का उल्लास तो नसों में रक्त की तरह बहा ही-मूर्धन्यों का जाना भी देखा।

काशी नरेश डाक्टर विभूति नारायण सिंह, पंडित कमलापति त्रिपाठी, पंडित किशन महाराज, पंडित सामता प्रसाद और विदुषी गिरिजा देवी की अंतिम यात्राएं मेरी पीढ़ी के ज्यादातर लोगों की स्मृति में जागरण के रास्ते से भी चलकर आई हैं। यों, जागरण ने पीढ़ी दर पीढ़ी, ख़बरों का ही नहीं, स्मृति का भी निर्माण किया है। आज से बीस बरस पहले देश के अनूठे शहनाईनवाज भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की मृत्यु और उनके जनाजे के शोक को जागरण ने जितनी संजीदगी, करुणा, विस्तार और गहनता से कहा, उसकी मिसाल ढूंढना मुश्किल है।

अपनी मिट्टी के इस लाल को खोकर शहर अवसन्न था, लेकिन पाठक विडंबनाओं को भी जान लेना चाहते थे। उस्ताद का जीवन, उनका रियाज, मंदिरों, त्योहारों और गंगाजी और बालाजी मंदिर से उनका अनुराग-अखबार के पाठक के मन में ये सब जान लेने की आकांक्षा थी। पूरा देश स्थानीय संस्करणों की ओर देख रहा था। घटना के कुछ दिनों बाद बाद पोस्ट फैक्टो लिखना आसान है-तथ्य तब तक सतह पर आ चुके होते हैं-उन्हें चुन लेना आसान हो जाता है।

घटना के कुछ घंटों के भीतर ही विषय पर पृष्ठ निकालना गोताखोरी का काम है। आगे चलकर यही पृष्ठ सामाजिक-सांस्कृतिक इतिहासकारों के बड़े काम आते हैं। उस्ताद के तिरोधान के अवसर पर जागरण ने जो पन्ने निकाले वे काशी के सांस्कृतिक इतिहास के विलक्षण अभिलेख हैं। जागरण ने शहर को पहचाना। रोग, शोक, हंसी व खुशी के प्रसंगों को दर्ज किया। नागरीप्रचारिणी सभा के पुस्तकालय में संरक्षित फाइल्स उसकी गौरवयात्रा का अनूठा स्मारक हैं।

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