पत्रकार के खिलाफ FIR में डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों? सुप्रीम कोर्ट का यूपी पुलिस से सवाल
पत्रकार के खिलाफ FIR में डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों? सुप्रीम कोर्ट का यूपी पुलिस से सवाल वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का पक्ष रखा. By Sumit Saxena Published : September 7,…

सौजन्य से:- ETV Bharat
पत्रकार के खिलाफ FIR में डिजिटल फुटप्रिंट की जरूरत क्यों? सुप्रीम कोर्ट का यूपी पुलिस से सवाल
वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पत्रकार अभिषेक उपाध्याय का पक्ष रखा.
By Sumit Saxena
Published : September 7, 2026 at 5:39 PM IST
|Updated : September 7, 2026 at 6:53 PM IST
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर से एक हलफनामा दाखिल करने को कहा, जिसमें यह स्पष्ट किया जाए कि अयोध्या राम मंदिर में कथित दान चोरी की रिपोर्ट करने वाले पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के खिलाफ FIR के संबंध में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X से क्या जानकारी मांगी जा रही है.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की पीठ उपाध्याय की उस अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसमें उन्होंने कथित रोड-रेज की घटना को लेकर उनके खिलाफ गाजियाबाद पुलिस की FIR को चुनौती दी थी. उपाध्याय ने हाल ही में एक अर्जी दायर की थी जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा 'X' को उनके सोशल मीडिया अकाउंट के बारे में जानकारी मांगने वाले नोटिस को चुनौती दी गई थी.
वरिष्ठ वकील प्रदीप राय ने पीठ के समक्ष अभिषेक उपाध्याय का पक्ष रखा. सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि यूपी पुलिस ने पत्रकार के सोशल मीडिया अकाउंट के बारे में जून से जानकारी मांगी थी, हालांकि FIR अगस्त महीने की एक कथित घटना से संबंधित है.
याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि अकाउंट में लॉग-इन करने के लिए इस्तेमाल किए गए मोबाइल डिवाइस का विवरण भी मांगा गया है और उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि यह याचिकाकर्ता के पत्रकारिता स्रोतों के बारे में जानकारी निकालने की कोशिश थी. राय ने दिशानिर्देशों की जरूरत पर बल दिया.
राज्य सरकार के वकील ने दलील दी कि याचिका में FIR को रद्द करने की मांग की गई थी. पीठ ने राज्य के वकील से पूछा, "रोड रेज के मामले में आपको आरोपी की डिजिटल गतिविधियों (digital footprint) की आवश्यकता क्यों है?"
राज्य के वकील ने पीठ से आग्रह किया कि वह याचिकाकर्ता के द्वारा लगाए गए व्यापक आरोपों की प्रकृति पर विचार करे, और इस व्यापक आरोप पर भी गौर करे कि एक विशेष सरकारी इंजीनियर एक विशिष्ट मंदिर के निर्माण में 40% कमीशन ले रहा था.
सरकारी वकील ने तर्क दिया कि इस तरह के व्यापक आरोप बिना किसी सबूत के लोगों को छवि खराब कर रहे हैं और पूछा कि क्या यह उचित है? राज्य के वकील ने जोर देकर कहा कि सरकारी इंजीनियर की प्रतिष्ठा का क्या होगा और इसका कुछ आधार होना चाहिए, और अगर वह पुलिस के विनियमन की बात कर रहे हैं, तो इस प्रकार की पत्रकारिता के संबंध में क्या विनियमन है?
यूपी सरकार के वकील ने कहा, "यह घटना प्रायोजित या मनगढ़ंत है या नहीं, यह जांच का विषय है. अगर उनके खिलाफ कुछ नहीं मिलता है, तो हम निश्चित रूप से क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करेंगे... लेकिन अगर कुछ आरोप साबित होता है, कोई चश्मदीद गवाह है... जो कहता है कि उसने यह (घटना को) देखा है और आरोप-पत्र दायर किया जाएगा."
पीठ ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, "सिर्फ बात यह है कि जो भी डिजिटल फुटप्रिंट हो... उसमें गहराई से जाने पर, सीमाएं और दिशानिर्देश क्या होने चाहिए... मान लीजिए आप इंस्टाग्राम, फेसबुक या किसी अन्य माध्यम पर जाते हैं, और आप किसी व्यक्ति की बहुत सारी गोपनीय जानकारी हासिल कर लेते हैं. अगर इसे भी रिकॉर्ड पर लाया जाता है, तो यह निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है..."
राय ने जोर दिया कि दिशानिर्देश जारी किए जाने चाहिए ताकि यह नियमित अभ्यास न बन जाए.
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के वकील को एक हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया कि जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने के लिए X (पूर्व में ट्विटर) से जानकारी की आवश्यकता कैसे है और किस तरह की जानकारी की आवश्यकता है.
पीठ ने गाजियाबाद के पुलिस कमिश्नर को एक हलफनामा दायर कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज वर्तमान FIR या पहले से दर्ज किसी अन्य FIR की जांच के लिए X को किस तरह की जानकारी देनी होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, "हालांकि, ऐसी किसी भी जानकारी को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए. याचिकाकर्ता ने रोड रेज के मामले की जांच को पूरा करने के लिए पुलिस के साथ सहयोग करने की इच्छा जताई है."
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