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यूपी की जातिगत राजनीति में कहां खड़ी है BJP? कोर वोटर सवर्णों सहित इन 3 मुद्दों से निपटने की चुनौती

यूपी चुनाव से पहले जातिगत राजनीति में बीजेपी कहां खड़ी है, यह अब एक बड़ा सवाल बना हुआ है। इसके साथ ही यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या बीजेपी को अब यूपी में अपने कोर वोटरों की चिंता सता रही है। लखनऊः हाल ही में डिप्टी सीएम…

Navbharat Times के अनुसार27 अगस्त 2026 को 06:27 am बजे
यूपी की जातिगत राजनीति में कहां खड़ी है BJP? कोर वोटर सवर्णों सहित इन 3 मुद्दों से निपटने की चुनौती

सौजन्य से:- Navbharat Times

यूपी चुनाव से पहले जातिगत राजनीति में बीजेपी कहां खड़ी है, यह अब एक बड़ा सवाल बना हुआ है। इसके साथ ही यह भी एक बड़ा सवाल है कि क्या बीजेपी को अब यूपी में अपने कोर वोटरों की चिंता सता रही है।

लखनऊः हाल ही में डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने आरक्षण विरोधी युवाओं के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मंच साझा किया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मनुस्मृति के मुद्दे पर राहुल गांधी को घेरा। ऐसे में सवाल ये उठ रहे हैं कि यूपी में चुनाव से पहले हो रही जातिगत राजनीति में बीजेपी कहां खड़ी है? क्या अब उसको अपने कोर वोटर सवर्णों की चिंता सता रही है? जातिगत संतुलन बनाने के लिए पार्टी की क्या रणनीति है?

आरक्षण, मनुस्मृति पर सियासत तेज

आरक्षण व्यवस्था के विरोध में शुरू हुई मुहिम को लेकर उत्तर प्रदेश में सियासत तेज हो गई है। हर्ष दुबे और अजीत भारती के नेतृत्व में प्रदर्शन हुआ। हर्ष दुबे ने कुछ साथियों के साथ उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसके बाद अजीत भारती समेत कुछ युवाओं ने आरोप लगाया कि यह प्रेस कॉन्फ्रेंस दबाव में कराई गई। वहीं, राहुल गांधी ने पुणे में मनुस्मृति की मानसिकता और पुरुष प्रधान सोच की आलोचना की थी। इस पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनकी आलोचना करते हुए कहा कि राहुल को पहले देश की परंपरा और विरासत को समझना चाहिए। आरक्षण मुद्दे पर एसपी, बीएसपी और कांग्रेस ने बीजेपी से स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

जातीय संतुलन की चुनौती

2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण के मुद्दे का विपक्ष को फायदा मिला। बीजेपी 33 और एनडीए 37 सीटों पर रहा, जबकि एसपी ने 37 और I.N.D.I.A. गठबंधन ने 43 सीटें जीतीं। इसके बाद बीजेपी ने दलित और ओबीसी वर्गों तक पहुंच बढ़ाने पर जोर दिया। संत रविदास यात्रा समेत कई कार्यक्रम किए गए और प्रदेश संगठन में ओबीसी प्रतिनिधित्व बढ़ाया गया।

यूजीसी एक्ट का सवर्णों ने किया विरोध

वहीं दूसरी ओर यूजीसी अधिनमय को लेकर सवर्ण और दलित-पिछड़े बेटे हुए नजर आए। इसको लेकर सवर्णों ने अपना विरोध दर्ज कराया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतरिम रोक लगा दी लेकिन बीजेपी का असमंजस ये है कि ऐसे मुद्दों पर वह किस तरफ रहे? वहीं शंकराचार्य और अलंकार रस्तोगी के इस्तीफे जैसे मुद्दों ने बीजेपी की मुसीबत और बढ़ा दी। बीजेपी पर ब्राहाणें के अपमान के आरोप भी लगातार विपक्ष लगाता रहा है। अब एक बार फिर आरक्षण विरोध और समर्थन को लेकर बीजेपी के सामने जातीय संतुलन बनाने की चुनौती है।

आखिर बीजेपी क्यों फिक्रमंद?

अनुमान के मुताबिक, यूपी में सवर्ण वोटर करीब 20 प्रतिशत है। इनमें लगभग 9-10 प्रतिशत ब्राह्मण, 7 प्रतिशत क्षत्रिय, 2 प्रतिशत वैश्य और 2 प्रतिशत कायस्थ, भूमिहार और अन्य है। प्रदेश की करीब 100 सीटों पर इनका काफी प्रभाव है और 40-50 सीटें ऐसी है, जहां ये सीधे हार-जीत तय करते हैं। यह भी माना जाता है कि अन्य जातियों को भी ये प्रभावित करने में सक्षम हैं। इनको लेकर बीजेपी की चिंता इसलिए ज्यादा है क्योंकि यह उसका कोर वोटर है और माना जाता है कि 70-80 प्रतिशत सवर्ण उसी को वोट करते हैं।

बीजेपी की ये है कोशिश

बीजेपी शीर्ष नेतृत्व और संघ में लगातार यह मंथन चल रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले जाति के पलड़ों में जा रही राजनीति का क्या समाधान निकाला जाए। ऐसे में बीजेपी नेतृत्व की कोशिश यह है कि ओबीसी और दलितों को भी साधा जाए और कोर सवर्ण वोटर भी उससे न छिटके। यही वजह है कि दलितो और ओबीसी को पूरा सम्मान देने के साथ ही वह सवर्णों के साथ भी खड़ी दिखना चाहती है। वही मनुस्मृति को विरासत से जोड़कर चुनाव को जातीय खांचे से निकालकर धार्मिक रूप देने की भी है।

लेखक के बारे मेंदीप सिंहपिछले 28 साल से पत्रकार। इस लखनऊ के प्रमुख अखबारों दैनिक जागरण, हिंदुस्तान और अमर उजाला में काम किया। वर्तमान में एनबीटी लखनऊ में 11 साल से कार्यरत। इस दौरान सिटी से लेकर स्टेट ब्यूरो तक सभी क्षेत्र में रिपोर्टिंग की। हिंदुस्तान और एनबीटी में सिटी हेड की जिम्मेदारी भी संभाली। अभी एनबीटी स्टेट ब्यूरो में कार्यरत।... और पढ़ें

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