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अब प्रयागराज में जातिगत भेदभाव का मामला गरमाया, हाई कोर्ट गंभीर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र ने लगाए थे आरोप

दलित छात्रों ने लगाए भेद भाव के आरोप, क्या है पूरा मामला? दरअसल यह मामला प्रयागराज के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले दो छात्रों की याचिका के बाद सामने आया। एक याची विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्…

Navbharat Times के अनुसार22 सितंबर 2026 को 06:04 am बजे
अब प्रयागराज में जातिगत भेदभाव का मामला गरमाया, हाई कोर्ट गंभीर, नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के छात्र ने लगाए थे आरोप

सौजन्य से:- Navbharat Times

दलित छात्रों ने लगाए भेद भाव के आरोप, क्या है पूरा मामला?

दरअसल यह मामला प्रयागराज के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले दो छात्रों की याचिका के बाद सामने आया। एक याची विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थी हैं, जबकि दूसरा एल.एल.बी. (ऑनर्स) पाठ्यक्रम के पांचवें सेमेस्टर का छात्र हैं। दोनों छात्र विश्वविद्यालय के छात्रावास में रहते हैं। आरोप लगाए गये है कि विधि विभाग के अध्यक्ष व हॉस्टल वार्डन ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर उनका जातिगत अपमान किया। साथ ही उन्हें शक है कि उनकी परीक्षाओं में उत्तर-पुस्तिकाओं का मूल्यांकन जाति के आधार पर अधिक सख्ती से किया गया है।हाई कोर्ट में सुनवाई फिर बनाई जांच समिति

- छात्रों की याचिका पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में जस्टिस विनोद दीवाकर की एकल पीठ ने सुनवाई की। याचिका में कहा गया था कि छात्र ने पहले कुलपति के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी, लेकिन बार-बार याद दिलाने के बावजूद डॉ. शर्मा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई।

- याचिका में वार्डन के बारे में कहा गया है कि उन्होंने कई मौकों पर छात्र की जाति और उसके द्वारा प्राप्त आरक्षण लाभों के बारे में टिप्पणियां कीं।

- सुनवाई में न्यायालय ने कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और आरोपी शिक्षाविद जो वार्डन भी हैं, उन्हें अपना पक्ष रखने और सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करने के बाद निष्पक्ष तरीके से इनकी जांच की जानी आवश्यक है।

- अदालत ने ऐसे आरोपों की जांच के लिए प्रयागराज की स्मॉल कॉज कोर्ट की जज अर्चना सिंह और चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट अरुण कुमार यादव को नियुक्त किया। मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को रखी गई है।

- हाईकोर्ट ने संबंधित व्यक्ति को जांच पूरी होने तक सभी प्रशासनिक जिम्मेदारियों से अलग रखने का आदेश दिया है। उन्हें याचिकाकर्ता छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में भूमिका नहीं देने का भी निर्देश है।

जांच समिति का फोकस और दायरा

अदालत के आदेश पर जांच कमिटी को यह जांच करनी है कि SC/ST छात्रों के साथ कथित जातिगत अपमान या भेदभाव हुआ या नहीं और विश्वविद्यालय ने शिकायतों पर लागू नियमों के अनुसार कार्रवाई की या नहीं। जांच समिति मामले में वार्डन का पक्ष भी सुनेगी और सबूत जुटाने की कोशिश करेगी। समिति को गवाही देने वाले छात्रों की पहचान सुरक्षित रखने के लिए भी आवश्यक कदम उठाने को कहा गया है। समिति के लिए एक डेडलाईन तय की गई है। उसे अपनी जांच रिपोर्ट 24 सितंबर की अगली सुनवाई से पहले सीलबंद लिफाफे में कोर्ट के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया है।संविधान और SC/ST कानून के तहत कानूनी पहलू क्या हैं?

- दरअसल, भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को जाति के आधार पर भेदभाव से रोकता है और SC/ST सहित पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है।

- संविधान का अनुच्छेद 14 समानता के सिद्धांत और अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता के उन्मूलन से संबंधित संवैधानिक सुरक्षा देते हैं।

- मामले में परिस्थितियों और आरोपों के विशिष्ट तथ्यों के आधार पर अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधान भी प्रासंगिक हो सकते हैं, लेकिन इस मामले में किसी विशेष आपराधिक धारा की लागू होने की अंतिम पुष्टि कोर्ट के आदेश में नहीं की गई है।

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