Kanpur News: यूपी की बड़ी अर्थव्यवस्था वाला कानपुर पांचवें से छठे पायदान पर लुढ़का
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सौजन्य से:- Amar Ujala
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Kanpur News: यूपी की बड़ी अर्थव्यवस्था वाला कानपुर पांचवें से छठे पायदान पर लुढ़का
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जीएसडीपी की रैंकिंग में फिसला शहर, उद्योग का आउटपुट मजबूत लेकिन रोजगार में हिस्सेदारी बेहद कम
खेती पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता और अटके एमओयू ने बढ़ाई चिंता
माई सिटी रिपोर्टर
कानपुर। कभी उत्तर प्रदेश की सबसे मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाला कानपुर अब अपनी आर्थिक रफ्तार खोता जा रहा है। एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को लेकर हुई समीक्षा में कानपुर पांचवें पायदान से खिसककर छठे स्थान पर पहुंच गया। गौतमबुद्ध नगर पहले, लखनऊ दूसरे, गाजियाबाद तीसरे, प्रयागराज चौथे, आगरा पांचवें और कानपुर छठे स्थान पर रहा। कानपुर की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1,47,443 रुपये बताई गई है, जो राष्ट्रीय औसत 2,05,324 रुपये से काफी नीचे है। यह अंतर शहर की कम व्यक्तिगत उत्पादकता और ज्यादा लोगों के कम मूल्य वाले रोजगार में लगे होने की तस्वीर दिखाता है।
कानपुर की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना श्रम और उत्पादन के बीच का असंतुलन है। निर्माण क्षेत्र से 35.30 प्रतिशत आउटपुट मिल रहा है, लेकिन कुल वर्कफोर्स का महज 3.33 प्रतिशत हिस्सा ही इस क्षेत्र में लगा है। इसके उलट 43.10 प्रतिशत कार्यबल खेती पर निर्भर है। यानी जिस क्षेत्र से अधिक मूल्य का उत्पादन मिल सकता है, वहां श्रमिकों की हिस्सेदारी बेहद कम है और बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। आर्थिक समीक्षा में इसी असंतुलन को दूर करने के लिए एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का विस्तार करने पर जोर दिया गया है। चुनौती यह है कि ग्रामीण और कृषि आधारित कार्यबल को अधिक उत्पादक और बेहतर भुगतान वाले औद्योगिक रोजगार में कैसे लाया जाए।
कागजों में एमओयू, जमीन पर इंतजार
कानपुर में निवेश और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर एमओयू हुए, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा अभी तक जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। निवेश प्रस्तावों के वास्तविक उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधि में बदलने की गति धीमी है। यही वजह है कि सरकार एक ओर निवेश और औद्योगिक विस्तार की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिले की आर्थिक रैंकिंग नीचे खिसक रही है।
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बैंकों का कर्ज बढ़ा, उद्योग तक पैसा कम पहुंचा
समीक्षा में क्रेडिट के इस्तेमाल को लेकर भी तस्वीर चिंताजनक बताई गई है। कुल बैंक क्रेडिट में करीब 11.65 प्रतिशत हिस्सेदारी के मुकाबले इंडस्ट्री क्रेडिट महज 6.95 प्रतिशत है। यानी बैंकिंग व्यवस्था में उपलब्ध कर्ज का अपेक्षित हिस्सा उद्योगों तक नहीं पहुंच पा रहा। इसका सीधा असर नए उद्योग, विस्तार, मशीनरी निवेश और रोजगार सृजन पर पड़ सकता है।
खेती में खाद का संतुलन भी बिगड़ा
कानपुर की कृषि अर्थव्यवस्था में भी एक और असंतुलन सामने आया है। फसल उत्पादन के लिए एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि यहां खपत का अनुपात करीब 27:8:1 बताया गया है। यानी नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल जरूरत के मुकाबले काफी अधिक है। लंबे समय में यह मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता दोनों को प्रभावित कर सकता है।
वर्जन -
कृषि क्षेत्रों मे काफ़ी गिरवाट आयी है जिसको लेकर ऐसी फसलों का उत्पादन करने के लिए कहा गया है जिसमें आमदनी ज्यादा हो। इसके साथ जिन विभागों की गति धीमी हुई है उन्हें आपस मे सामंजस बनाकर काम करने लिए कहा गया है।
ईशा शर्मा, डीएसटीओ
खेती पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता और अटके एमओयू ने बढ़ाई चिंता
माई सिटी रिपोर्टर
कानपुर। कभी उत्तर प्रदेश की सबसे मजबूत औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं में गिने जाने वाला कानपुर अब अपनी आर्थिक रफ्तार खोता जा रहा है। एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य को लेकर हुई समीक्षा में कानपुर पांचवें पायदान से खिसककर छठे स्थान पर पहुंच गया। गौतमबुद्ध नगर पहले, लखनऊ दूसरे, गाजियाबाद तीसरे, प्रयागराज चौथे, आगरा पांचवें और कानपुर छठे स्थान पर रहा। कानपुर की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय 1,47,443 रुपये बताई गई है, जो राष्ट्रीय औसत 2,05,324 रुपये से काफी नीचे है। यह अंतर शहर की कम व्यक्तिगत उत्पादकता और ज्यादा लोगों के कम मूल्य वाले रोजगार में लगे होने की तस्वीर दिखाता है।
कानपुर की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी विडंबना श्रम और उत्पादन के बीच का असंतुलन है। निर्माण क्षेत्र से 35.30 प्रतिशत आउटपुट मिल रहा है, लेकिन कुल वर्कफोर्स का महज 3.33 प्रतिशत हिस्सा ही इस क्षेत्र में लगा है। इसके उलट 43.10 प्रतिशत कार्यबल खेती पर निर्भर है। यानी जिस क्षेत्र से अधिक मूल्य का उत्पादन मिल सकता है, वहां श्रमिकों की हिस्सेदारी बेहद कम है और बड़ी आबादी अब भी कृषि पर निर्भर है। आर्थिक समीक्षा में इसी असंतुलन को दूर करने के लिए एमएसएमई और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का विस्तार करने पर जोर दिया गया है। चुनौती यह है कि ग्रामीण और कृषि आधारित कार्यबल को अधिक उत्पादक और बेहतर भुगतान वाले औद्योगिक रोजगार में कैसे लाया जाए।
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कागजों में एमओयू, जमीन पर इंतजार
कानपुर में निवेश और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए बड़े पैमाने पर एमओयू हुए, लेकिन उनका बड़ा हिस्सा अभी तक जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। निवेश प्रस्तावों के वास्तविक उत्पादन, रोजगार और आर्थिक गतिविधि में बदलने की गति धीमी है। यही वजह है कि सरकार एक ओर निवेश और औद्योगिक विस्तार की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जिले की आर्थिक रैंकिंग नीचे खिसक रही है।
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बैंकों का कर्ज बढ़ा, उद्योग तक पैसा कम पहुंचा
समीक्षा में क्रेडिट के इस्तेमाल को लेकर भी तस्वीर चिंताजनक बताई गई है। कुल बैंक क्रेडिट में करीब 11.65 प्रतिशत हिस्सेदारी के मुकाबले इंडस्ट्री क्रेडिट महज 6.95 प्रतिशत है। यानी बैंकिंग व्यवस्था में उपलब्ध कर्ज का अपेक्षित हिस्सा उद्योगों तक नहीं पहुंच पा रहा। इसका सीधा असर नए उद्योग, विस्तार, मशीनरी निवेश और रोजगार सृजन पर पड़ सकता है।
खेती में खाद का संतुलन भी बिगड़ा
कानपुर की कृषि अर्थव्यवस्था में भी एक और असंतुलन सामने आया है। फसल उत्पादन के लिए एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि यहां खपत का अनुपात करीब 27:8:1 बताया गया है। यानी नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों का इस्तेमाल जरूरत के मुकाबले काफी अधिक है। लंबे समय में यह मिट्टी की गुणवत्ता और कृषि उत्पादकता दोनों को प्रभावित कर सकता है।
वर्जन -
कृषि क्षेत्रों मे काफ़ी गिरवाट आयी है जिसको लेकर ऐसी फसलों का उत्पादन करने के लिए कहा गया है जिसमें आमदनी ज्यादा हो। इसके साथ जिन विभागों की गति धीमी हुई है उन्हें आपस मे सामंजस बनाकर काम करने लिए कहा गया है।
ईशा शर्मा, डीएसटीओ
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