'टीम प्रियंका' से मुक्त हुई यूपी कांग्रेस! अब राहुल के पसंदीदा नेताओं को मिली कमान
उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की तपिश अभी से महसूस होने लगी है. सूबे में सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए सभी सियासी दल अपन…

सौजन्य से:- AajTak
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उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव की तपिश अभी से महसूस होने लगी है. सूबे में सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए सभी सियासी दल अपने-अपने समीकरण को मजबूत करने में जुट गए हैं. मिशन-2027 के तहत कांग्रेस ने अपने चुनावी ढांचे को दुरुस्त करने और रणनीतिक खाका खींचने के लिए बड़ा कदम उठाया ताकि एक मजबूत विकल्प खड़ा किया जा सके.
2027 के चुनावी आहट के साथ ही कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व में पार्टी संगठन में बदलाव शुरू कर दिया है. कांग्रेस ने यूपी में पांच-छह साल से जमे अपने सभी छह सह-प्रभारियों को हटाकर उनकी जगह नए चेहरों को जिम्मेदारी सौंपी है.
2019 के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को उत्तर प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था, तो उनके साथ छह राष्ट्रीय सचिवों की टीम दी गई थी. यह टीम प्रियंका गांधी के साथ सह-प्रभारी के रूप काम कर रही थी. प्रियंका गांधी ने 2023 में यूपी का प्रभार छोड़ दिया, लेकिन उनकी टीम अपने जड़े जमाए रखी. प्रियंका गांधी की टीम की यूपी से पूरी तरह छुट्टी हो गई है.
कांग्रेस का यूपी संगठन में बड़ा फेरबदल
कांग्रेस ने 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा बदलाव किया है. यूपी कांग्रेस ने अपनी नई टीम तैयार करने से पहले पुराने सभी सह प्रभारियों को हटा दिया है. कांग्रेस ने पुराने सह प्रभारियों (राष्ट्रीय सचिवों) को हटाकर उनकी जगह नए सहप्रभारी तैनात कर दिए हैं.
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कांग्रेस हाईकमान ने अभिषेक दत्त, कुनाल चौधरी, जगदीश चंदर जांगिड़, संजीव आर्य, वरुण चौधरी और अब्दुल हन्नान को राष्ट्रीय सचिव नियुक्त करते हुए, उत्तर प्रदेश का सह-प्रभारी नियुक्त किया है. यूपी में कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम के साथ के ये सभी काम करेंगे.
वहीं, यूपी में कांग्रेस सह-प्रभारी के तौर पर अभी तक काम देख रहे राष्ट्रीय सचिव धीरज गुर्जर, नीलांशु चतुर्वेदी, प्रदीप नरवाल, राजेश तिवारी, सत्यनारायण पटेल और तौकीर आलम की यूपी से छुट्टी कर दी गई है. इसमें अधिकांश नेता प्रियंका गांधी के करीबी माने जाते थे और लंबे समय से यूपी के साजो-समारोह व रणनीतिक कामकाज को संभाल रहे थे.
प्रियंका के करीबी नेताओं की यूपी से छुट्टी
2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने प्रियंका गांधी को यूपी का प्रभार सौंपा था. इसके साथ में धीरज गुर्जर, नीलांशु चतुर्वेदी, प्रदीप नरवाल, राजेश तिवारी, सत्यनारायण पटेल और तौकीर आलम को राष्ट्रीय सचिव बनाते हए सह-प्रभारी नियुक्त किया गया था. इन सभी नेताओं को प्रियंका गांधी के साथ राज्य में संगठन को धार देने और उनकी कोर टीम के रूप में काम करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.
प्रियंका गांधी के साथ सलाहकार के तौर पर संदीप सिंह जुड़े थे, जो जेएनयू में आइसा के पूर्व अध्यक्ष थे. ऐसे में वामपंथी दलों के नेताओं की नियुक्ति भी कांग्रेस में बड़ी संख्या में हुई. आइसा के एक अन्य पूर्व पदाधिकारी मोहित पांडे यूपीसीसी के सोशल मीडिया प्रमुख थे. इसी तरह शाहनवाज हुसैन और अनिल यादव, जो पहले रिहाई मंच के साथ थे, शाहनवाज आलम अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ थे तो अनिल यादव प्रदेश संगठन महासचिव की जिम्मेदारी निभा रहे थे.
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संदीप सिंह अब प्रियंका गांधी के साथ पहले की तरह नहीं हैं. शाहनवाज आलम अल्पसंख्यक मोर्चे से हट गए हैं, वो अब राष्ट्रीय सचिव और बिहार के सह-प्रभारी हैं तो अनिल यादव भी दिल्ली में राहुल गांधी के छात्र गूंज का कार्यक्रम में जुटे हुए हैं. इसके अलावा प्रदेश संगठन में जिन नेताओं की प्रियंका गांधी के दौर में नियुक्त हुई थी, उनकी छुट्टी हो गई है या फिर पार्टी में साइडलाइन कर दिए गए.
' टीम प्रियंका' से मुक्त हुई यूपी कांग्रेस
प्रियंका गांधी यही टीम यूपी कांग्रेस में संगठन में नियुक्ति से लेकर चुनाव में टिकट वितरण तक में अपना रोल अदा करते रहे हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बनवाने तक का काम प्रियंका गांधी की यही टीम करती रही है. अजय कुमार लल्लू से लेकर बृजलाल खाबरी और अजय राय तक को प्रदेश अध्यक्ष बनवाने में प्रियंका के दौर वाले सह-प्रभारियों का अहम रोला था. बृजलाल खाबरी से लेकर अजय राय तक से उनके रिश्ते इसलिए बिगड़ गए थे कि उनके रबर स्टांप नहीं बन सके.
2019 से लेकर अभी तक इन नेताओं ने यूपी की कमान संभाल रखी थी जबकि प्रियंका गांधी ने 2023 में ही यूपी की कमान छोड़ दी थी. इसके बाद भी कांग्रेस का काम देखते रहे. 2024 के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस ने अपना प्रभारी बदलते हुए अविनाश पांडे को जिम्मेदारी सौंपी दी थी, लेकिन उनके साथ भी प्रियंका गांधी के वक्त तैनात रहे राष्ट्रीय सचिवों को बरकरार रखा गया था.
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हालांकि, अविनाश पांडेय ने इसपर अपनी आपत्ति जताई थी, लेकिन उसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा था. अजय राय भी प्रदेश के इन सह-प्रभारियों के साथ काम करने में सहज नहीं थे, जिसे लेकर कई बार सियासी टकराव भी हुए. अब कांग्रेस 2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए प्रियंका के दौर वाली टीम को हटाकर नई टीम तैयार की गई है.
राहुल गांधी के करीबियों को यूपी की कमान
उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी की टीम के पूरी तरह फेल होने के बाद अब कमान राहुल गांधी की करीबी नेताओं को सौंपी जा रही है. इस कड़ी में सबसे पहले राजेंद्र पाल गौतम को यूपी का प्रभारी बनाया गया, उससे पहले यूपी में अल्पसंख्यक मोर्चा और अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति भी उसी लिहाज से की गई.
राजेंद्र पाल गौतम के साथ अब उन्हें नई टीम दे दी गई है, जिसमें ज्यादातर नेता राहुल गांधी के पसंद वाले हैं. पार्टी ने राष्ट्रीय सचिव दिल्ली के अभिषेक दत्त, मध्य प्रदेश के कुणाल चौधरी, राजस्थान के पूर्व विधायक जगदीश चंद्र जांगिड़, उत्तराखंड के पूर्व विधायक संजीव आर्य, एनएसयूआई के पूर्व अध्यक्ष वरुण चौधरी और दिल्ली के अब्दुल हन्नान को यूपी में सह प्रभारी बनाया है.,
अब सह प्रभारियों को यूपी कांग्रेस के अलग अलग जोन की जिम्मेदारी दी जाएगी. आने वाले समय में यही टीम कांग्रेस प्रदेश की नई कार्यकारिणी भी घोषित करने की तैयारी करेगी. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को भी अब तक नई टीम नहीं मिली है, लेकिन अब नए सह-प्रभारियों की नियुक्त के बाद प्रदेश की कार्यकारिणी बन सकती है. यूपी के लिहाज से नई टीम में जाति और क्षेत्रीय समीकरण साधने का प्लान है.
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कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव करना शुरू कर दिया है. पार्टी के भीतर और राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा आम रहती है कि प्रियंका गांधी के केंद्रीय भूमिका में आने और उनके करीबी नेताओं की संगठन से छुट्टी के बाद यूपी कांग्रेस अब नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार कर रही है. कांग्रेस का मुख्य जोर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाने पर है जो जमीनी स्तर पर कैडर को जोड़ सकें और आक्रामक राजनीतिक पिच तैयार कर सकें.
मिशन 2027' कांग्रेस की सियासी चुनौती
उत्तर प्रदेश का आगामी विधानसभा चुनाव कांग्रेस के लिए अस्तित्व और पुनरुत्थान दोनों लिहाज से बेहद अहम है. 2024 के आम चुनावों में सपा के साथ गठबंधन से मिले बेहतर परिणामों ने कांग्रेस में नई जान फूंकी है. पार्टी जानती है कि यदि 2027 में बीजेपी के विजय रथ को रोकना है, तो सियासी हदों में बंधा संगठन काम नहीं आएगा, बल्कि बूथ स्तर तक वफादार और आक्रामक चेहरों की फौज खड़ी करनी होगी.
यही वजह है कि पार्टी समय रहते उन तमाम चेहरों और रणनीतियों की समीक्षा कर रही है जो चुनावों के दौरान सुस्त साबित हुए थे. प्रभारियों और सह-प्रभारियों के दायित्वों में फेरबदल इसी वृहद रणनीति का हिस्सा है ताकि किसी एक व्यक्ति पर निर्भरता कम हो और सामूहिक नेतृत्व और क्षेत्रीय क्षत्रपों को उभरने का मौका मिले. आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस का यह बदला हुआ संगठनात्मक कलेवर और यूपी पर नए सिरे से फोकस उसे ज़मीन पर कितना फायदा पहुंचा पाता है?
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