यूपी में विशेष शिक्षक भर्ती की इस शर्त को हाई कोर्ट ने ठहराया सही, याचिका खारिज
यूपी में विशेष शिक्षक भर्ती की इस शर्त को हाई कोर्ट ने ठहराया सही, याचिका खारिज कोर्ट ने 6 सितंबर 2025 के शासनादेश का संज्ञान लिया, जिसके तहत प्राथमिक स्तर के लिए स्नातक और आरसीआई मान्यता प्राप्त डीएड और एक्टिव सीआरआर अन…

सौजन्य से:- Hindustan
यूपी में विशेष शिक्षक भर्ती की इस शर्त को हाई कोर्ट ने ठहराया सही, याचिका खारिज
कोर्ट ने 6 सितंबर 2025 के शासनादेश का संज्ञान लिया, जिसके तहत प्राथमिक स्तर के लिए स्नातक और आरसीआई मान्यता प्राप्त डीएड और एक्टिव सीआरआर अनिवार्य है। उच्च प्राथमिक के लिए स्नातक और बीएड और एक्टिव सीआरआर अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार टीईटी को वांछनीय योग्यता माना गया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद द्वारा विशेष शिक्षकों के 4900 पदों पर निकाली गई विशेष चयन प्रक्रिया के संबंध में कहा है कि विज्ञापन में केवल संविदा, दैनिक वेतन अथवा आउटसोर्सिंग पर वर्तमान में कार्यरत विशेष शिक्षकों को ही स्क्रीनिंग औेर चयन में शामिल करने की शर्त पूरी तरह से वैध, तर्कसंगत और संवैधानिक है। यह आदेश देते हुए न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के तहत तय की गई इस पात्रता शर्त को हाई कोर्ट अपनी ओर से शिथिल नहीं कर सकता। इसी के साथ कोर्ट ने वर्ष 2019 से सेवा से बाहर चल रहे पूर्व संविदा शिक्षकों की याचिका को खारिज कर दिया।
याचिका में कहा गया था कि याची महाराजगंज जिले में समेकित शिक्षा योजना के तहत 2005, 2006, 2010 और 2011 से इटिनरेंट/रिसोर्स टीचर (विशेष शिक्षक) के रूप में कार्यरत थे। मई 2019 तक कार्य करने के बाद जुलाई 2019 में विभाग ने जिले के 12 शिक्षकों का नवीनीकरण किया लेकिन याचियों सहित अन्य का नवीनीकरण नहीं किया गया। नवीनीकरण न होने के विरुद्ध दाखिल उनकी याचिका को हाईकोर्ट पुष्पा श्रीवास्तव केस के आधार पर खारिज कर चुका था (जिसके खिलाफ स्पेशल अपील विचाराधीन है)। स्पेशल अपील बेंच के निर्देश पर याचियों ने नियमित नियुक्ति के लिए प्रत्यावेदन दिया था, जिसे बेसिक शिक्षा अधिकारी महाराजगंज ने 15 जून को खारिज कर दिया था। इसे भी याचिका में चुनौती दी गई थी।
बेसिक शिक्षा परिषद के 13 जून 2026 के विज्ञापन के सामान्य निर्देश संख्या 2 के तहत अभ्यर्थियों के लिए संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग एजेंसी के माध्यम से कार्यरत होने संबंधी सक्षम प्राधिकारी का अनुबंध पत्र/आदेश संलग्न करना अनिवार्य किया गया था। याचियों की दलील थी कि वे स्नातक हैं, उनके पास डीएड/बीएड (विशेष शिक्षा) डिग्री है, और उनका भारतीय पुनर्वास परिषद का सेंट्रल रिहैबिलिटेशन रजिस्टर 2028/2033 तक वैध रूप से नवीनीकृत है इसलिए सिर्फ वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर उन्हें बाहर करना अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
कोर्ट ने आदेश में कहा कि यह चयन प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रजनीश कुमार पांडे बनाम भारत संघ में हुए निर्देशों के तहत हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि लगभग 4900 रिक्त पदों के लिए विज्ञापन निकाल कर उन शिक्षकों के आवेदनों पर विचार किया जाए, जो संविदा या आउटसोर्सिंग पर काम कर रहे हैं। कोर्ट ने 6 सितंबर 2025 के शासनादेश का संज्ञान लिया, जिसके तहत प्राथमिक स्तर (कक्षा 1 से 5) के लिए स्नातक और आरसीआई मान्यता प्राप्त डीएड (विशेष शिक्षा) और एक्टिव सीआरआर अनिवार्य है। उच्च प्राथमिक (कक्षा 6 से 8) के लिए स्नातक और बीएड (विशेष शिक्षा) और एक्टिव सीआरआर अनिवार्य है।
टीईटी वांछनीय योग्यता
अधिकतम आयु सीमा 60 वर्ष निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार टीईटी को वांछनीय योग्यता माना गया है। गैर-टीईटी पास संविदा शिक्षकों के लिए विभाग द्वारा विशेष शिक्षक पात्रता परीक्षा आयोजित कर उत्तीर्ण होने पर नियुक्ति का प्रावधान किया गया है। कार्यरत संविदा शिक्षकों की नियुक्ति के बाद ही अवशेष बचे पदों पर सामान्य सीधी भर्ती की जाएगी। हाईकोर्ट ने कहा कि सामान्य न्यायिक समीक्षा के तहत कोर्ट विज्ञापन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश में प्रयुक्त वर्तमान में कार्यरत शब्द को बदलकर अतीत में काम कर चुके नहीं कर सकता। कोर्ट ने डॉ एमवी नायर केस का हवाला देते हुए कहा कि पात्रता चयन प्रक्रिया में प्रवेश की दहलीज है, जबकि पिछला अनुभव या उपयुक्तता केवल पात्रता पूरी होने के बाद देखी जाती है। आरसीआई पंजीकरण होना एक शर्त पूरी करता है लेकिन वह वर्तमान में कार्यरत होने की अनिवार्य शर्त का विकल्प नहीं बन सकता। अनवर अली सरकार और राम कृष्ण डालमिया केस का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा कि कार्यरत संविदा शिक्षकों का विशिष्ट वर्ग बनाकर पहले उनकी स्क्रीनिंग करना पूरी तरह तार्किक है और इसका सीधा संबंध दिव्यांग बच्चों को निरंतर दक्ष शिक्षक उपलब्ध कराने के उद्देश्य से है।
संविदा पर काम नियमित नियुक्ति का अधिकार नहीं देता
कोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश (जिसके तहत याचियों को सशर्त स्क्रीनिंग में बैठने दिया गया था और परिणाम सीलबंद रखने को कहा गया था) पर एस कृष्णा चैतन्य और अभिमन्यु राम केस का हवाला देते हुए कहा कि अंतरिम राहत के आधार पर परीक्षा देने से अंतिम रूप से कोई कानूनी या स्थायी अधिकार पैदा नहीं होता। साथ ही याचियों द्वारा अपने प्रत्यावेदन को खुद दया याचिका बताना यह दर्शाता है कि वे अधिकार नहीं बल्कि रियायत मांग रहे हैं। उमा देवी केस के अनुसार संविदा पर किया गया पिछला कार्य नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन की शर्त संख्या 2 में कोई विधिक या संवैधानिक खामी नहीं है, क्योंकि यह सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुरूप है। याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने साफ किया कि याची चयन प्रक्रिया के बाहर ही रहेंगे।
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