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कभी नहीं आईं महारानी विक्टोरिया... फिर भी नाम 'रानी मंडी', प्रयागराज के इस इलाके की ब्रिटिश शासन काल से पहचान - rani mandi prayagraj naming of queen victoria and rich history this area

कभी नहीं आईं महारानी विक्टोरिया... फिर भी नाम 'रानी मंडी', प्रयागराज के इस इलाके की ब्रिटिश शासन काल से पहचान प्रयागराज की रानी मंडी का नाम महारानी विक्टोरिया के सम्मान में रखा गया था, हालांकि वे कभी यहां नहीं आईं। ...और…

Jagran के अनुसार5 अक्टूबर 2026 को 09:04 am बजे
कभी नहीं आईं महारानी विक्टोरिया... फिर भी नाम 'रानी मंडी', प्रयागराज के इस इलाके की ब्रिटिश शासन काल से पहचान - rani mandi prayagraj naming of queen victoria and rich history this area

सौजन्य से:- Jagran

कभी नहीं आईं महारानी विक्टोरिया... फिर भी नाम 'रानी मंडी', प्रयागराज के इस इलाके की ब्रिटिश शासन काल से पहचान

प्रयागराज की रानी मंडी का नाम महारानी विक्टोरिया के सम्मान में रखा गया था, हालांकि वे कभी यहां नहीं आईं। ...और पढ़ें

HighLights

- विक्टोरिया के सम्मान में कोतवाली के बगल के रास्ते का नामकरण किया था

- ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से रानी मंडी अपना अहम स्थान रखती है

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। पुराने शहर और मंडियों का खास रिश्ता है। मंडियां जो व्यापार के केंद्र के तौर पर अपनी पहचान रखती थीं तो ब्रिटिश शासन में खुल कर अपनी अभिव्यक्ति के लिये शहरियों का प्रमुख ठिकाना भी थीं। एक-दो-चार नहीं, बड़ी लंबी श्रृंखला रही है इनकी। मंडियां अब भी हैं लेकिन इनके स्वरूप में काफी परिवर्तन आ चुका है। इन्हीं में एक है रानी मंडी, जिसे ''गागर में सागर'' भी कहा जा सकता है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टि से रानी मंडी अपना अहम स्थान रखती है।

बाद में इसका नाम चड्ढा मार्ग हुआ

दैनिक जागरण ने खंगाला इस मुहल्ले के इतिहास को तो तथ्य मिला कि ब्रिटिश काल में कम्पनी शासन के बाद जब शासन की बागडोर महारानी विक्टोरिया के हाथ आई तो उनके सम्मान में तत्कालीन नगर महापालिका के अधिकारियों ने शहर कोतवाली के ठीक बगल से गुजरे रास्ते का नामकरण किया रानी मंडी। हालांकि यह बात दीगर है कि यहां रानी विक्टोरिया कभी आईं नहीं। कालान्तर में इसे चड्ढा मार्ग भी नाम मिला जो कि लिखापढ़ी में हो चुका है लेकिन लोगों की जुबां पर रानी मंडी अब भी है।

होता था सराफा और कपड़े का कारोबार

रानी मंडी में मूल व्यापार सराफा और कपड़े का हुआ करता था। ऑर्नामेंट की यहां कई दुकानें हुआ करती थीं, इनमें ''बच्चा जी'' के पारिवारिक सदस्य भी आभूषण का कारोबार करते थे। कुछ आभूषण व्यापारी अब भी पारंपरिक व्यवसाय को जीवंत रखे हैं। कपड़े के व्यापारी भी रानी मंडी की मूल पहचान को बनाए हुए हैं। इसी मंडी में पहले एक बड़ा डाकघर और तारघर हुआ करता था। यही वो स्थान है जहां से श्री महंत बाबा हाथीराम पजावा रामलीला कमेटी के द्वारा भगवान श्री राम, सीता, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, हनुमान जी का श्रृंगार किया जाता था, यहीं श्रृंगार चौकियां भी भव्य स्वरूप में सजाई जाती थीं। मोहर्रम के दिनों में दायराशाह अजमल से निकलने वाले ताबूत को कुछ देर रखा जाता था। पुरनियों को वह दिन भी याद है जब होली की खुशियों के बीच यहां बच्चा जी की कोठी के सामने चैलाफाड़ कवि सम्मेलन हुआ करता था।

साहित्य के धुरंधरों की होती थी अड्डेबाजी

हिंदी साहित्य के धुरंधर रवींद्र कालिया ने रानी मंडी में ही प्रेस का संचालन किया था। यहीं से पत्रिका का प्रकाशन करते थे और और अपनी कलम से ऐसी कहानियों को आम जनता तक पहुंचाया जो हिंदी साहित्य में कालजयी हो गईं, इसमें उनकी पत्नी वरिष्ठ साहित्यकार ममता कालिया का भी सहयोग मिलता था। रविंद्र कालिया की प्रेस में शहर के तमाम नामीगिरामी साहित्यकारों का जमावड़ा होता था।

संतोँषी माता का मंदिर अध्यात्म का केंद्र

रानी मंडी का इतिहास इसकी विशेषता और वैभव के बारे में जानकारी देते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के मीडिया स्टडीज सेंटर के समन्वयक डा धनंजय चोपड़ा कहते हैं कि महारानी विक्टोरिया के नाम पर इसे रानी मंडी कहा जाने लगा लेकिन मुहल्ला बहुत पुराना है। यह पुराने शहर को चौक से अतरसुइया, मीरापुर, दरियाबाद और बलुआघाट से जोड़ने वाला प्रमुख रास्ता है। रानी मंडी और इसके आसपास तमाम ऐसे मंदिर हैं जो धर्म अध्यात्म के साथ ही भारतीय संस्कृति को भी संजोए हुए हैं। रानी मंडी में बच्चा जी की कोठी के ठीक पीछे संतोषी माता का मंदिर है। शहर में संतोषी माता का मंदिर शायद इसके अलावा कहीं और नहीं।

ऐसे पहुंचें रानी मंडी

सिविल लाइंस से जाना हो तो निरंजन टाकीज, जानसेनगंज, घंटाघर, चौक कोतवाली होते हुए पहुंच सकते हैं। झूंसी की ओर से जाना हो तो रामबाग, कोठापार्चा, बहादुरगंज, बताशा मंडी, लोकनाथ चौराहा, चौक कोतवाली होकर जा सकते हैं।

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