परशुराम पीठ से विधानसभा तक: अखिलेश यादव का 'पंडित दांव' और यूपी की सियासत का ऐतिहासिक- कानूनी विश्लेषण
परशुराम पीठ से विधानसभा तक: अखिलेश यादव का 'पंडित दांव' और यूपी की सियासत का ऐतिहासिक- कानूनी विश्लेषण नैरेटिव बदला या मजबूरी? जानिए क्यों अखिलेश यादव को PDA के बाद अब 'पंडितों' की याद आई है! By ETV Bharat Uttar Pradesh…

सौजन्य से:- etvbharat.com
परशुराम पीठ से विधानसभा तक: अखिलेश यादव का 'पंडित दांव' और यूपी की सियासत का ऐतिहासिक- कानूनी विश्लेषण
नैरेटिव बदला या मजबूरी? जानिए क्यों अखिलेश यादव को PDA के बाद अब 'पंडितों' की याद आई है!
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : August 8, 2026 at 2:53 PM IST
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतों की राजनीति हमेशा से अहम रही है. इसीलिए यूपी की सियासी पिच पर एक पुरानी और बेहद मशहूर कहावत है कि 'जिधर ब्राह्मण जाता है, सत्ता का सिंहासन उधर ही झुक जाता है' लेकिन क्या यह महज एक चुनावी शिगूफा है, या फिर उत्तर प्रदेश की सामाजिक-राजनीतिक संरचना में किसी बहुत बड़े भूचाल की आहट?, लेकिन फिलहाल इतना साफ है कि उत्तर प्रदेश की सियासत एक बार फिर उसी 'जातीय समीकरण' की बिसात पर लौटती नजर आ रही है, जिसे तोड़ने का दावा हर नई पीढ़ी की राजनीति करती आई है. राज किशोरके संपादन के साथ पेश है संवाददाता खुर्शीद अहमद की खास रिपोर्ट.
2027 की बिसात पर अखिलेश का दांव: साल 1993 की 'मिले मुलायम-कांशीराम' वाली राजनीति से होते हुए 2024 के 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के नारे तक का सफर तय करने वाले अखिलेश यादव आज एक नए चौराहे पर खड़े हैं. विधानसभा में वरिष्ठ ब्राह्मण नेता माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाना हो, सनातन पांडेय को आगे करना हो या फिर पूर्वांचल एक्सप्रेस-वे के किनारे भगवान परशुराम की विशाल प्रतिमा स्थापित करना,समाजवादी पार्टी की साइकिल अब 'प्रबुद्ध वर्ग' यानी ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने के लिए पूरी रफ्तार से दौड़ रही है.
ब्राह्मणों की नाराजगी का नैरेटिव:पिछले कुछ वर्षों से विपक्ष लगातार यह नैरेटिव गढ़ने की कोशिश करते रहे हैं कि मौजूदा सरकार में एक विशेष सामाजिक तबके (ठाकुर/राजपूत समुदाय) का प्रभाव बढ़ा है, जिसके चलते ब्राह्मण समाज खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है. कानपुर के चर्चित 'बिकरू कांड' (विकास दुबे एनकाउंटर मामला) और उसके बाद खुशी दुबे की गिरफ्तारी के दौरान छिड़ी कानूनी और राजनीतिक बहस को विपक्ष ने ब्राह्मण समाज के आत्मसम्मान से जोड़कर प्रचारित करने की कोशिश की थी. अखिलेश यादव इसी कथित 'दरार' का राजनीतिक लाभ उठाकर अपनी साइकिल को इस वर्ग के बीच 'पार्क' करना चाहते हैं.
अखिलेश यादव जो संदेश देना चाहते हैं, उससे ब्राह्मण समुदाय से आने वाला वर्ग प्रभावित नहीं है. बल्कि लोगों में क्रोध है. अखिलेश यादव ने ब्राह्मण पत्रकारों , अधिकारियों और समुदाय को अपमानित किया है. ब्राह्मण समाज सपा के शोषण और अपमान को भूला नहीं है- अनुपम मिश्रा, प्रदेश अध्यक्ष, राष्ट्रीय लोक दल
'पंडित' का साथ क्यों चाहिए?:अखिलेश यादव 2027 में सत्ता पर काबिज होना चाहते हैं. इसके लिए अब उन्होंने निर्णायक कारक यानी ब्राह्मण वोटबैंक को एकजुट करने का प्लान बनाया है. जनेश्वर मिश्र की जयंती के मौके पर उन्होंने अपनी मंशा खुले मंच से जगजाहिर कर उस प्रयोग को दोहराने की कोशिश के संकेत दिए जिसका एक सफल ट्रायल 2007 में मायावती पहले ही कर चुकी हैं. यूपी की सियासत में इसे एक ऐतिहासिक 'सोशल इंजीनियरिंग' प्रयोग माना जाता है. अखिलेश यादव अब इसी इतिहास को दोहराने की रणनीति पर काम करते दिख रहे हैं.
'पीडीए' के 'पी' का मतलब पंडित भी है, पी और डी पंडित का ही एक संक्षिप्त रूप है. प्रबुद्ध समाज के लोग अगर समाजवादी पार्टी में आएंगे, तो उन्हें सम्मान भी मिलेगा और स्थान भी. माता प्रसाद पांडेय, सनातन पांडेय और पवन पांडेय समेत पार्टी के कई अन्य ब्राह्मण नेता हैं, जिन्हें न केवल सम्मान दिया गया है, बल्कि पार्टी में स्थान और समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी भी सौंपी गई है.- अखिलेश यादव, अध्यक्ष, समाजवादी पार्टी
कांग्रेस का स्वर्णकाल और 'त्रिकोण' वोट बैंक: आजादी के बाद से 1989 तक यूपी की राजनीति का नेतृत्व मुख्य रूप से ब्राह्मण चेहरों के हाथ में ही रहा, और यही वजह है कि यह तबका आज भी प्रदेश की सियासी बिसात पर एक निर्णायक कारक माना जाता है. यह वह दौर था जब कांग्रेस का यूपी में एकछत्र राज था. इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक अक्सर कांग्रेस की उस दौर की ताकत को तीन स्तंभों पर टिका हुआ बताते हैं. ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम. जिसे संक्षेप में 'बीडीएम' समीकरण कहा जाता रहा है.
सपा-बसपा की वजह से हाशिए पर ब्राह्मण!:1989 के बाद दो बड़े आंदोलनों ने यूपी की सियासत की दिशा पूरी तरह बदल दी. राम मंदिर आंदोलन, जिसे 'कमंडल' की राजनीति कहा गया, और मंडल आयोग की सिफारिशें, यानी पिछड़ा वर्ग आरक्षण. इस दौर में समाजवादी पार्टी ने ओबीसी-मुस्लिम समीकरण को अपनी बुनियाद बनाया, जबकि बहुजन समाज पार्टी ने दलित चेहरों को एकजुट करने का काम किया. दशकों तक सत्ता के केंद्र में रहा ब्राह्मण समाज इस नए समीकरण में खुद को हाशिये पर पाकर धीरे-धीरे भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के नैरेटिव में अपना नया राजनीतिक ठिकाना तलाशने लगा.
अखिलेश यादव 'पीडीए' का मतलब कभी पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक बताते हैं, तो कभी अगड़ा, कभी पीड़ित और कभी पंडित. उनका कोई भरोसा नहीं कि वे कब क्या परिभाषा गढ़ दें. अखिलेश यादव समाज को बांटने और तुष्टिकरण की राजनीति करने का काम करते हैं. अराजकता को बढ़ावा देते हैं. सपा ने ब्राह्मण समाज के लिए अब तक कोई ठोस काम नहीं किया और सरकार में रहते हुए भी समाज के हित में कोई कदम नहीं उठाया.- ब्रजेश पाठक, डिप्टी सीएम
क्या साइकिल पर बैठेंगे ब्राह्मण?:कुछ राजनीति के एक्सपर्ट मानते हैं कि,इस वक्त ब्राह्मण समाज भाजपा से नाराज तो हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी की तरफ आने में अब भी हिचकिचा रहा है. ब्राह्मण समाज एक बौद्धिक और सजग तबका है, जो किसी भी राजनीतिक दल के साथ तभी जाता है जब उसे लगता है कि उस दल की सरकार बनने वाली है. अगर अखिलेश यादव ब्राह्मण समाज को इसी भरोसे और संदेश के साथ अपनी तरफ खींचने में कामयाब होते हैं, तो यह समाज समाजवादी पार्टी की ओर झुक सकता है. हालांकि समाज का एक बड़ा हिस्सा यह भी सोचता है कि क्या समाजवादी पार्टी की सरकार बनने पर उसे उचित श्रेय और प्राथमिकता मिलेगी. अगर ब्राह्मण समाज को यह भरोसा मिलता है कि सरकार बनाने में उसकी भागीदारी को अहमियत दी जा रही है, तो वह समाजवादी पार्टी की तरफ रुख कर सकता है.
अखिलेश यादव ने ब्राह्मण सम्मेलन के जरिए प्रदेश को जो संदेश दिया है, वह 2027 में असर दिखा सकता है. 2007 में मायावती इसे साबित कर चुकी हैं, जब ब्राह्मण और दलित समाज ने मिलकर सरकार बनाई थी.- योगेश मिश्रा, स्वतंत्र पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक
अखिलेश की राह में कानूनी रोड़े: 'पंडित दांव' और ब्राह्मण-केंद्रित सम्मेलनों की राह में कई कानूनी अड़चनें और संवैधानिक बंदिशें भी मौजूद हैं. यूपी में जाति आधारित रैलियों और सम्मेलनों पर रोक है. इस कानूनी बंदिश से बचने के लिए राजनीतिक दलों ने एक व्यावहारिक रास्ता निकाला है. अब सीधे 'ब्राह्मण सम्मेलन' के बजाय 'प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन', 'परशुराम चेतना पीठ' या 'संत-महंत समागम' जैसे नामों का इस्तेमाल किया जाता है. इसी तरह अखिलेश यादव की रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भी सीधे जातिसूचक संबोधन के बजाय 'न्याय' और 'सम्मान' जैसे शब्दों को आगे रखा जाता है, जो कानूनी दायरे में रहते हुए भी लक्षित समुदाय तक संदेश पहुंचाने का एक स्थापित राजनीतिक तरीका बन चुका है.
2027 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी दलित, अल्पसंख्यक, पिछड़े , पीड़ित और अगड़े सभी वर्गों के लिए काम करेगी, और अखिलेश यादव ने ब्राह्मण समाज को जो सम्मान और स्थान देने की बात कही है, उसे अमल में लाया जाएगा.- अभिषेक मिश्रा, सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री
अंतिम फैसला तो 2027 की मतपेटी ही करेगी: आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह 'पंडित दांव' सिर्फ प्रतीकात्मक नियुक्तियों और मूर्ति-स्थापना तक ही सीमित रहता है, या फिर यह सचमुच जमीनी स्तर पर मतदान व्यवहार में कोई बदलाव ला पाता है? क्या सपा का पारंपरिक यादव-मुस्लिम-दलित कैडर इस नए 'सवर्ण कार्ड' को पचा पाएगा? और क्या बीजेपी अपने इस सबसे मजबूत और वफादार वैचारिक किले को ढहने देगी? इन सवालों के जवाब 2027 के विधानसभा चुनाव के गर्भ में छिपे हैं, लेकिन इतना साफ है कि यूपी की चुनावी बिसात पर अब शह और मात का खेल बेहद दिलचस्प हो चुका है.
(आपकी क्या राय है? क्या अखिलेश यादव का यह 'ब्राह्मण कार्ड' वाकई यूपी की सियासत को बदल पाएगा? क्या इतिहास खुद को दोहराएगा? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें और इस निष्पक्ष और खोजी ग्राउंड रिपोर्ट को अधिक से अधिक शेयर करें!)
यह भी पढ़ें:मिशन 2027: यूपी BJP ने घोषित किए क्षेत्र और मोर्चा प्रभारी, इन्हें मिली जिम्मेदारी, देखिए लिस्ट
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