पश्चिमी यूपी का 'चौधरी-टशन' बनाम पूर्वांचल का 'बाहुबली-रसूख'; जाति और पावर बैन का कहां कितना असर?
पश्चिमी यूपी का 'चौधरी-टशन' बनाम पूर्वांचल का 'बाहुबली-रसूख'; जाति और पावर बैन का कहां कितना असर? आशुतोष सहाय के संपादन के साथ मेरठ से संवाददाता श्रीपाल तेवतिया की स्पेशल रिपोर्ट... By ETV Bharat Uttar Pradesh Team Publi…

सौजन्य से:- ETV Bharat
पश्चिमी यूपी का 'चौधरी-टशन' बनाम पूर्वांचल का 'बाहुबली-रसूख'; जाति और पावर बैन का कहां कितना असर?
आशुतोष सहाय के संपादन के साथ मेरठ से संवाददाता श्रीपाल तेवतिया की स्पेशल रिपोर्ट...
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 10, 2026 at 3:02 PM IST
मेरठ/वाराणसी: यदि आप मेरठ के मवाना रोड पर दौड़ती किसी एसयूवी को रुकवा कर पूछेंगे कि गाड़ी से जाति का नाम क्यों हटाया, तो जवाब मिलेगा—'भाईजी, दिल्ली-नोएडा जाना पड़ता है, पुलिस 5,000 रुपये का ऑनलाइन चालान घर भेज देती है.' लेकिन इसी सवाल को जब आप पूर्वांचल के मऊ या गाजीपुर के किसी चौराहे पर दोहराएंगे, तो जवाब का लहजा बदल जाता है-'गाड़ी पर पद और नाम न लिखें, तो इलाके में हमारी बात कौन सुनेगा?'
उत्तर प्रदेश में जाति और रसूख के प्रदर्शन पर लगी पाबंदी का एक साल पूरा होने पर हमारी यह ग्राउंड रिपोर्ट पश्चिमी यूपी के 'आर्थिक टशन' और पूर्वांचल के 'राजनीतिक बाहुबल' के बीच कानून की बदलती रफ्तार का आंखों देखा हाल बयां करती है.
'जातिगत रौब' के पीछे की क्या है साइकोलॉजी: उत्तर प्रदेश में जाति और रसूख के प्रदर्शन पर रोक है, लेकिन इसके बावजूद सड़कों पर ऐसे वाहन आसानी से नजर आ जाते हैं, जिन पर जाति, धर्म या किसी पद का नाम लिखा होता है. कुछ लोगों के लिए गाड़ी पर अपनी जाति या पदनाम लिखवाना स्टेटस सिंबल बन गया है. वहीं, कई लोग इसे दबंगई और रौब दिखाने का तरीका भी मानते हैं. सवाल है कि आखिर गाड़ी पर जाति या पदनाम लिखकर कोई व्यक्ति क्या साबित करना चाहता है?
गाड़ी पर नाम लिखने से क्या हासिल होता है: सड़कों पर अक्सर ऐसी गाड़ियां दिखाई देती हैं, जिन पर 'प्रधान', 'ब्लॉक प्रमुख', 'जिला पंचायत सदस्य', 'पूर्व विधायक', 'पत्रकार' या किसी दूसरी पहचान का जिक्र होता है. कई बार गाड़ियों पर जाति और धर्म से जुड़े शब्द भी बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे होते हैं. ऐसा लगता है कि गाड़ी का मालिक सड़क पर अपनी अलग पहचान और रसूख दिखाना चाहता है. लेकिन सवाल यह है कि क्या एक सभ्य समाज में इस तरह अपनी पहचान का प्रदर्शन जरूरी है?
जाति और पदनाम को स्टेटस सिंबल बनाने की मानसिकता: ईटीवी भारत ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सड़कों पर ऐसे कई वाहनों को कैमरे में कैद किया. इस मुद्दे पर रिसर्च स्कॉलर्स से बातचीत की गई और यह समझने की कोशिश की गई कि लोग गाड़ियों पर जाति या पदनाम क्यों लिखवाते हैं. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर अरुण कुमार का मानना है कि वाहनों पर जातिसूचक शब्द लिखना उचित नहीं है. इससे जातिगत टकराव और सामाजिक तनाव की स्थिति बन सकती है.
जाति के प्रदर्शन से बढ़ सकती है दूरी: अरुण कुमार के मुताबिक, समाज में आपसी संबंध मजबूत बने रहने चाहिए और वैचारिक मतभेद को जातिगत टकराव में नहीं बदलना चाहिए. चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर योगेश कुमार भी मानते हैं कि अपनी जाति को श्रेष्ठ बताने और उसका प्रदर्शन करने की प्रवृत्ति उचित नहीं है. उनका कहना है कि हर जाति के लोगों में अपनी पहचान और गौरव को लेकर अलग-अलग भावनाएं हो सकती हैं. लेकिन अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए गाड़ी पर जाति लिखकर चलना समाज में दूरी बढ़ा सकता है.
असली गर्व साथ लेकर चलने में है: योगेश कुमार के मुताबिक, गर्व इस बात का होना चाहिए कि सभी लोगों को साथ लेकर कैसे चला जाए. उनका कहना है कि स्कूलों में एक जैसा ड्रेस कोड होने से बच्चों के बीच ऊंच-नीच का भाव कम होता है. इसी तरह समाज में भी लोगों को अपनी जाति या पद का प्रदर्शन करने के बजाय एक साथ आगे बढ़ने की कोशिश करनी चाहिए. उनका मानना है कि भाईचारा बढ़ाना ही समाज के लिए ज्यादा जरूरी है.
मोटर व्हीकल नियमों में भी रोक: रिसर्च स्कॉलर अजय का कहना है कि मोटर व्हीकल नियमों के तहत वाहनों पर इस तरह जाति या अन्य पहचान लिखना नियमों के खिलाफ है. उनका मानना है कि ऐसे मामलों में जो भी कानूनी प्रावधान हैं, उनका सख्ती से पालन होना चाहिए. अजय के मुताबिक, अगर नियम मौजूद हैं लेकिन उनका पालन नहीं कराया जाएगा तो ऐसे चलन को रोकना मुश्किल होगा. उनका कहना है कि कई लोग जाति का प्रदर्शन करके गर्व महसूस करते हैं, जबकि देश की ताकत उसकी विविधता में है.
गाड़ी पर जाति लिखने के पीछे क्या मनोविज्ञान है: चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के प्रोफेसर आलोक कुमार इसे गलत सामाजिक सोच मानते हैं. उनका कहना है कि किसी भी व्यक्ति की सबसे पहली पहचान एक भारतीय नागरिक की होनी चाहिए. इसके बाद ही उसकी पहचान किसी जाति, पंथ या परंपरा से जुड़ती है. उनके मुताबिक, जाति के आधार पर अपनी पहचान को आगे बढ़ाने की कोशिश समाज में गलत संदेश देती है.
'प्रभावी जाति' का प्रभाव भी एक वजह: प्रोफेसर आलोक कुमार के मुताबिक, समाज के कई इलाकों में कुछ जातियां आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली होती हैं. समाजशास्त्र में इन्हें 'प्रभावी जाति' के रूप में देखा जाता है. कई बार प्रभावशाली समूह अपना दबदबा दिखाने के लिए भी इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. उनका मानना है कि किसी भी सभ्य और विकसित समाज में इस तरह डर या दबदबा बनाने की कोशिश सही नहीं है.
पुरानी सोच से आगे निकलना जरूरी: प्रोफेसर आलोक कुमार का कहना है कि अगर भारत को विकसित राष्ट्र बनना है तो आर्थिक विकास के साथ सामाजिक और बौद्धिक विकास भी जरूरी है. जातिगत पहचान के नाम पर समाज में दूरी बढ़ाना इस लक्ष्य के रास्ते में बाधा बन सकता है. उनका कहना है कि जाति व्यवस्था को खत्म करने की बात लंबे समय से होती रही है, लेकिन राजनीति में जाति के इस्तेमाल के कारण यह मुद्दा अब भी मौजूद है. राजनीतिक दल जब वोट के समीकरण में जाति को महत्व देते हैं तो इससे जातिगत पहचान को और मजबूती मिल सकती है.
राजनीतिक इस्तेमाल से भी मजबूत होती है जाति की पहचान: प्रोफेसर आलोक कुमार के मुताबिक, चुनावी राजनीति में जातिगत समीकरणों का इस्तेमाल लंबे समय से होता रहा है. टिकट वितरण से लेकर राजनीतिक भागीदारी तक जाति को एक महत्वपूर्ण आधार माना जाता है. इससे लोगों के बीच अपनी जातिगत पहचान को लेकर जागरूकता और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है. जब तक राजनीतिक गठजोड़ और भागीदारी में इस सोच को कम नहीं किया जाएगा, तब तक जाति की पकड़ कमजोर करना आसान नहीं होगा.
पहचान की तलाश भी हो सकती है बड़ी वजह: प्रोफेसर आलोक कुमार के मुताबिक, इसके पीछे एक मनोविज्ञान भी काम करता है. हर व्यक्ति समाज में अपनी पहचान बनाना चाहता है. जब किसी व्यक्ति को लगता है कि वह अपनी अलग पहचान नहीं बना पाया है तो वह जाति या किसी पद को अपनी पहचान के रूप में इस्तेमाल कर सकता है. ऐसे में गाड़ी पर जाति या पदनाम लिखना उसके लिए अपनी पहचान और प्रभाव दिखाने का एक आसान तरीका बन जाता है.
पुलिस और RTO को भी करनी होगी सख्ती: प्रोफेसर आलोक कुमार का कहना है कि ऐसे मामलों में पुलिस और परिवहन विभाग को भी प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए. अगर सड़क पर गाड़ी पर जाति या पदनाम लिखा हुआ है तो उसे सिर्फ एक छोटी गलती मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. लगातार कार्रवाई और जागरूकता से इस तरह के चलन को कम किया जा सकता है. समाज में पहचान बनाने का रास्ता कानून और सामाजिक जिम्मेदारी के साथ ही होना चाहिए.
मेरठ पुलिस ने कहा- लगातार हो रहे चालान: मेरठ के एसपी ट्रैफिक राजेश श्रीवास्तव का कहना है कि संविधान धर्म, लिंग और जाति के आधार पर भेदभाव को रोकता है. इसी भावना के तहत वाहनों पर जातिसूचक या धर्मसूचक शब्दों का इस्तेमाल भी उचित नहीं है. उन्होंने बताया कि ऐसे वाहनों के लगातार चालान किए जा रहे हैं. उनके मुताबिक, पहले की तुलना में ऐसे मामलों की संख्या अब कम हुई है.
ग्रामीण इलाकों में अब भी ज्यादा मामले: एसपी ट्रैफिक के मुताबिक, कुछ लोग जानकारी के अभाव में अपने वाहनों पर जाति या दूसरे पहचान वाले शब्द लिखवा लेते हैं. ग्रामीण इलाकों में ऐसे मामले अभी भी कभी-कभी सामने आते हैं. वहीं शहरी इलाकों में वाहनों पर जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल काफी कम हुआ है. पुलिस की ओर से लगातार जागरूकता अभियान भी चलाए जा रहे हैं.
मेरठ में अगस्त तक करीब 300 चालान: राजेश श्रीवास्तव के मुताबिक, जनवरी 2026 में मेरठ में जातिसूचक चिन्ह वाले 28 वाहनों का चालान किया गया. फरवरी में 19 और मार्च में 134 वाहनों पर कार्रवाई हुई. अप्रैल में 58 और मई में 29 चालान किए गए. जून में 19, जुलाई में 7 और अगस्त में 5 वाहनों का चालान किया गया.
कैमरों से भी हो रही निगरानी: इस तरह जनवरी से अगस्त 2026 के बीच मेरठ में ऐसे मामलों में करीब 300 चालान किए गए. पुलिस के मुताबिक, अब चौक-चौराहों पर लगे ऑटोमेटिक कैमरों से भी नियम तोड़ने वाले वाहनों की पहचान हो सकती है. लगातार कार्रवाई के कारण लोग अब पहले से ज्यादा जागरूक हो रहे हैं. पुलिस का मानना है कि नियमों का पालन बढ़ने से सड़क पर भेदभाव और दबदबे की ऐसी तस्वीरें कम होंगी.
पूर्वांचल में पदनाम वाले वाहनों का चलन: अब बात पूर्वांचल की सड़कों की, जहां वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़ और जौनपुर जैसे शहरों में भी पदनाम लिखे वाहन नजर आते हैं. कई SUV और दोपहिया वाहनों पर 'प्रधान', 'पूर्व विधायक', 'ब्लॉक प्रमुख', 'जिला पंचायत सदस्य' या दूसरे पदों के नाम लिखे दिखाई देते हैं. कई बार ये नाम नंबर प्लेट के ऊपर या उसके आसपास बड़े अक्षरों में लिखे होते हैं. ऐसे मामलों में पदनाम सिर्फ पहचान नहीं, बल्कि रौब और VIP कल्चर दिखाने का माध्यम बन जाता है.
पदनाम बनता है 'रसूख' का कवच: कई लोगों का मानना है कि गाड़ी पर पदनाम लिखने के पीछे एक मकसद पुलिस की नजर में अपना प्रभाव दिखाना भी हो सकता है. कुछ वाहन मालिक इसे सामाजिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखते हैं. लेकिन सड़क पर हर व्यक्ति के लिए नियम एक जैसे होने चाहिए. किसी पद, पहचान या राजनीतिक संबंध के आधार पर ट्रैफिक नियमों में छूट नहीं मिलनी चाहिए.
हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी सवाल कायम: इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद उत्तर प्रदेश में सार्वजनिक जगहों, कानूनी दस्तावेजों और पुलिस रिकॉर्ड में जाति के उल्लेख को लेकर भी सख्त रुख सामने आया है. कोर्ट ने पुलिस दस्तावेजों और FIR में जाति के उल्लेख को संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ माना था. इसके बाद सरकार की ओर से भी ऐसे मामलों में रोक लगाने के निर्देश दिए गए. इसके बावजूद सड़कों पर जाति और पदनाम लिखे वाहन अब भी दिखाई देना बताता है कि नियमों के पालन की चुनौती पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.
कार्रवाई के आंकड़ों पर भी सवाल: पूर्वांचल में पिछले एक साल में ऐसे वाहनों पर कितनी कार्रवाई हुई, इसका जिला-वार आधिकारिक आंकड़ा अलग-अलग विभागों से सामने आना जरूरी है. उपलब्ध जानकारी में राज्य स्तर पर करीब 50 हजार से अधिक वाहनों के खिलाफ कार्रवाई का दावा किया गया है, लेकिन इसे पूर्वांचल के चार जिलों का आंकड़ा मानना सही नहीं होगा. इसलिए वाराणसी, गोरखपुर, आजमगढ़ और जौनपुर के लिए अलग-अलग पुलिस और परिवहन विभाग के आंकड़ों की पुष्टि जरूरी है. खासतौर पर चालान, वाहन सीज और FIR की संख्या को अलग-अलग देखना होगा.
सिर्फ चालान से नहीं बदलेगी मानसिकता: सड़कों पर जाति, धर्म या पदनाम लिखकर चलने की प्रवृत्ति सिर्फ ट्रैफिक नियमों का मामला नहीं है. यह समाज में पहचान, प्रतिष्ठा और दबदबे की मानसिकता से भी जुड़ी हुई है. कानून का पालन कराने के साथ लोगों को यह समझाना भी जरूरी है कि सड़क पर किसी की जाति या पद नहीं, बल्कि वाहन के नियम और नागरिक की जिम्मेदारी मायने रखती है. अगर यह सोच मजबूत होती है तो 'रौब' दिखाने के लिए गाड़ी पर पदनाम लिखने की जरूरत खुद-ब-खुद कम हो सकती है.
नियम होना चाहिए सबसे ऊपर: आखिर में सवाल यही है कि गाड़ी पर जाति या पदनाम लिखकर कोई व्यक्ति क्या हासिल करना चाहता है? अगर मकसद सम्मान और पहचान है तो समाज में सम्मान काम और व्यवहार से मिलना चाहिए, गाड़ी पर लिखे किसी शब्द से नहीं. कानून सभी के लिए बराबर है और सड़क पर भी यही बराबरी दिखाई देनी चाहिए. यही सोच एक जिम्मेदार, आधुनिक और मजबूत समाज की पहचान बन सकती है.
वाहनों पर जाति और रसूख की पट्टियां: पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल की इस तुलना से एक बात साफ है कि वेस्ट यूपी में जहां भारी चालान और शहरीकरण के डर से लोग कानून का पालन करने को मजबूर हुए हैं, वहीं पूर्वांचल में रसूख दिखाने की सामंती जिद ने कानून से बचने के नए 'चोर रास्ते' खोज लिए हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह हंटर कागजों पर तो दोनों तरफ बराबर चल रहा है, लेकिन सड़कों पर सामंतवाद के इस साइलेंसर को पूरी तरह शांत होने में अभी लंबा वक्त लगेगा.
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