पहले कौशल किशोर की नाराजगी, अब हीरा ठाकुर का एग्जिट... सेंट्रल यूपी कैसे संभालेगी बीजेपी?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के साथ सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की कवायद में है, तो सपा-का…

सौजन्य से:- Aaj Tak News
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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की सरगर्मी के साथ सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. बीजेपी सत्ता की हैट्रिक लगाने की कवायद में है, तो सपा-कांग्रेस अपनी वापसी के लिए बेताब हैं. सूबे की चुनावी जंग जीतने में सामाजिक समीकरणों यानी 'सोशल इंजीनियरिंग' का अहम रोल होता है. यूपी का अवध बेल्ट इलाका, जिसे बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है, वहां 2024 में पहले गणित बिगड़ा और अब पार्टी नेताओं की नाराजगी एक बड़ी चुनौती बन रही है.
मोहनलालगंज के पूर्व सांसद और पार्टी के प्रमुख पासी चेहरे कौशल किशोर बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. कौशल किशोर ने पहले सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा और फिर आजतक से बात करते हुए अपनी नाराजगी को सार्वजनिक रूप से जाहिर किया. उन्होंने कहा कि गेंद जितनी ऊपर जानी थी चली गई, अब नीचे आ रही है और इसकी स्पीड को कोई कम नहीं कर सकता.
वहीं, पूर्व एमएलसी और ओबीसी नेता हीरा ठाकुर ने सोमवार को बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है. इससे पहले अगस्त के आखिरी सप्ताह में हरदोई से पूर्व एमएलसी अवध कुमार सिंह 'बागी' ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली थी. इस तरह एक के बाद एक नेताओं का साथ छोड़ना अवध बेल्ट में बीजेपी के लिए सियासी टेंशन बढ़ा सकता है.
बीजेपी का दरकता अवध दुर्ग
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उत्तर प्रदेश के अवध बेल्ट में लखनऊ, रायबरेली, हरदोई, सीतापुर, उन्नाव और लखीमपुर खीरी जैसे जिले आते हैं. बीजेपी ने 2014 से गैर-यादव पिछड़े और गैर-जाटव दलितों को जोड़कर एक अभेद्य 'सोशल इंजीनियरिंग' का ढांचा तैयार किया था.
पासी समुदाय, जो यूपी में जाटव समाज के बाद दलित समुदाय की दूसरी सबसे बड़ी आबादी है, इस समीकरण की सबसे अहम धुरी रहा है. इसके अलावा अवध बेल्ट में साहू और नाई जैसी अतिपिछड़ी जातियों को जोड़कर बीजेपी 2014 से लगातार चुनाव जीतती रही है.
2024 के चुनाव में अवध बेल्ट में बीजेपी को तगड़ा झटका लगा था. अवध क्षेत्र की 20 लोकसभा सीटों में अमेठी, रायबरेली, सुल्तानपुर, सीतापुर और लखनऊ जैसी सीटें आती हैं. इन 20 सीटों में से बीजेपी केवल नौ सीटें ही जीत सकी, जबकि सपा सात और कांग्रेस चार सीटें जीतने में कामयाब रही. इस क्षेत्र में बीजेपी को सबसे बड़ा झटका फैजाबाद में लगा था.
अवध के इलाके में बीजेपी की दोनों बड़ी महिला नेता मेनका गांधी (सुल्तानपुर) और स्मृति ईरानी (अमेठी) से चुनाव हार गईं. बीजेपी के कद्दावर नेता और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की लखनऊ में जीत का अंतर भी घटकर लगभग 1.5 लाख रह गया, जबकि 2019 में यह 3.47 लाख था. इससे साफ है कि बीजेपी का मजबूत दुर्ग दरक रहा है.
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बीजेपी को एक के बाद एक झटका
यूपी के अवध बेल्ट में बीजेपी का सियासी समीकरण गड़बड़ा रहा है. कौशल किशोर अवध क्षेत्र में पासी समाज का बड़ा चेहरा माने जाते हैं, जो 2024 में सपा के पासी नेता आर.के. चौधरी से हार गए थे. इसके बावजूद अवध में पासी जाति के बीच कौशल किशोर की अपनी पकड़ मानी जाती है. ऐसे में उनकी नाराजगी बीजेपी के गणित को बिगाड़ सकती है, क्योंकि इससे संदेश जा रहा है कि बीजेपी के भीतर गैर-जाटव दलितों को वह तवज्जो नहीं मिल पा रही है जिसकी वे उम्मीद करते थे.
वहीं, हीरा ठाकुर जैसे ओबीसी नेताओं का दूर जाना उन स्थानीय समीकरणों को चोट पहुंचाता है जो बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को जोड़ने का काम करते थे. सोमवार को हीरा ठाकुर ने बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है.
हीरा ठाकुर उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री रहे हैं, ओबीसी आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष, 12 वर्षों तक विधान परिषद के सदस्य, सभापति और नेता-उपनेता जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं. वे 'कर्पूरी ठाकुर विचार मंच' के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और ओबीसी समाज के बड़े नेता माने जाते हैं.
बीजेपी के पूर्व एमएलसी अवध कुमार सिंह 'बागी' भी अवध बेल्ट से आते हैं. वे हरदोई के संडीला क्षेत्र से हैं और राजपूत समाज से ताल्लुक रखते हैं. उन्होंने भी बीजेपी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया है. कौशल किशोर लखनऊ के मोहनलालगंज से हैं और उनकी पत्नी अभी भी बीजेपी से विधायक हैं. हीरा ठाकुर लखीमपुर खीरी से आते हैं तो अवध कुमार बागी हरदोई से हैं.
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बीजेपी के लिए कैसे बढ़ी चुनौती?
अवध का इलाका बीजेपी के लिए सियासी तौर पर मुश्किलें पैदा कर रहा है. किसी भी मजबूत राजनीतिक महल की नींव में ऐसे नेताओं का बड़ा योगदान होता है. जब जमीनी जुड़ाव रखने वाले नेता या तो साइडलाइन महसूस करते हैं या पाला बदलते हैं, तो उससे न केवल कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरता है बल्कि आम मतदाताओं के बीच भी एक असहज संदेश पहुंचता है.
सपा और कांग्रेस से मिलकर बने 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) गठबंधन के इस दौर में, विपक्ष अवध की इन दरारों पर पैनी नजर जमाए बैठा है, जिस तरह से समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार दलित और पिछड़ा वर्ग के मुद्दों पर आक्रामक हैं, ऐसे में बीजेपी के अपने ही मजबूत स्तंभों का डिगना आगामी चुनावों में भारी पड़ सकता है.
यूपी के अवध बेल्ट में यदि पासी और अन्य गैर-जाटव दलित वोट बैंक खिसकता है, तो कई विधानसभा क्षेत्रों के नतीजे पूरी तरह पलट सकते हैं. बीजेपी के लिए अवध में सबसे बड़ी चुनौती अब सिर्फ समीकरण और वोट बैंक को सहेजने की नहीं है, बल्कि उस सामाजिक गठबंधन को बिखरने से बचाने की है जो उसने बीते एक दशक में खड़ा किया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समय रहते अगर बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने कौशल किशोर जैसे वरिष्ठ नेताओं की चिंताओं को दूर नहीं किया और जमीनी स्तर पर सोशल इंजीनियरिंग की दरारों को नहीं भरा, तो सेंट्रल यूपी का यह राजनीतिक असंतोष पूरे राज्य में पार्टी के समीकरण बिगाड़ने की ताकत रखता है. 2014 में बीजेपी ने जिस तरह अलग-अलग जातियों में बिखरे हुए वोट बैंक को एकजुट किया था, वह अब बिखरता हुआ नजर आ रहा है,
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