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योगी ने 'मदरसा वेतन विधेयक' को कानून बनने से रोका, क्या मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश ने संवैधानिक सिद्धातों को किया था नजरअंदाज ?

मोदी सरकार का एक संवैधानिक फैसला और बदल गया इतिहास, जानिए 7 साल में अनुच्छेद 370 और 35A के हटने पर क्या बदला ' मदरसा वेतन विधेयक ' का मामला क्या है और विवाद की शुरुआत कैसे हुई? - साल 2016 में तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरक…

Navbharat Times के अनुसार6 अगस्त 2026 को 10:18 am बजे
योगी ने 'मदरसा वेतन विधेयक' को कानून बनने से रोका, क्या मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए अखिलेश ने संवैधानिक सिद्धातों को किया था नजरअंदाज ?

सौजन्य से:- Navbharat Times

मोदी सरकार का एक संवैधानिक फैसला और बदल गया इतिहास, जानिए 7 साल में अनुच्छेद 370 और 35A के हटने पर क्या बदला

' मदरसा वेतन विधेयक ' का मामला क्या है और विवाद की शुरुआत कैसे हुई?

- साल 2016 में तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार ने मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों के वेतन भुगतान से संबंधित एक विधेयक विधानसभा से पारित कराया। सरकार का उद्देश्य मदरसा कर्मचारियों के वेतन के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनाना बताया गया था। हालांकि विधेयक के कुछ प्रावधानों पर उसी वक्त संवैधानिक सवाल उठे थे।

- विधेयक में यह नियम बनाया गया था कि यदि मदरसा शिक्षकों और कर्मचारियों का वेतन समय पर नहीं मिले तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाएगा। ऐसे और भी प्रावधान थे जो साफ लग रहे थे कि मुस्लिम तुष्टिकरण को ध्यान में रखते हुए संविधान के तहत समानता के सिद्धांत को नजरअंदाज कर दिए गए थे

- इसमें कुछ वर्गों के कर्मचारियों को सामान्य कानूनी प्रक्रिया से अलग संरक्षण मिलता है, यह भी आरोप लगे थे। उस समय इसी वजह से विपक्ष और विधि विशेषज्ञों ने आपत्ति दर्ज कराई।

- सदन से पास होने के बाद विधेयक राज्यपाल के पास पहुंचा, लेकिन उन्होंने इसे मंजूरी नहीं दी। फिर बाद में इसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख दिया गया।

राज्यपाल ने विधेयक को राष्ट्रपति के पास क्यों भेजा?

बात यह है कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को यह अधिकार देता है कि यदि किसी राज्य विधेयक पर संवैधानिक संदेह हो तो वह उसे राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकते हैं। जैसी कि उस वक्त की मीडिया रिपोर्ट कहती है, कि तब के राज्यपाल राम नाईक ने माना कि विधेयक के कुछ प्रावधान संविधान के मूल सिद्धांतों से टकरा सकते हैं। इसके बाद मामला राष्ट्रपति के पास भेजा गया। जब तक राष्ट्रपति की स्वीकृति नहीं मिलती, ऐसा विधेयक कानून नहीं बनता।राहुल गांधी के खिलाफ 'ED जांच को ग्रीन सिग्नल', इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का लीगल एंगल जानें

संविधान का समानता सिद्धांत इस मामले में कैसे जुड़ता है?

- दरअसल, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 सभी व्यक्तियों को कानून के समक्ष समानता और समान कानूनी संरक्षण की गारंटी देता है। इस विधेयक को लेकर भी समानता का सिद्धांत इस बहस का केंद्रीय कानूनी मुद्दा बना हुआ है।

- सरकार का तर्क है कि किसी एक वर्ग को विशेष कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधान इस सिद्धांत से मेल नहीं खाते। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो सभी वर्गों के हित के लिए हों।

- समाजवादी सरकार में सदन से बिल पास होने के बाद भी यही कारण बताते हुए राज्यपाल ने बिल को पहले अपने पास रोका था , फिर विचारार्थ राष्ट्रपति के पास भेजा था।

- अब योगी आदित्यनाथ की सरकार में भी इस विधेयक को जो अभी तक कानून नहीं बना था, संवैधानिक समानता के सिध्दांतों के खिलाफ पाते हुए पुराने विधेयक को वापस लेना उचित समझा गया।

- हालांकि किसी भी संवैधानिक प्रश्न का अंतिम निर्णय न्यायालय ही करता है। पर इस मामले में विधेयक कानून नहीं बना, इसलिए इसकी न्यायिक वैधता पर कोई अंतिम फैसला नहीं आया।

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