यूपी की राजनीति में कितना कमाल करेंगे अमिताभ और अलंकार, पहले भी अफसरों ने बनाई पार्टी, फ्लॉप रहे
यूपी की राजनीति में कितना कमाल करेंगे अमिताभ और अलंकार, पहले भी अफसरों ने बनाई पार्टी, फ्लॉप रहे रजनीश त्रिगुणायत के संपादन के साथ लखनऊ से अखिल पांडेय की खास रिपोर्ट... By ETV Bharat Uttar Pradesh Team Published : Septem…

सौजन्य से:- etvbharat.com
यूपी की राजनीति में कितना कमाल करेंगे अमिताभ और अलंकार, पहले भी अफसरों ने बनाई पार्टी, फ्लॉप रहे
रजनीश त्रिगुणायत के संपादन के साथ लखनऊ से अखिल पांडेय की खास रिपोर्ट...
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 7, 2026 at 5:07 PM IST
|Updated : September 7, 2026 at 6:57 PM IST
लखनऊ : नौकरी से रिटायर होकर या इस्तीफा देकर राजनीति में आना ब्यूरोक्रेसी के लोगों के लिए कोई नई बात नहीं है. उत्तर प्रदेश में ऐसे कई ब्यूरोक्रेट्स हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट या रिजाइन देकर पॉलिटिक्स का रुख किया और मंत्री तक बने. राजनीति के क्षेत्र में कई नाम ऐसे मिल जाएंगे, जिन्होंने करियर तो अफसरशाही से शुरू किया, लेकिन बाद में राजनीति का रास्ता चुना और अपनी पार्टी बनाई. लेकिन कमाल नहीं कर पाए.
यूपी के दो पूर्व ब्यूरोक्रेट्स अपनी पार्टी बनाकर 2027 चुनाव विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं. इनमें खुद को जबरिया रिटायर्ड IPS लिखने वाले अमिताभ ठाकुर हैं, जिनकी पार्टी आजाद अधिकार सेना है. दूसरे बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट पद पर रहे पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्रिहोत्री ने यूजीसी को काला कानून मानते हुए इस्तीफा दे दिया. राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा (R.A.M.) नाम से राजनीतिक पार्टी का गठन किया है. आगामी चुनाव में अपने प्रत्याशी उतारने का भी एलान किया है.
हालांकि, अभी तक पूर्व नौकरशाहों की अपनी पार्टियां कोई खास करिश्मा नहीं कर पाईं. वहीं सत्ता पार्टी में शामिल हुए ब्यूरोक्रेट्स मंत्री तक बनाए गए हैं. इनमें IPS रहे असीम अरुण, IPS रहे राजेश्वर सिंह, IAS रहे एके शर्मा को मंत्री बनाया गया है. IPS रहे बृजलाल राज्य सभा से सांसद हैं. पूरे देश में ही IAS और IPS अफसरों का सियासत में आना पहली पसंद रहा है. यूपी में ये ट्रेंड कुछ ज्यादा ही देखने को मिला है.
पूर्व IPS अमिताभ ठाकुर ने बनाई 'आजाद अधिकार सेना' :यूपी की सियासत में पूर्व IPSअमिताभ ठाकुर का नाम लगातार चर्चा में बना रहता है. अपनी बेबाकी के लिए मशहूर अमिताभ को समय से पहले ही सरकार ने कंप्लसरी रिटायरमेंट दे दिया था. इसके बाद उन्होंने अपने समर्थकों से विचार-विमर्श कर एक नई राजनीतिक पार्टी बनाई. नाम रखा 'आजाद अधिकार सेना'.
पार्टी के गठन का एलान होते ही अमिताभ ठाकुर को घेरने के प्रयास शुरू हो गए. उन्हें पहले घर में नजरबंद किया गया. इसके बाद दिल्ली सुप्रीम कोर्ट के बाहर रेप पीड़िता के आत्मदाह करने के मामले में केस दर्ज कर घर से कोतवाली ले जाया गया. उसके बाद जेल भेज दिया गया. अब वे पूरे दमखम के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुटे हैं. 100 सीटों पर पार्टी के उम्मीदवार उतारना चाहते हैं. अब तक 35 उम्मीदवार घोषित भी हो गए हैं. शेष जल्द घोषित किए जाएंगे. उनका मानना है हार जीत की बात अलग, जनता की सेवा करना ही उद्देश्य है.
पूर्व पीसीएस अलंकार अग्निहोत्री ने बनाई राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा पार्टी (राम) :बरेली में सिटी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात रहने के दौरान यूजीसी जैसा कानून सामने आया तो अलंकार अग्निहोत्री चुप नहीं बैठे. उन्होंने विरोध करना शुरू कर दिया. सामान्य वर्ग के समस्याओं को लेकर जब उनका विरोध बढ़ गया, तो सरकार को यह बात खटक गई. बात बढ़ी तो पीसीएस अलंकार अग्निहोत्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.
समर्थकों से विचार- विमर्श कर अगले विधानसभा चुनाव में जनता के बीच जाने का फैसला ले लिया. उन्होंने राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा नाम की पार्टी गठित की और अब इसका तेजी से विस्तार करने में जुटे हैं. उनका दावा है कि अब तक उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों के साथ ही देश के चार अन्य राज्यों में हमारी पार्टी का नेतृत्व मौजूद है. अलंकार अग्रिहोत्री का दावा है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में हमारी पार्टी के बिना यूपी में किसी पार्टी की सरकार नहीं बनेगी.
पूर्व डीजीपी ने भी बनाई पार्टी, कोई करिश्मा नहीं :उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे सुलखान सिंह ने बुंदेलखंड क्षेत्र के डेवलपमेंट और अलग राज्य की मांग के लिए बुंदेलखंड लोकतांत्रिक पार्टी गठित की. 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने उम्मीदवार भी उतारे थे, लेकिन वह अपनी छाप नहीं छोड़ पाए. अब विधानसभा चुनाव में पार्टी बुंदेलखंड क्षेत्र में इस बार ताल ठोंकने को तैयार है.
पूर्व IAS चंद्रपाल भी फेल :पूर्व प्रशासनिक अधिकारी चंद्रपाल ने आदर्श समाज पार्टी बनाई. 2009, 2014 और 2024 का लोकसभा चुनाव इनकी पार्टी ने लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली. अभी भी सफलता के लिए जद्दोजहद जारी है.
पूर्व IAS तपेंद्र प्रसाद शाक्य ने सम्यक पार्टी का गठन किया. 2019 का लोकसभा चुनाव और 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने अपने उम्मीदवार उतारे, लेकिन कामयाबी नहीं मिली. अब स्वामी प्रसाद मौर्य के गठबंधन के साथ चुनाव की तैयारी कर रहे हैं. पार्टी को उम्मीद है कि स्वामी प्रसाद मौर्य के साथ मिलकर राजनीतिक मैदान में सफलता मिल जाएगी.
हालांकि, बहुजन समाज पार्टी से लेकर भारतीय जनता पार्टी में कैबिनेट मंत्री रहे और फिर समाजवादी पार्टी से विधान परिषद सदस्य बने. स्वामी प्रसाद मौर्य भी अभी सफलता से दूर हैं. वह अपने साथ अपने समाज के नेताओं को जोड़कर सफलता पाने के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं.
IAS अरविंद कुमार शर्मा बन गए मंत्री :गुजरात कैडर के IAS रहे अरविंद कुमार शर्मा केंद्र सरकार में बड़े विभाग में सचिव के पद पर कार्यरत थे. नौकरी छोड़ उन्होंने राजनीति में कदम रखा. भाजपा में शामिल हुए. उन्हें यूपी से एमएलसी बना दिया गया. प्रधानमंत्री के करीबी पूर्व IAS एके शर्मा को यूपी में प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया.
भाजपा का उपाध्यक्ष बनने के बाद एके शर्मा लगातार यूपी में एक्टिव रहे. योगी सरकार के पहले कार्यकाल में तो उपमुख्यमंत्री दूर मंत्री बनने में भी सफल नहीं हो पाए, लेकिन जब योगी सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ तो अरविंद कुमार शर्मा जिस टारगेट के साथ राजनीति में आए थे उन्होंने इसमें सफलता पा ली. वर्तमान में नगर विकास एवं ऊर्जा मंत्री हैं.
कमल के साथ IPS असीम अरुण की पारी सफल :IPS असीम अरुण का भी राजनेता बनने का सपना साकार हो गया. योगी सरकार के 2.0 से पहले उन्होंने पुलिस सेवा से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा और पार्टी ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को एक बड़ा दलित नेता मिल गया. असीम अरुण की किस्मत चमक गई. IPS रहे असीम अरुण वर्तमान में उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार में समाज कल्याण मंत्री हैं.
पहले अधिकारी, अब बन गए विधायक :वर्तमान में सरोजिनी नगर विधानसभा सीट से राजेश्वर सिंह भारतीय जनता पार्टी के विधायक हैं. काफी सालों तक पुलिस सेवा में रहने के बाद उन्होंने राजनीति की तरफ रुख किया. उनका पूरा कुनबा ही प्रशासनिक सेवा में है. उत्तर प्रदेश में वर्तमान के डीजीपी राजीव कृष्ण भी उनके रिश्तेदार हैं. राजेश्वर सिंह ने प्रशासनिक सेवा को अलविदा कहकर राजनीति के क्षेत्र में कदम रखते हुए भारतीय जनता पार्टी का दामन थामा था. पहली बार 2022 का यूपी विधानसभा चुनाव लखनऊ की सरोजिनी नगर विधानसभा सीट से लड़ा और विधायक बन गए.
पूर्व DSP शैलेन्द्र सिंह को मिला भाजपा का सपोर्ट :पंजाब की जेल में बंद उत्तर प्रदेश के माफिया मुख्तार अंसारी पर पोटा लगाने वाले सैयदराजा क्षेत्र के फेसुड़ा गांव निवासी व पूर्व पुलिस उपाधीक्षक शैलेंद्र सिंह वर्तमान में जैविक खेती कर रहे हैं. स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे दादा रामरूप सिंह और पुलिस अफसर पिता स्वर्गीय जगदीश सिंह से बहादुरी विरासत में मिली थी. माफिया से मोर्चा लेने में जरा भी नहीं हिचकिचाए. इसके चलते नौकरी छोड़नी पड़ी.
1991 बैच के पीपीएस अधिकारी रहे शैलेंद्र सिंह मुख्तार प्रकरण के बाद 2004 में वाराणसी से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा का चुनाव लड़े. इसके बाद 2006 में कांग्रेस में शामिल हुए. उन्हें यूपी आरटीआई का प्रभारी बनाया गया. 2009 में कांग्रेस के टिकट पर चंदौली से लोकसभा का चुनाव लड़े. तीसरे स्थान पर रहे.
2012 में सैयदराजा विधानसभा से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े. इस बार भी जीत नहीं पाए. 2014 में नरेंद्र मोदी के संपर्क में आए और भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी के सदस्य बने. उन्हें लोकसभा चुनाव में वार रूम की जिम्मेदारी मिली. वे सड़कों पर और किसानों की फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले बेजुबानों को अपनी गोशाला में आश्रय देते हैं. कृषि का आधार रहे बैलों के जरिए बिजली भी पैदा कर रहे हैं. वह जैविक खेती भी कर रहे हैं.
रिटायर्ड IAS पीएल पुनिया हर सरकार में रहे खास :पंजाब के रहने वाले रिटायर्ड IAS पीएल पुनिया इन अधिकारियों के रोल माॅडल के रूप में काम कर रहे हैं. पीएल पुनिया पहले मुलायम सरकार में उनके खास सिपहसालार थे. फिर मायावती सरकार आई तो माया सरकार के खास हो गए. वे मायावती सरकार में प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री भी रहे. रिटायर होने के बाद पुनिया बाराबंकी की सुरक्षित संसदीय सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े. जीतने के बाद कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल के आखिरी दिनों में उन्हें अनुसूचित जाति आयोग का अध्यक्ष बनाकर मंत्री पद का दर्जा भी दे दिया. अब उनका बेटा भी राजनीति में है. तनुज पुनिया वर्तमान में बाराबंकी से सांसद हैं.
उत्तर प्रदेश पीसीएस एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष रहे बाबा हरदेव सिंह ने रिटायर होने के बाद राजनीति में अपनी किस्मत आजमाई. बाबा हरदेव राष्ट्रीय लोकदल के प्रदेश अध्यक्ष भी रहे. पूर्वी उत्तर प्रदेश के रहने वाले बाबा हरदेव राष्ट्रीय लोकदल से आगरा सीट से विधानसभा चुनाव लड़े. बुरी तरह हारने के बाद वे भाजपा में शामिल हो गए.
पढ़िए अमिताभ ठाकुर ने क्या कहा-
आजाद अधिकार सेना के प्रमुख अमिताभ ठाकुर का कहना है कि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी हमारे आकलन के अनुसार लगभग 100 सीटों पर पार्टी प्रत्याशी खड़े करेगी. हमने उस दिशा में अपना कार्य प्रारंभ कर दिया है. अभी तक हम लोगों ने लगभग 35 प्रत्याशियों के नाम का घोषणा कर दी है. हमारे पास अन्य प्रत्याशी लगातार आ रहे हैं. अपनी बात कह रहे हैं.
राजनीति में सफलता का अलग-अलग अर्थ : जहां तक बात ब्यूरोक्रेट्स के पार्टी स्थापित करने पर सफलता को लेकर है तो अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ है. अगर इस रूप में कहें कि जैसे अरविंद केजरीवाल ने आंदोलन के बाद पार्टी बनाई. चुनावी राजनीति में अत्यंत सफल हुए. कई बार मुख्यमंत्री रहे. एक और प्रदेश में सरकार बना दी. यदि उस तरह से देखें तो उन स्थितियों में हमारी पार्टी अभी दूर-दूर तक कहीं नहीं दिख रही है.
सिद्धातों के साथ करना है काम : यह भी सही है कि मैं स्वयं भी अन्य की बात के साथ यही चाहूंगा कि विधायक और सांसद बन जाऊं या फिर मंत्री बन जाऊं तो यह बहुत बड़ी बात नहीं होगी, लेकिन मेरे लिए सफलता का मतलब और विधायक, सांसद बन जाना या पद प्राप्त करना नहीं है, बल्कि उद्देश्य यह है कि अन्याय, अत्याचार और भ्रष्टाचार के विरोध में पारदर्शिता और उत्तरदायित्व के सिद्धांतों के साथ काम करना.
आम लोगों पर मेरा फोकस : आम नागरिक के अधिकार के संघर्ष के लिए हम लोग हमेशा तैयार रहते हैं. मैं समझता हूं एक बहुत छोटी पार्टी होने के बाद भी चुनावी रणनीति में लगभग पूरी तरह नगण्य हैं. यदि मैं विधायक, सांसद या मंत्री बन भी जाऊं तो भी जो मेरा फोकस, आम लोगोंं के प्रति लगाव और समर्पण का ही होगा.
पढ़िए अलंकार अग्निहोत्री ने क्या कहा-
अलंकार अग्निहोत्री ने कहा, उत्तर प्रदेश का एलआईयू, गृह विभाग, देश का गृह विभाग, और प्रधानमंत्री जानते हैं कि जब हमने सिटी मजिस्ट्रेट बरेली पद से इस्तीफा दिया था तो मुझे देशव्यापी समर्थन मिला था. सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व खत्म हो चुका था. सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व स्थापित करने के लिए मैंने इस्तीफा दिया था. मैंने बताया था कि देश के बच्चों को भाजपा बर्बाद करने के लिए काले कानून ला रही है.
सत्ताधारी दल कंपनी के रूप में काम कर रही : सामान्य वर्ग के जितने भी एमपी, एमएलए हैं, इस पर बोलने को लिए तैयार नहीं थे, क्योंकि यह जो सत्ताधारी दल है एक तरीके से कंपनी के रूप में काम करता है. कंपनी में जो एमपी, एमएलए हैं वह बंधुआ मजदूर के रूप में उनके एंप्लॉई के तौर पर, उनके सेवक के तौर पर काम कर रहे हैं. वह बोल नहीं पा रहे हैं. पटेल समाज का अपना प्रतिनिधित्व स्थापित करने के लिए अपना दल है.
चार राज्यों में किया विस्तार: एससी एसटी समाज का अपना प्रतिनिधित्व स्थापित करने के लिए बहुजन समाज पार्टी है. निषाद समाज के लिए निषाद पार्टी है. राजभर समाज के लिए सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी है. यादव समाज के कोर वोटर के लिए समाजवादी पार्टी है. सामान्य वर्ग का कोई भी प्रतिनिधित्व करने वाला नहीं है. देश में पहली बार ऐसा हुआ है जब 75 जिलों में और चार राज्यों में हमने पार्टी का विस्तार कर लिया है.
आंदोलन से निकली पार्टी के पास टारगेट : राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा तेजी से बढ़ रही है. रिटायरमेंट के बाद जो भी पार्टी बनाता है वह कोई व्यापक मुद्दा नहीं होते. जब भी आंदोलन के बाद कोई पार्टी बनती है तो उसका एक टारगेट होता है. यूजीसी का गजट प्रकाशित किया गया था, जबकि इसकी मांग नहीं थी. जब देश में बच्चों को लड़ाने का काला कानून लाया जाएगा तो यूजीसी रेगुलेशन 2026 के खिलाफ मैंने इस्तीफा दिया. कई ऐसे उदाहरण हैं जब आंदोलन से पार्टियां निकलती हैं तो उन्हें सफलता मिलती है.
403 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव: राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा के बिना भविष्य में किसी की सरकार नहीं बन पाएगी, यह मैं बता रहा हूं. हम 403 सीटों पर लड़ने के लिए तैयार हैं. अब गठबंधन की सरकार बनती है. एनडीए हो चाहे इंडिया गठबंधन हो. अगर दो पक्ष बने हुए हैं तो गठबंधन होता है. हम लोग भी जहां हमारा कोर वोटर 120 से 135 सीटों के बीच है वहां पर हम अकेले जाएंगे. बहुत सारी सीटें ऐसी हैं जहां पर 270 से 280 सीटें हैं. वहां पर एक विचारधारा वाले दल हैं, उनके साथ गठबंधन करने के लिए भी विचार भी चल रहा है. उस पर चर्चाएं भी चल रही हैं.
सफलता-असफलता जनता पर निर्भर : वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक अशोक मिश्रा का कहना है कि यह बात बिल्कुल सही है कि नौकरी के दौरान जिन अधिकारियों ने अच्छे काम किए, उनकी चर्चाएं खूब हुईं, लेकिन जब उन्होंने सियासत में कदम रखा तो सफलता नहीं मिली. कई ऐसे पूर्व ब्यूरोक्रेट्स हैं जिन्होंने बड़े राजनीतिक दलों में अपना ठिकाना बनाया वे राजनेता बन गए. विधायक, सांसद से लेकर मंत्री तक हैं.
जिन पूर्व नौकरशाहों ने नौकरी के बाद अपनी स्वयं की पार्टी बनाई उन्हें उस तरह की सफलता नहीं मिली, जिसकी उन्होंने उम्मीद पाल रखी होगी. हालांकि यह कहना भी जल्दबाजी होगा कि भविष्य में ऐसी पार्टियों को सफलता नहीं मिलेगी, लेकिन यह भी सच है कि बड़ी पार्टियों की तुलना में नई पार्टियों को संघर्ष ज्यादा करना होता है. जनता जो चाहेगी होगा वही. सफलता-असफलता जनता के ऊपर निर्भर है. ऐसे में जो पब्लिक कनेक्ट होगा वह जनप्रतिनिधि बन ही जाता है. तमाम लोग निर्दलीय भी चुनाव जीतते ही हैं.
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