अखिलेश की बेटी से राजघराने के वंशज तक: यूपी की सियासत में एंट्री को तैयार 'नेक्स्ट-जेन'; अंदर की पूरी कहानी
अखिलेश की बेटी से राजघराने के वंशज तक: यूपी की सियासत में एंट्री को तैयार 'नेक्स्ट-जेन'; अंदर की पूरी कहानी रजनीश त्रिगुणायत के संपादन में अखिलेश्वर पांडेय की खास रिपोर्ट... By ETV Bharat Uttar Pradesh Team Published : S…

सौजन्य से:- ETV Bharat
अखिलेश की बेटी से राजघराने के वंशज तक: यूपी की सियासत में एंट्री को तैयार 'नेक्स्ट-जेन'; अंदर की पूरी कहानी
रजनीश त्रिगुणायत के संपादन में अखिलेश्वर पांडेय की खास रिपोर्ट...
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 23, 2026 at 6:38 AM IST
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक कहावत मशहूर है- "यहां दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है." लेकिन अब लखनऊ की सड़कों पर पोस्टरों और रैलियों में कुछ नए, युवा और बेहद पढ़े-लिखे चेहरे दिखाई देने लगे हैं. बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा अपनी भतीजी दीपिका आनंद को भविष्य में जिम्मेदारी सौंपने के दिए गए संकेतों ने यूपी की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है.
यह बहस है- 'नेक्स्ट-जेन पॉलिटिक्स' की. बसपा सुप्रीमो ने अभी दीपिका की सियासत में एंट्री पर फिलहाल रोक लगाई है, लेकिन माना जा रहा है कि लंदन में वकालत की पढ़ाई कर रहीं दीपिका आने वाले दिनों में बसपा के हाथी को दौड़ाने के लिए पहले पर्दे के पीछे से स्ट्रैटजी बनाएंगी उसके बाद सामने आएंगी. ईशान आनंद को मायावती पर्दे के पीछे से आगे ले ही आई हैं.
वहीं अखिलेश यादव की बेटी अदिति यादव की रैलियों में उमड़ती भीड़ से लेकर बीजेपी और अन्य दलों के कद्दावर नेताओं के बच्चों की जमीनी तैयारियों तक, यूपी की सियासत में अब सिर्फ विरासत की जंग नहीं, बल्कि मॉडर्न गवर्नेंस और हाई-एजुकेटेड लीडरशिप का नया दौर शुरू होने वाला है.
बसपा का 'आनन्द' परिवार और दीपिका आनंद की एंट्री पर सस्पेंस : बसपा सुप्रीमो मायावती ने राजनीति में कदम रखा तो ठान लिया कि उन्हें शादी नहीं करनी. अभी हाल ही में उन्होंने बयान जारी किया था कि शादी क्यों नहीं की, इसलिए महिला होने के नाते अपनी सुरक्षा को ध्यान में रखकर अपने भाई आनंद को साथ रखा था. आनंद पार्टी का काम संभाल रहे हैं. हालांकि मायावती के भाई आनंद का परिवार बहुजन समाज पार्टी की राजनीति में दखल दे चुका है.
सबसे पहले बसपा सुप्रीमो ने बड़े भतीजे आकाश आनंद को पार्टी में लिया. उन्हें पदों से नवाजा. उत्तराधिकारी तक घोषित कर दिया. आकाश आनंद के ससुराल के दखल को देखते हुए मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद नेक्स्ट जेन के रूप में आकाश आनंद के छोटे भाई ईशान आनंद को तीन सितंबर को पार्टी मुख्यालय में नेताओं से रूबरू कराया. सियासत में ईशान आनंद की एंट्री कराई. उन्हें मुख्य सेक्टर प्रभारी की जिम्मेदारी सौंप दी.
पार्टी की अंदरूनी कलह के चलते मायावती ने फिर एक बड़ा फैसला लेते हुए ईशान आनंद को भी पद देने से इनकार कर दिया. हालांकि उन्हें पार्टी से नहीं निकाला. 20 सितंबर को उन्होंने एक बार फिर ईशान को ही आगे बढ़ाने का फैसला ले लिया. इससे पहले उन्होंने भाई आनंद कुमार की बेटी और भतीजी दीपिका आनंद को राजनीति में लाने का संकेत दिया.
पारिवारिक कैडर की ओर बसपा : सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बयान जारी कर कहा था कि अगर उनके भाई और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष आनंद चाहे तो अपनी बेटी को अपने साथ काम में लगाकर मदद ले सकते हैं. इससे यह संकेत जरूर मिल गए कि अब मायावती की अगली वारिस देर से ही सही, लेकिन दीपिका आनंद हो सकती हैं. 20 सितंबर को मायावती ने फिर बयान जारी कर दीपिका की पार्टी में एंट्री पर रोक लगा दी.
तर्क दिया कि जिस तरह शादी के बाद आकाश आनंद ससुराल के प्रभाव में आ गए, क्या पता दीपिका भी शादी के बाद ससुराल के प्रभाव में आ जाए, इसलिए अभी दीपिका की पार्टी में एंट्री पर विचार करना ठीक नहीं है. हालांकि पार्टी के विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि दीपिका आनंद की बसपा में एक्टिव पॉलिटिक्स में एंट्री थोड़ी देर से सही, लेकिन जरूर होगी. कुल मिलाकर परिवार के सहारे मायावती बसपा में नेक्स्ट जेन की एंट्री कराने को रेडी हैं. बसपा अब पूरी तरह पारिवारिक कैडर की ओर बढ़ रही है.
राजनीति में आने से पहले टीचर थीं मायावती : बसपा सुप्रीमो मायावती की शुरुआती शिक्षा दिल्ली के विद्यालयों से पूरी हुई. वर्ष 1975 में उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कालिंदी कॉलेज से कला संकाय में स्नातक (बीए) की डिग्री हासिल की. वर्ष 1976 में गाजियाबाद के वीएमएलजी कॉलेज से उन्होंने बीएड किया. दिल्ली विश्वविद्यालय से विधि (एलएलबी) की डिग्री ली. राजनीति में सक्रिय होने से पूर्व दिल्ली में टीचर के तौर पर अपनी सेवाएं दे रही थीं. सिविल सर्विसेज की तैयारी भी की.
नेक्स्ट जेन आकाश आनंद ने लंदन से की है पढ़ाई : आकाश आनंद मायावती के छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे हैं. 1995 में नोएडा में पैदा हुए. नोएडा और गुरुग्राम से स्कूली शिक्षा हासिल की. उन्होंने वर्ष 2013 से 2016 के दौरान लंदन की यूनिवर्सिटी ऑफ प्लाईमाउथ से एमबीए की पढ़ाई पूरी की. 2017 में पहली बार यूपी में एक राजनीतिक मंच पर दिखे. 2019 में राजनीति में सक्रिय हुए. बसपा सुप्रीमो ने पहली बार जेन नेक्स्ट की एंट्री सियासत में कराई. हालांकि अब आकाश से रूठ कर बसपा सुप्रीमो ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया है.
ईशान के चेहरे पर फिर लौटी मुस्कान : मायावती के भाई आनंद कुमार के छोटे बेटे ईशान आनंद ने अपनी प्रारंभिक और स्कूली शिक्षा नोएडा के जेनेसिस ग्लोबल स्कूल और दिल्ली से पूरी की. इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए यूनाइटेड किंगडम (UK) गए. उन्होंने लंदन स्थित 'यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टमिंस्टर' में कानून की पढ़ाई की. शिक्षा ग्रहण करने के बाद दिल्ली लौटकर अपने फैमिली बिजनेस में सक्रिय हो गए.
आकाश आनंद को पार्टी से निकालने के बाद ईशान आनंद को सियासत का ककहरा सिखाने का फैसला लिया. उन्हें पद देकर जिम्मेदारी सौंपी. कुछ दिन बाद ही मायावती ने उनसे पद वापस ले लिया. वह एक कार्यकर्ता के तौर पर पार्टी से जुड़े रहे. अब मायावती ने फिर फैसला ले लिया है कि ईशान बड़े स्तर पर पार्टी का काम संभालेंगे. ऐसे में ईशान के चेहरे से गायब हुई खुशी वापस लौट आई है.
दीपिका आनंद पर बसपा सुप्रीमो को भरोसा : मायावती की भतीजी दीपिका आनंद की शुरुआती जिंदगी अपने माता-पिता के साथ नोएडा में ही गुजरी. यहीं से उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की. गुरुग्राम से पढ़ाई पूरी की. इसके बाद अपने दोनों भाइयों की तरह ही दीपिका आनंद भी लंदन चली गईं और वकालत करने का फैसला लिया. अभी उनकी पढ़ाई पूरी नहीं हुई है. बुआ मायावती के इशारे के बाद दीपिका आनंद के भी जल्द भारत लौटने की उम्मीद थी और राजनीति में सक्रिय होने की भी खूब चर्चाएं थीं.
पहले पिता आनंद कुमार के पार्टी के लीगल मामलों में हाथ बंटाने के लिए ईशान आनंद को जिम्मेदारी दी गई थी, लेकिन फिर यह जिम्मेदारी लंदन से वापस लौटकर आने पर दीपिका आनंद निभातीं. फिलहाल अभी दीपिका पर सस्पेंस बरकरार है. दीपिका आनंद अभी तक किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में शिरकत नहीं की है. अब भविष्य में पर्दे के पीछे से लेकर मंच तक और पार्टी की स्ट्रेटजी बनाने में दीपिका आनंद क्या कुछ भूमिका निभाएंगी, ये मायावती के निर्णय पर निर्भर है.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : आकाश आनंद और ईशान आनंद के बाद दीपिका को आगे लाकर मायावती दलित समाज की महिलाओं और युवाओं को संदेश देना चाहती थीं. संदेश यही कि बहुजन समाज पार्टी में जिस तरह मैं पार्टी के मिशन के लिए काम करके महिला होकर भी चार बार मुख्यमंत्री बन सकती हूं, तो इस पार्टी की दूसरी महिला भी पार्टी के लिए जी जान लगाकर महिलाओं के उत्थान के लिए कुछ भी कर सकती है.
बहुजन समाज पार्टी से बड़ी संख्या में महिलाएं जुड़े, इसके लिए दीपिका आनंद को चेहरा बनाकर मैसेज देने की मायावती ने कोशिश की थी. मायावती ने अपने बयान में यह भी कहा है कि बसपा को परिवार तक सीमित नहीं किया जाएगा. उन्होंने पार्टी संस्थापक कांशीराम की सोच का जिक्र करते हुए कहा कि वह भी परिवारवाद के खिलाफ रहे हैं और वह इसी रास्ते पर आगे बढ़ना चाहती हैं.
फिलहाल दीपिका आनंद की राजनीति में औपचारिक एंट्री नहीं हुई है. लेकिन मायावती के बयान ने यह जरूर साफ कर दिया है कि आने वाले समय में बसपा के काम में उनकी भूमिका बढ़ सकती है. अब देखना होगा कि वकालत की पढ़ाई कर रहीं दीपिका राजनीति में आती हैं या मायावती की ओर से बताए गए दूसरे विकल्प पर पार्टी आगे बढ़ती है.
सपा की नई 'यूथ आइकॉन' अदिति यादव : उत्तर प्रदेश की राजनीति की बात की जाए तो बड़े नेताओं के सक्रिय बेटे और बेटियों में अगर किसी की भविष्य में पॉलिटिक्स में सबसे पहले एंट्री हो सकती है तो वह नाम हो सकता है समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और उनकी सांसद पत्नी डिंपल यादव की बड़ी बेटी अदिति यादव की. अदिति राजनीति में काफी सक्रिय हैं. वह अपनी मां के लिए लोकसभा चुनाव के दौरान मैनपुरी में खूब प्रचार-प्रसार कर चुकी हैं.
अकेले ही उन्होंने कैंपेनिंग का मोर्चा संभाला था. समाजवादी पार्टी पर वैसे ही परिवारवाद का आरोप तो लगता ही है, लेकिन इससे बेफिक्र समाजवादी पार्टी अपने परिवार को सियासत में प्रवेश कराने से बिल्कुल नहीं हिचकिचाती है. ब्लॉक और जिला स्तर से लेकर विधायक और सांसद तक वर्तमान में परिवार में ही मौजूद हैं, जबकि मुख्यमंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक इसी परिवार से रहे हैं.
अब आगे के लिए पूरे परिवार में "नेक्स्ट जेन" बेटे और बेटियां सियासत में दाखिला लेने को तैयार हैं. इसमें सबसे पहले अदिति यादव का ही राजनीति में आने का नंबर है. अभी वह सीधे तौर पर चुनाव में ताल ठोकने तो नहीं जा रहीं, लेकिन यूपी विधानसभा चुनाव में युवाओं को समाजवादी पार्टी के साथ कनेक्ट करने में और पार्टी के उम्मीदवार की जीत की उम्मीद बढ़ाने में अदिति अहम भूमिका निभा सकती हैं.
अदिति की शिक्षा : अखिलेश यादव और डिंपल यादव के तीन बच्चे हैं. बड़ी बेटी अदिति यादव हैं. इसके बाद बेटा अर्जुन यादव और टीना यादव जुड़वा बच्चे हैं. अदिति वर्तमान में लंदन (यूके) से राजनीति और इंटरनेशनल रिलेशंस की पढ़ाई कर रही हैं. अदिति ने अपनी स्कूली शिक्षा लखनऊ के फेमस लॉ मार्टिनियर गर्ल्स कॉलेज से पूरी की. उन्होंने 2020 में इंटर में 98% अंक हासिल किए थे. इसके बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने लंदन के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन में प्रवेश लिया. यहां से वे पॉलिटिक्स एंड इंटरनेशनल रिलेशंस की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान एक इंटरव्यू में समाजवादी पार्टी के प्रमुख और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने बच्चों के पॉलिटिक्स में आने को लेकर कहा था कि उनकी तरफ से कोई रोक-टोक नहीं है. उनकी तरफ से बच्चों को आजादी है कि वह अपनी लाइफ में क्या करना चाहते हैं और क्या पढ़ना चाहते हैं.
2024 में हुए लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव की बड़ी बेटी अदिति यादव ने अपनी मां डिंपल यादव के लिए मैनपुरी संसदीय क्षेत्र के शहरी और ग्रामीण इलाकों में प्रचार किया था. उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से अपनी मां को वोट देने की अपील की थी. अदिति का भाषण भी खूब चर्चा में रहा था. भविष्य की सियासत में डिंपल यादव की असली राजनीतिक वारिस अदिति यादव हो सकती हैं.
कांग्रेस में प्रियंका गांधी के बच्चों पर टिकी 'विरासत' : कांग्रेस पार्टी की करें तो लगातार पारिवारिक परंपरा आगे बढ़ती जा रही है. जवाहर लाल नेहरू से शुरू हुई राजनीति बेटी इंदिरा गांधी, फिर राजीव गांधी, संजय गांधी, सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी तक जारी है. राहुल ने शादी नहीं की. बहन प्रियंका गांधी बच्चों की पॉलिटिक्स में एंट्री के ऑप्शन पूरी तरह ओपन हैं.
प्रियंका गांधी की नेक्स्ट जेन रेडी है. बेटे रेहान भले ही मामा राहुल गांधी के साथ राजनीतिक मंच पर देखे जा चुके हों, लेकिन उनकी पॉलिटिक्स में बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं है, जबकि मिराया वाड्रा को पॉलिटिक्स लुभाती है. दोनों ने ही 2024 लोकसभा चुनाव में वायनाड में अपनी मां प्रियंका गांधी के प्रचार में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था. कयास लगाए जा रहे हैं कि प्रियंका गांधी वाड्रा परिवार के ये दो जेन नेक्स्ट पॉलिटिक्स में आने वाले समय में इंटर कर सकते हैं.
प्रियंका गांधी वाड्रा और रॉबर्ट वाड्रा के बेटे रेहान वाड्रा की शुरुआती पढ़ाई दिल्ली के द श्री राम स्कूल से हुई है. इसके बाद उत्तराखंड के देहरादून स्थित फेमस दून स्कूल से स्कूलिंग हुई है. राजीव गांधी और राहुल गांधी भी दून स्कूल से पढ़ाई की थी. रेहान ने स्कूलिंग के बाद ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ लंदन के अंतर्गत आने वाले स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड अफ्रीकन स्टडीज से पॉलिटिक्स सब्जेक्ट में हाई एजुकेशन प्राप्त की है.
शिक्षा के अलावा रेहान का रुझान आर्ट की तरफ ज्यादा है. वे विजुअल आर्टिस्ट, पेंटर और प्रोफेशनल फोटोग्राफर हैं. 10 साल की उम्र से ही वे फोटोग्राफी कर रहे हैं. वाइल्डलाइफ व कॉमर्शियल फोटोग्राफी में एक्टिव हैं. उनकी 'डार्क परसेप्शन' फोटोग्राफी की खूब चर्चा हुई थी. हालांकि उनके पॉलिटिक्स में कदम रखने की चर्चाएं भी कम नहीं हैं.
हालांकि, अभी रेहान वाड्रा के पिता रॉबर्ट वाड्रा ही राजनीति में सक्रिय नहीं हो पाए हैं. वह लगातार अपने बयानों में कहते हुए नजर आए हैं कि उन्हें चुनाव लड़ना है, लेकिन अभी कांग्रेस पार्टी ने उन्हें मौका नहीं दिया है. ऐसे में हो सकता है कि पहले पिता राजनीति में एंट्री करें और उसके बाद रेहान भी अपने माता-पिता के नक्शे कदम पर आगे बढ़ें.
मिराया की पॉलिटिक्स में है दिलचस्पी : प्रियंका गांधी की बेटी मिराया वाड्रा पब्लिक में कम ही नजर आती हैं, लेकिन अपनी मां प्रियंका गांधी वाड्रा और पिता रॉबर्ट वाड्रा के साथ सार्वजनिक या राजनैतिक कार्यक्रमों के साथ ही चुनाव के दौरान मतदान करते हुए जरूर दिखती हैं. वेल्हम गर्ल्स स्कूल देहरादून से मिराया की स्कूलिंग हुई है.
यूनाइटेड किंगडम की यूनिवर्सिटी ऑफ स्कॉटलैंड से मिराया ने ग्रेजुएशन पूरा किया है. एक बार वे यहां अपने मामा राहुल गांधी के साथ ग्रेजुएट सेरेमनी भी अटेंड कर चुकी हैं. राजनीति में भले ही भाई रेहान ये कहते हों कि ज्यादा इंट्रेस्ट नहीं है, पर मिराया की दिलचस्पी है. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के बेटे रेहान राजीव वाड्रा और बेटी मिराया वाड्रा ने नवंबर 2024 में केरल के वायनाड लोकसभा उपचुनाव के दौरान अपनी मां के प्रचार में हिस्सा लिया था.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : प्रियंका गांधी के बाद राजनीति में रेहान वाड्रा या मिराया या फिर दोनों का पदार्पण होता है, तो इससे कांग्रेस की पारिवारिक राजनीति की परंपरा कायम रहेगी. पार्टी में गांधी वाड्रा परिवार का नेतृत्व लंबे समय तक चलता रहेगा, साथ ही कांग्रेस पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का भी पार्टी से जुड़ाव बना रहेगा. इससे पार्टी मजबूत होगी और बिखरने से भी बची रहेगी. नेक्स्ट जेन के राजनीति में आने से बड़ी संख्या में युवा भी जुड़ते रहेंगे.
कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय की नेक्स्ट जेन तैयार : कैबिनेट मंत्री मनोज कुमार पांडेय के दो बेटे और एक बेटी हैं. प्रतीक राज पांडेय, शिवा विराज पांडेय और मनी पांडेय. बड़े बेटे प्रतीक राज पांडेय धीरे-धीरे राजनीति में सक्रिय हो रहे हैं. सामाजिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों में उनकी लगातार हिस्सेदारी रहती है. कैबिनेट मंत्री मनोज पांडेय जब क्षेत्र में भ्रमण के लिए जाते हैं, तो अक्सर प्रतीक राज पांडेय उनके साथ नजर आते हैं.
छोटे बेटे शिव विराज पांडेय अभी उतने सक्रिय नहीं हैं, लेकिन पूजा पाठ के लिए जो कार्यक्रम आयोजित होते हैं उनमें शिव विराज पांडेय को भी देखा जा सकता है. मनोज पांडेय की बेटी मनी पांडेय हैं. उनका दूसरा नाम आर्ली पांडेय भी है. अभी हाल ही में जब कैबिनेट मंत्री ने ऊंचाहार में शिव महापुराण का आयोजन किया तो मनी पांडेय ने भी इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और क्षेत्र में लोगों को कथा में आने के लिए आमंत्रित किया.
कुछ दिन पहले ही मनोज पांडेय सपरिवार गृह मंत्री अमित शाह से भी मिले थे. इसके अलावा जब सपा छोड़कर मनोज ने भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन की थी तो गृह मंत्री के साथ मंच पर अपने बेटे प्रतीक राज पांडेय का भी परिचय कराया था. प्रतीक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से भी कई बार मिल चुके हैं. इससे अंदाजा लगाना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं कि पॉलिटिक्स में नेक्स्ट जेन की एंट्री का पूरा रास्ता तैयार है.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : रायबरेली की बछरावां विधानसभा सीट पर पिता विधायक मनोज पांडेय का दबदबा आगे तक बरकरार रहे, इसके लिए युवा नेतृत्व के रूप में उनके बेटे अभी से युवाओं के साथ जुड़ रहे हैं. जिसका सीधे तौर पर अभी पिता मनोज पांडेय को चुनाव में फायदा मिल रहा है और पार्टी को भी इसका लाभ मिल रहा है. आने वाले दिनों में जब प्रतीक राज पांडेय चुनावी मैदान में उतरेंगे तो उन्हें भी इसका फायदा मिलेगा.
मंत्री दिनेश प्रताप सिंह के बेटे राजनीति में एक्टिव : राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह के दो बेटे और एक बेटी है. बड़े बेटे पीयूष प्रताप सिंह राजनीति में एक्टिव हैं, जबकि छोटे बेटे राजवर्धन सिंह और बेटी अंशिका पॉलिटिक्स में उतने एक्टिव नहीं हैं. पीयूष प्रताप सिंह ब्लॉक स्तर पर अभियान चलाते रहते हैं और लगातार स्थानीय स्तर पर पार्टी के साथ ही विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में भी उनकी हिस्सेदारी रहती है.
रायबरेली के हरचंदपुर विकासखंड के ब्लॉक प्रमुख और प्रशासक के रूप में कार्य कर रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी के एक्टिव मेंबर हैं. भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की उनकी पारिवारिक तस्वीरें भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उनकी राजनीति में सक्रियता को दर्शाती हैं. इलेक्शन कैंपेनिंग में भी ठाकुर पीयूष प्रताप सिंह हिस्सा लेते हैं, ऐसे में उनकी तो सियासी एंट्री लगभग तय है.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : रायबरेली कांग्रेस का गढ़ है. यहां से राहुल गांधी सांसद हैं, जबकि भारतीय जनता पार्टी की सरकार में दिनेश प्रताप सिंह मंत्री हैं. आगे आने वाले समय में रायबरेली में बीजेपी का दबदबा कायम हो सके, इसके लिए युवा शक्ति की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए दिनेश प्रताप सिंह ने अपने बेटे पीयूष प्रताप सिंह को एक्टिव किया है. पीयूष लगातार युवाओं को अपने साथ जुड़ रहे हैं और जनसंपर्क अभियान के साथ ही सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव रहते हैं. इसका दिनेश प्रताप सिंह के साथ ही भारतीय जनता पार्टी को भी लाभ मिल रहा है.
कथा के बहाने भाजपा विधायक ने बेटे को किया लॉन्च : लखनऊ के उत्तरी विधानसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के विधायक डॉ. नीरज बोरा ने कुछ माह पहले बड़े स्तर पर श्रीराम कथा का आयोजन कराया था. इसमें गुरु रामभद्राचार्य ने कथा कही थी. कथा के बहाने विधायक डॉ. नीरज बोरा ने अपने बेटे को कार्यक्रम में विशेष तौर पर आगे रखा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत सभी नेताओं से मुलाकात कराई.
एक तरह से देखा जाए तो अपने बेटे वत्सल बोरा को राजनीति में आगे करने का यह सुनहरा अवसर उन्होंने बनाया. अपने पिता विधायक डॉ. नीरज बोरा के राजनीतिक कार्यक्रमों के साथ ही लखनऊ उत्तर विधानसभा क्षेत्र की जनता के संपर्क अभियानों में वत्सल बोरा पर्दे के पीछे से अहम भूमिका निभाते हैं और मंचों पर सहयोग भी करते हैं.
काफी पढ़े लिखे हैं वत्सल बोरा : विधायक नीरज बोरा के बेटे वत्सल बोरा काफी पढ़े लिखे हैं. देश के सबसे प्रसिद्ध बोर्डिंग स्कूलों में से एक द दून स्कूल से उन्होंने अपनी शुरुआती और माध्यमिक शिक्षा पूरी की है. उच्च शिक्षा उन्होंने विदेश में ग्रहण की है. कनाडा की प्रसिद्ध यूनिवर्सिटी आफ वाटरलू से मैनेजमेंट इंजीनियरिंग में बैचलर ऑफ एंप्लॉयड साइंस की डिग्री हासिल की है. लखनऊ के भारतीय प्रबंध संस्थान से उन्होंने शिक्षा पूरी की है. वे मैनेजमेंट इंजीनियर और कुशल रणनीतिकार हैं. वह पारिवारिक बिजनेस बोरा ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर के रूप में स्वास्थ्य, शिक्षा और आईटी सेक्टर का कामकाज देख रहे हैं.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : विधायक डीपी बोरा की राजनीतिक विरासत उनके बेटे डॉ. नीरज बोरा ने संभाली और अब उनकी विरासत संभालने के लिए उनके बेटे वत्सल बोरा तैयार हो रहे हैं. पारिवारिक विरासत का यह सिलसिला आगे तक कायम रहे इसके लिए अभी से सियासी एंट्री की तैयारी उनके पिता डॉ. नीरज बोरा कर रहे हैं. वत्सल काफी पढ़े लिखे हैं और इसका फायदा भी उन्हें राजनीति में मिलने की उम्मीद भी है.
राजनीति में राजघराने के नेक्स्ट जेन : उत्तर प्रदेश की राजनीति में अगर रजवाड़े खानदानों की बात की जाए तो रघुराज प्रताप सिंह "राजा भैया" को बिल्कुल भी दरकिनार नहीं किया जा सकता. राजा भैया प्रतापगढ़ के आसपास की सीटों को प्रभावित करते हैं. अब तक राजा भैया विधानसभा चुनाव नहीं हारे हैं. निर्दलीय विधायक बनते रहे और बाद में उन्होंने अपने पार्टी बनाई. राजा भैया समाजवादी पार्टी की सरकार में मंत्री भी रहे और वर्तमान में विधायक हैं.
कुंडा राजघराने के राजकुमार भी राजनीति में आने को तैयार हैं. राजा भैया के दो जुड़वा बेटे हैं जिनका जन्म 2003 में हुआ. शिवराज प्रताप सिंह और बृजराज प्रताप सिंह अपने पिता के साथ रहते हैं और विभिन्न सामाजिक, राजनीतिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में नजर आते हैं. दोनों बेटे अब अपने पिता की राजनीतिक विरासत संभालने लगे हैं. वह राजनीति की बारीकियां अपने पिता रघुराज प्रताप सिंह से सीख रहे हैं. दोनों ही बेटों ने पिछले साल औपचारिक रूप से अपने पिता की पार्टी जनसत्ता दल लोकतांत्रिक के मेंबरशिप भी ले ली है. अब जनसंपर्क में भी जुट गए हैं. ऐसे में इस नेक्स्ट जेन जी की पॉलिटिक्स में एंट्री तय हो गई है. घुड़सवारी, निशानेबाजी का अपने पिता की तरह दोनों बेटों को भी शौक है.
कितना पढ़े-लिखे हैं दोनों बेटे : राजा भैया के दोनों बेटे शिवराज प्रताप सिंह और बृजराज प्रताप सिंह ने अपनी स्कूली शिक्षा एमपी के ग्वालियर स्थित प्रतिष्ठित स्कूल सिंधिया स्कूल से पूरी की है. सलमान खान, नितिन मुकेश और माधवराव सिंधिया जैसी हस्तियों ने अपनी शिक्षा दीक्षा यहीं से ली थी. यहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद दोनों भाई ग्रेजुएशन की पढ़ाई करने मुंबई पहुंचे. यहां के जय हिंद कॉलेज से स्नातक की शिक्षा ग्रहण की. दोनों ही बेटे स्नातक हैं और अब पढ़ लिखकर पॉलिटिक्स में एक्टिव हो रहे हैं.
क्या हैं इसके राजनीतिक मायने : कुंवर रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया ने अपने दोनों बेटों को सियासत में लाने के लिए ही राजनीतिक दल का गठन किया. दोनों बेटे अभी से सक्रिय भी हो गए हैं. पार्टी की सदस्यता भी ले ली है. राजसी ठाठबाट में पले बढ़े दोनों बेटे अपने पिता से राजनीति का ककहरा सीख रहे हैं और राजनीतिक विरासत संभालने को तैयार हैं.
पड़रौना राजघराने की राजकुमारियां संभाल सकती हैं विरासत : भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद आरपीएन सिंह की बेटियां यामिनी, मनीषि और वासिनी सिंह हैं. पडरौना और पूर्वांचल की राजनीति में उनकी साइलेंट एंट्री हुई है. हालांकि यामिनी, मनीषि और वासिनी पॉलिटिक्स में एंट्री लेंगी या नहीं, अभी इस पर संशय है. उनके बारे में जानकारी भी साझा नहीं की गई है. हालांकि जिस तरह से परिवार में परम्परागत राजनीति हो रही है उससे ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि राजनीति में राजकुमारियों की एंट्री होना संभव है.
परिवारवाद की बात करने वाले अपने गिरेबान में झांके : समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता फखरुल हसन 'चांद' कहते हैं, अब जो जेन जी और जेन अल्फा है यह बहुत जल्दी मुद्दों को समझ रहा है. एक समय वो था जब आप जेन अल्फा से उम्मीद नहीं कर सकते थे कि वह अपने मुद्दों के लिए लड़ेगा. जेन जी आज सड़क पर खड़ा है. जहां तक लीडरशिप की बात है और परिवारों की बात है और पार्टियों की बात है तो समाजवादी पार्टी ने हमेशा से समाज से निकले हुए लोगों को आगे बढ़ाया है. जेन जी लगातार समाजवादी पार्टी से कनेक्ट हो रहा है.
जहां तक लीडरशिप में परिवारवाद के आरोप सपा पर लगते हैं तो मैं कहना चाहता हूं कि अनुराग ठाकुर कौन हैं? राजनाथ सिंह के दोनों सुपुत्र राजनीति में हैं. जो लोग परिवारवाद की बात करते हैं वह अपना परिवार भूल जाते हैं. जिनके परिवार हैं, जिनके बच्चे हैं. जनता चुनकर भेजती है उसमें क्या दिक्कत है? कोई राज्यसभा जाए, कोई विधानसभा जाए तो निश्चित रूप से सवाल उठने चाहिए, लेकिन जनता जिनको चुनकर भेज रही है तो यह सवाल नहीं उठाना चाहिए.
भारतीय जनता पार्टी परिवारवाद की परिभाषा गढ़ने का काम कर रही है. जो भाजपा परिवारवाद की बात कर रही है उसे अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. समाजवादी पार्टी का परिवारवाद संघर्ष का परिवारवाद है. संघर्ष करके जनता के बीच से चुनकर आते हैं और जनता जिसको चुनती है लोकतंत्र में वही सर्वोपरि होता है.
-फखरुल हसन 'चांद', प्रवक्ता, समाजवादी पार्टी
भाजपा में सिद्ध करनी पड़ती है योग्यता : भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता आलोक अवस्थी का कहना है कि युवा यह देखता है कि उसका भविष्य कहां सुरक्षित है? भारतीय जनता पार्टी ही ऐसी एक पार्टी है जिसने अभी तक नौ लाख 30 हजार सरकारी नौकरियां मेरिट पर योग्य उम्मीदवारों को दी हैं. जेन जी का भविष्य भारतीय जनता पार्टी में सुरक्षित है.
सबसे ज्यादा युवा हमारी पार्टी में पदाधिकारी हैं. लीडरशिप को देखेंगे तो हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन चुने गए हैं. वह सबसे यंग राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और कांग्रेस में आपको पता है कौन अध्यक्ष हैं? उनकी उम्र में और हमारे अध्यक्ष की उम्र में कितना अंतर है. आपको इससे अंदाजा लगा लेना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी नितिन नबीन जैसे हमारे जो कर्मठ नेता हैं, जेन जी हैं उन्हें अपना राष्ट्रीय अध्यक्ष चुनती है.
भारतीय जनता पार्टी परिवारवाद की राजनीति नहीं करती है. पहले पिता फिर बाद में उसका बेटा और उनके बाद उनका बेटा और बेटी, यही चलता है. हमारे यहां परिवारवाद नहीं है. सभी को अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है. भारतीय जनता पार्टी सभी को मौका देती है.
-आलोक अवस्थी, वरिष्ठ प्रदेश प्रवक्ता, भारतीय जनता पार्टी
पॉलिटिक्स में आ रहे पढ़े लिखे युवा : कांग्रेस की प्रदेश प्रवक्ता प्रियंका गुप्ता कहती हैं, जंतर मंतर पर जेन जी के धरना प्रदर्शन से सरकार बैकफुट पर आ गई. अब राजनीति का ट्रेंड पूरी तरह से अवेयरनेस पर जा रहा है, क्योंकि सोशल मीडिया के माध्यम से लोग बेहतर जान पा रहे हैं कि किस तरीके से कौन सरकार फायदा दे पा रही है. यंग जनरेशन पूरी तरह से कनेक्ट कर रही है. अपनी बात कहने सुनने के अलावा अपनी डिमांड्स भी जेन जी रखना जानती है और उनको मनवाना भी जानती है.
सबसे अच्छी बात है कि जनरेशन अवेयर है. जेन जी से लेकर जेन अल्फा तक अपनी स्कूल की समस्याओं को लेकर सड़कों पर आ गए, जिनमें स्कूलों में पानी नहीं है, टीचर नहीं है, सड़क नहीं है, कोई व्यवस्था नहीं है, सब बच्चे सड़कों पर आ रहे हैं. ओवरऑल आप देखें राजनीति का दौर चेंज हो रहा है. उनकी थिंकिंग चेंज हो रही है. वह अपनी बात को पुरजोर तरीके से शांतिपूर्ण ढंग से रख रहे हैं.
जेन जी की जो लैंग्वेज है वह बहुत कैजुअल है. इसलिए राहुल गांधी इस समय फोकस कर रहे हैं कि किस तरीके से नौजवानों को सहभागी रखा जाए, किस तरीके से नेताओं और उनके बच्चों की बात की जाए तो उनकी बेहतर भूमिका होगी, जेन जी को पूरी तरह से अट्रैक्ट करने की कोशिश जारी है. जेन नेक्स्ट पॉलिटिक्स में भी बेहद पढ़े लिखे युवा राजनीति में आगे आ रहे हैं.
-प्रियंका गुप्ता, प्रदेश प्रवक्ता, कांग्रेस
जेन जी और नेताओं की अगली पीढ़ी एक साथ बढ़ रही : राजनीतिक विश्लेषक मनमोहन कहते हैं, राजनीति हो बिजनेस या फिर और कोई फील्ड हर व्यक्ति अपनी पीढ़ी को आगे बढ़ाना चाहता है. जैसे राजनीति में नेता अपने नेक्स्ट जनरेशन को आगे बढ़ा रहे हैं. मायावती ने अपने भाई आनंद को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया. अपने भतीजे आकाश आनंद को लिया. उनसे मतभेद हुआ तो ईशान आनंद को लिया. ईशान के बाद आनंद कुमार की बेटी दीपिका आनंद को लाने की बात कही.
इसी तरह राजनाथ सिंह ने अपने बेटे पंकज सिंह को दो बार विधायक बनवाया. छोटे बेटे नीरज सिंह उत्तर प्रदेश भारतीय जनता पार्टी में सीधे उपाध्यक्ष बन गए. सेकंड जनरेशन को बढ़ाने के लिए अब आध्यात्म का सहारा भी नेता लोग ले रहे हैं. अभी लखनऊ उत्तरी से विधायक नीरज बोरा ने कथा का आयोजन कराया जिसमें रामभद्राचार्य आए. कथा में नीरज बोरा ने अपने बच्चों को इंट्रोड्यूस कराया.
योगी सरकार में काबीना मंत्री मनोज कुमार पांडेय ने पंडित प्रदीप से ऊंचाहार में कथा कराई. शिव कथा में आने वाले लोगों का स्वागत अपने बच्चों, पत्नी से कराया. मुख्यमंत्री का स्वागत कराया. गवर्नर का स्वागत कराया और तमाम नेताओं से उनका इंट्रोडक्शन कराया. कांग्रेस में भी सेकंड जेनरेशन आई. सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को आगे बढ़ाया, प्रियंका गांधी को बढ़ाया. अब प्रियंका के बच्चे आगे आ सकते हैं.
समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के बाद 2000 में अखिलेश यादव आगे आए. अब अखिलेश यादव की बड़ी बेटी अदिति चाहे कन्नौज का लोकसभा चुनाव हो, चाहे मैनपुरी का लोकसभा चुनाव हो, दोनों में अपने पिता और माता के लिए प्रचार करती हुई दिखाई पड़ीं. जनता के बीच गईं. मंचों पर गईं. एक इंट्रोडक्शन के रूप में यह आया कि अब सेकंड जेनरेशन आ रही है.
आजकल जो जेन जी का मुद्दा चल रहा है यह उससे कनेक्ट कर रहा है. जेन जी और नेताओं की जो अगली पीढ़ी है वह एक साथ ही बड़े हो रहे हैं. मौजूदा पीढ़ी के पास एक हाथ में मोबाइल है उसमें पूरी दुनिया है. वह एक दूसरे की भाषा को समझते हैं. वह चाहे इलेक्ट्रॉनिक हो टेक्निकल हो या सामान्य भाषा. यह राजनीति में परंपरा चल पड़ी है और इसका फायदा जिसकी सेकंड जेनरेशन है, उन्हें मिलेगा.
-मनमोहन, राजनीतिक विश्लेषक
उत्तर प्रदेश की राजनीति का मिजाज बदल रहा है. आज का युवा वोटर केवल बड़े नाम या जाति के आधार पर वोट देने को तैयार नहीं है. यही कारण है कि दिग्गज नेता अब अपने बच्चों को केवल 'नेता का बेटा' बनाकर नहीं, बल्कि 'वेल-एजुकेटेड और मॉडर्न लीडर' के रूप में पेश कर रहे हैं. विरासत की इस नई रेस में देखना दिलचस्प होगा कि लंदन और दिल्ली के बड़े कॉलेजों से डिग्री लेकर आए ये युवा, यूपी की धूल भरी सियासी सड़कों और जातीय समीकरणों की परीक्षा में कितने नंबरों से पास होते हैं.
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