रैली रद्द, सेफ गेम! यूपी चुनाव में क्या है सपा का वो डर, जिसकी वजह से बैकफुट पर हैं अखिलेश यादव?
समाजवादी पार्टी की कमजोरी इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक समाजवादी पार्टी में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरने के पीछे एक हिचकिचाहट है। इसका कारण उसकी एक पुरानी कमजोरी है, जो कि उसके स…

सौजन्य से:- navbharattimes.indiatimes.com
समाजवादी पार्टी की कमजोरी
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक समाजवादी पार्टी में योगी आदित्यनाथ के खिलाफ आत्मविश्वास के साथ मैदान में उतरने के पीछे एक हिचकिचाहट है। इसका कारण उसकी एक पुरानी कमजोरी है, जो कि उसके सामाजिक दायरे को एक सीमा में बांध देती है। समाजवादी पार्टी की छवि एक 'मुस्लिम-यादव' की पार्टी वाली है। वह अब अपने पारंपरिक वोट बैंक को बरकरार रखते हुए अपने सामाजिक गठबंधन को बढ़ाने और अन्य जाति समूहों, खास तौर पर दलितों और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कुछ जातीय समुदायों तक पहुंचने की कोशिश कर रही है।कांग्रेस के बिना सपा की डगर आसान नहीं
समाजवादी पार्टी की कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। हालांकि सपा के ही नेता मानते हैं कि उनकी पार्टी को कांग्रेस के बिना चुनाव लड़ने से मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में मुश्किल पेश आ सकती है। साथ ही अकेले चुनाव लड़ने से सवर्ण और दलित वोटरों के बीच पार्टी की पैठ बनाने की क्षमता सीमित हो सकती है। सपा 2024 के लोकसभा चुनावों में मिली बढ़त को 2027 के विधानसभा चुनाव में जीत में बदलना चाहती है।सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भय
समाजवादी पार्टी के नेता जमीनी हालात को अपने पक्ष में बता रहे हैं। पार्टी ने 2024 में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 37 सीटें जीती थीं। पार्टी के नेताओं का तर्क है कि तब से राज्य सरकार के सामने कई मुद्दे और गंभीर हो गए हैं। समाजवादी पार्टी के एक राज्यसभा सांसद के मुताबिक, 'कई मुद्दे हैं, जैसे कामकाज का खराब तरीका और ठाकुरवाद के खिलाफ बढ़ती नाराजगी। इससे सपा को साफ तौर पर फायदा है। लेकिन यदि बीजेपी और सरकार राज्य की मशीनरी का गलत इस्तेमाल करती है, जैसा उन्होंने पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में किया था, तो पार्टी के लिए यह मुश्किल काम होगा। हमें बेरहम सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का भी डर है।'योगी जोश में, अखिलेश संशय में
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनावी मोड में आ चुके हैं। दूसरी तरफ सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अब तक कोई आक्रामक चुनावी अभियान शुरू नहीं किया है। हाल ही में बुलंदशहर में जिला प्रशासन की ओर से प्रमुख जगहों पर कार्यक्रम करने की इजाजत नहीं दिए जाने के बाद अखिलेश को वहां होने वाली रैली सहित अन्य तय कार्यक्रम निरस्त करने पड़े।वोट बैंक पर उल्टे दांव की आशंका
बीजेपी के नेताओं का आरोप है कि समाजवादी पार्टी ने बुलंदशहर प्रशासन की ओर से सुझाए गए वैकल्पिक स्थानों को स्वीकार नहीं किया और इसके बजाय सत्ताधारी पार्टी और जिला अधिकारियों पर दोष मढ़ दिया। उत्तर प्रदेश के एक बीजेपी सांसद का कहना है कि अखिलेश यादव सुरक्षित रास्ता अपना रहे हैं। उनका तर्क है कि इस समय सपा की बड़ी रैलियों से पार्टी की यह छवि और मजबूत हो सकती है कि वह मुस्लिम और यादव वोटरों पर निर्भर है। यह एक ऐसी छवि है, बीजेपी जिसका उपयोग ध्रुवीकरण के लिए करना चाहेगी।दलित वोटों पर सबकी नजर
समाजवादी पार्टी अपने सामाजिक गठबंधन को बढ़ाकर अपनी कमजोरी दूर करने की कोशिश कर रही है। सपा का मुख्य ध्यान दलित वोटों पर है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती का प्रभाव कम होने के बाद से बीजेपी, सपा और कांग्रेस इस वोट बैंक को हासिल करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं। अखिलेश यादव ने अपने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले पीडीए (PDA), यानी पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक, को प्रभावी बनाने के लिए पूरे राज्य में दलितों के बीच पार्टी की मौजूदगी बढ़ाने की कोशिशें तेज कर दी हैं।नीले रंग में छुपा सपा का संदेश
सपा की इस कोशिश का एक स्पष्ट प्रतीकात्मक पहलू भी सामने आया है। बीजेपी नेताओं ने गौर किया है कि सपा के पारंपरिक लाल और हरे रंगों के साथ अब नीला रंग भी जोड़ा गया है। नीला रंग पारंपरिक रूप से बाबा साहब आंबेडकर और दलित आंदोलन से जुड़ा रहा है। पार्टी के छात्र संगठन समाजवादी छात्र सभा के ड्रेस कोड में नीली टी शर्ट और जींस शामिल हैं। हाल ही में सपा के जिला और शहर अध्यक्षों की एक बैठक में अखिलेश यादव को पार्टी के पारंपरिक लाल स्कार्फ की जगह नीला स्कार्फ पहने हुए भी देखा गया।समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद रामजी लाल सुमन नवंबर में आगरा में एक दलित सम्मेलन आयोजित करने वाले हैं। आगरा जिले में अनुसूचित जाति (एससी) की आबादी काफी है। वहां जाटव समुदाय की भी अच्छी-खासी मौजूदगी है। इस कार्यक्रम में अखिलेश यादव के भी मौजूद रहने की संभावना है।
कार्यकर्ताओं को ट्रेनिंग देने की तैयारी
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश गोरखपुर में पार्टी के कार्यकर्ताओं को दो दिन का प्रशिक्षण देने की योजना भी बना रहे हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश का गोरखपुर क्षेत्र एक ऐसा इलाका है जहां पर निषाद और ब्राह्मण समुदायों की आबादी काफी है। बीजेपी से नाराजगी के दावों के बीच राजनीतिक पार्टियां इन दोनों समुदायों पर बारीकी से नजर रख रही हैं। यूपी में दलित आबादी में आधे से ज्यादा हिस्सेदारी जाटवों की है। राज्य की कुल आबादी में अनुसूचित जाति समुदाय की आबादी का हिस्सा पांचवा है।दलितों में पैठ बनाने का कांशीराम का रास्ता
उत्तर प्रदेश के एक बीजेपी नेता का कहना है कि, अखिलेश दलित वोट बैंक में पैठ बनाना चाहते हैं। अच्छी बात यह है कि एससी समुदाय में एक ऐसा वर्ग है, खास तौर पर सरकारी कर्मचारी और नौकरशाहों का, जो काफी असरदार हो सकता है। कांशीराम ने भी इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना करने से पहले ऑल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एम्प्लॉइज फेडरेशन (BAMCEF) नाम का संगठन बनाया था। इसके जरिए उन्होंने सरकारी कर्मचारियों के बीच एक संगठनात्मक नेटवर्क बना लिया था।सपा की बड़ी रणनीति अपने पीडीए आधार को मजबूत करने के साथ-साथ उन समुदायों के नाराज वर्गों को भी अपने साथ जोड़ने की है, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी के समर्थक हैं। बीजेपी के नेता भी मानते हैं कि उनको पासी, कुर्मी, शाक्य और मौर्य जैसे समुदायों का समर्थन मिलते रहना जरूरी है। एक बीजेपी नेता के मुताबिक, अखिलेश अपने पीडीए फॉर्मूले को और मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। इस फॉर्मूले से उन्हें 2024 के लोकसभा चुनावों में 37 सीटें मिली थीं। वे योगी आदित्यनाथ के दौर में हावी जाति, यानी ठाकुरों के खिलाफ बढ़ते गुस्से का फायदा उठाकर एक नया सामाजिक गठबंधन बनाना चाहते हैं।
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