यूपी चुनाव में ओवैसी गठबंधन का ऑफर दे रहे, क्यों असमंजस में है कांग्रेस? सपा भी अलर्ट
यूपी चुनाव में ओवैसी गठबंधन का ऑफर दे रहे, क्यों असमंजस में है कांग्रेस? सपा भी अलर्ट कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोटों का सवाल बेहर अहम है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण पर निर्भर…

सौजन्य से:- Hindustan
यूपी चुनाव में ओवैसी गठबंधन का ऑफर दे रहे, क्यों असमंजस में है कांग्रेस? सपा भी अलर्ट
कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोटों का सवाल बेहर अहम है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण पर निर्भर रही है, जबकि कांग्रेस राज्य में अपना अलग जनाधार मजबूत करने की कोशिश में जुटी है।
उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की पेशकश की है। ओवैसी ने कहा कि जो दल भारतीय जनता पार्टी को दोबारा सत्ता में आने से रोकना चाहते हैं, उन्हें एआईएमआईएम के साथ आना चाहिए। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी 2 अक्टूबर तक गठबंधन को लेकर फैसला करेगी। ओवैसी के इस प्रस्ताव ने कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के सामने नई राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। एक तरफ AIMIM के अलग लड़ने पर विपक्षी वोटों के बंटने की चिंता है, तो दूसरी तरफ उसके साथ गठबंधन करने पर बीजेपी को विपक्ष पर हमला करने का मौका मिलने की आशंका है।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस चिंता को खुलकर सामने रखा है। उन्होंने कहा कि मुख्य लक्ष्य बीजेपी को हराना होना चाहिए और सिर्फ मुसलमानों के वोट के सहारे भाजपा को नहीं हराया जा सकता। मसूद के मुताबिक, ओवैसी की पार्टी अगर 4-5 सीटें भी जीत लेती है तो सवाल यह है कि उसका फायदा किसे होगा। उन्होंने आशंका जताई कि अगर AIMIM की मौजूदगी से विपक्षी वोट बंटे और आखिर में बीजेपी की सरकार बन गई तो इसका राजनीतिक मकसद पूरा नहीं होगा। मसूद ने यह भी कहा कि हैदराबाद और उत्तर प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। इसलिए हैदराबाद में ओवैसी की चुनावी स्थिति को सीधे यूपी पर लागू नहीं किया जा सकता।
जनाधार मजबूत करने की कोशिश में कांग्रेस
कांग्रेस के लिए मुस्लिम वोटों का सवाल इस पूरे समीकरण का अहम हिस्सा है। समाजवादी पार्टी लंबे समय से उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-यादव सामाजिक समीकरण पर निर्भर रही है, जबकि कांग्रेस राज्य में अपना अलग जनाधार मजबूत करने की कोशिश कर रही है। 2024 का लोकसभा चुनाव दोनों दलों ने साथ मिलकर लड़ा था और अब भी दोनों विपक्षी साझेदार हैं। लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले दोनों पार्टियां अपने संगठन और सामाजिक आधार को बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे में एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कांग्रेस और सपा के लिए आसान फैसला नहीं है। सपा भी इसे लेकर अलर्ट मोड में है। अगर AIMIM अलग चुनाव लड़ती है तो कुछ सीटों पर विपक्षी वोट बंट सकते हैं। वहीं, गठबंधन होने पर ओवैसी को उत्तर प्रदेश में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने का ज्यादा मौका मिल सकता है।
अल्पसंख्यक राजनीति के आरोप की चिंता
बीजेपी का मुद्दा भी इस पूरे मामले को और पेचीदा बना रहा है। कांग्रेस नेताओं को आशंका है कि अगर एआईएमआईएम अलग-अलग सीटों पर चुनाव लड़ती है तो भाजपा इसे विपक्षी वोटों के बंटवारे के तौर पर पेश कर सकती है। अगर कांग्रेस या सपा ओवैसी की पार्टी के साथ आती हैं, तो बीजेपी इसे अल्पसंख्यक केंद्रित राजनीति के आरोप के लिए इस्तेमाल कर सकती है। एआईएमआईएम का उत्तर प्रदेश में अब तक का चुनावी रिकॉर्ड भी सीमित रहा है। 2022 के विधानसभा चुनाव में पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी। हालांकि, इसके बाद पार्टी ने राज्य में अपना संगठन मजबूत करने और 2027 के चुनाव के लिए ज्यादा सीटों पर तैयारी करने की कोशिश शुरू की है।
AIMIM पर विपक्षी एकता कमजोर करने का आरोप
इस बीच, AIMIM का कांग्रेस से राजनीतिक मुकाबला भी सामने आया है। पार्टी के उत्तर प्रदेश के प्रमुख चेहरों में रहे और राष्ट्रीय प्रवक्ता सैयद असीम वकार कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। वकार ने कांग्रेस में आने के बाद विपक्षी दलों से बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की अपील की थी और एआईएमआईएम पर विपक्षी एकता कमजोर करने का आरोप लगाया था। दूसरी ओर, ओवैसी लगातार गठबंधन की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। उन्होंने कहा है कि बीजेपी को रोकने के लिए विपक्षी दलों को साथ आना चाहिए और उनकी पार्टी भी इसके लिए तैयार है। अब 2 अक्टूबर की तारीख अहम हो गई है, जब एआईएमआईएम अपने संभावित गठबंधन को लेकर फैसला करने वाली है।
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