युवाओं का सुनहरा भविष्य गढ़ती योगी सरकार, 9.5 लाख भर्तियों और ODOP से यूपी का युवा सशक्तिकरण - yogi govt 9 lakh 5 thousand jobs and odop empower up youth
युवाओं का सुनहरा भविष्य गढ़ती योगी सरकार, 9.5 लाख भर्तियों और ODOP से यूपी का युवा सशक्तिकरण योगी सरकार ने युवाओं के क्षमतावर्धन और अवसर सृजित करने पर जोर दिया है, जिससे 9.5 लाख सरकारी नियुक्तियां और ओडीओपी योजना के माध्…

सौजन्य से:- Jagran
युवाओं का सुनहरा भविष्य गढ़ती योगी सरकार, 9.5 लाख भर्तियों और ODOP से यूपी का युवा सशक्तिकरण
योगी सरकार ने युवाओं के क्षमतावर्धन और अवसर सृजित करने पर जोर दिया है, जिससे 9.5 लाख सरकारी नियुक्तियां और ओडीओपी योजना के माध्यम से लाखों रोजगार मिले हैं।
HighLights
- साढ़े नौ लाख सरकारी नियुक्तियां, ओडीओपी से लाखों रोजगार।
- भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता, योग्यता को सर्वोच्च प्राथमिकता।
- युवाओं के कौशल विकास, खेल व तकनीकी सशक्तिकरण पर बल।
डिजिटल डेस्क, लखनऊ। किसी भी राज्य की वास्तविक संपदा उसकी युवा पीढ़ी की रचनात्मक ऊर्जा और संकल्प शक्ति होती है, इसलिए सरकार का पहला दायित्व यही होना चाहिए कि युवाओं की अपार ऊर्जा को दिशाहीनता और उपेक्षा के भंवर से निकालकर सृजन, सुरक्षा और स्वावलंबन के मार्ग पर अग्रसर किया जाए।
शासन की नैतिक और प्रशासनिक कसौटी का आकलन भी इसी आधार पर किया जाना चाहिए कि वह अपनी युवा-शक्ति को किस दिशा में मोड़ती है।
योगी सरकार ने पिछले साढ़े नौ वर्षों में युवाओं के क्षमतावर्धन, कौशल-विकास और उनके लिए अवसर सृजित करने की दिशा में जो निरंतर सक्रियता बरती, उसके पीछे यही मूल उद्देश्य है कि युवाओं को लाभार्थी नहीं, बल्कि राज्य का अग्रदूत बनने की दिशा में उन्मुख किया जाए। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यही सोच उत्तर प्रदेश में युवाओं का सुनहरा भविष्य लिख रही है।
युवाओं के प्रति योगी सरकार का दायित्व-बोध एक सुविचारित नीति-दृष्टि का परिणाम है और इसीलिए इसका मूल्यांकन भी तथ्यों की गंभीरता से होना चाहिए। नीतिगत रूप से योगी सरकार का सबसे गहरा प्रभाव भर्ती प्रणाली में आई शुचिता के रूप में देखा जा सकता है।
एक समय था जब राज्य में लोक सेवाओं की नियुक्तियां भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और 'पर्ची-खर्ची' के कुत्सित दौर से गुजर रही थीं। यह अपनी प्रतिभा और पसीने के बल पर आगे बढ़ने का स्वप्न देखने वाले लाखों युवाओं के आत्मसम्मान पर तीखा प्रहार था।
जब योग्यता के स्थान पर सिफारिशें और अनुचित साधन हावी होते हैं, तब युवाओं के भीतर व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास घर कर जाता है। वर्तमान व्यवस्था ने इस कुचक्र को तोड़ते हुए योग्यता और पारदर्शी निष्पक्षता को ही चयन की एकमात्र कसौटी बनाया।
साढ़े नौ वर्षों में लगभग 9.50 लाख युवाओं को सरकारी नियुक्तियां मिलना इस बात का प्रमाण है कि रोजगार अब सरकार की प्राथमिकता और नीति का विषय है।
पुलिस बल में 2.25 लाख से अधिक नियुक्तियां प्रदेश की सुरक्षा-संरचना को युवा हाथों में सौंपने का सुविचारित निर्णय हैं, तो शिक्षा विभाग में डेढ़ लाख से अधिक शिक्षकों-सहायक शिक्षकों की भर्ती यह दर्शाती है कि ज्ञान के प्रसार को संस्थागत गंभीरता के साथ लिया गया है।
स्वास्थ्य विभाग में स्टाफ नर्स, एएनएम, लैब टेक्नीशियन, फार्मासिस्ट, नर्सिंग ऑफिसर, डेंटल हाइजीनिस्ट और जूनियर एनालिस्ट जैसे हजारों पदों पर हुई नियुक्तियां इस तथ्य की पुष्टि करती हैं कि स्वास्थ्य-सुरक्षा को लेकर सरकार संवेदनशीलता से सोचती है।
प्रशासनिक तंत्र के भीतर भी योगी सरकार की दृष्टि पूरी तरह स्पष्ट है। उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से पीसीएस, मेडिकल ऑफिसर, सहायक अभियंता, प्रवक्ता और अन्य प्रशासनिक-तकनीकी सेवाओं में 48 हजार से अधिक नियुक्तियां यह संकेत देती हैं कि शासन-तंत्र को नई मेधा से ऊर्जावान करने का सचेत प्रयास हुआ है।
उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी, जूनियर असिस्टेंट, फॉरेस्ट गार्ड और एक्स-रे टेक्नीशियन जैसे पदों पर लगभग 46 हजार से अधिक चयन यह प्रमाणित करते हैं कि यह प्रक्रिया राजधानी तक सीमित न रहकर हर जिले, हर तहसील तक पहुंची है।
परीक्षा कैलेंडर की नियमितता, ऑनलाइन आवेदन की सुविधा, उत्तर कुंजी पर आपत्ति दर्ज कराने का अधिकार और मेरिट सूची की सार्वजनिकता, ये सब मिलकर उस भरोसे की बुनियाद रचते हैं जिसकी कमी वर्षों तक युवाओं को पीड़ा देती रही। जब भर्ती-व्यवस्था पर्ची और खर्ची से मुक्त होकर मेधा और पारदर्शिता की कसौटी पर टिकती है, तभी वह वास्तव में शासन की नैतिक परीक्षा में उत्तीर्ण होती है।
योगी सरकार की नीतिगत निरंतरता का विस्तार अभी हाल में जन्माष्टमी से पहले लिए गए पांच निर्णयों में देखा जा सकता है। वर्तमान दौर में ज्ञान की गतिशीलता तकनीक पर निर्भर है। 25 लाख टैबलेट खरीदने की स्वीकृति यह स्पष्ट करती है कि तकनीक को युवा सशक्तीकरण के अस्त्र के रूप में देखा गया है और यह वर्तमान की जरूरत भी है।
3.16 लाख छात्रों की शुल्क भरपाई का मार्ग प्रशस्त होना यह सिद्ध करता है कि आर्थिक विवशता अब किसी प्रतिभा के मार्ग की स्थायी बाधा नहीं बनेगी। मेडिकल इंटर्न का भत्ता 12 हजार से बढ़ाकर 25 हजार रुपये किया जाना भविष्य के चिकित्सकों के परिश्रम के प्रति सम्मान का सूचक है।
एडीओ पंचायत के 50 प्रतिशत पदों पर सीधी भर्ती ग्रामीण प्रशासन में नई प्रतिभा के प्रवेश का द्वार खोलती है, और साढ़े तीन लाख आउटसोर्स कर्मियों को 20 से 40 हजार रुपये मानदेय के साथ सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना यह दर्शाता है कि सरकार की दृष्टि उस विशाल कार्यबल तक भी पहुंचती है जो प्रायः नीतियों की परिधि से बाहर छूट जाता है।
बौद्धिक और तकनीकी विकास के साथ-साथ किसी भी समाज का शारीरिक और मानसिक पौरुष उसके खेल मैदानों में ढलता है। प्राचीन भारतीय मनीषा ने सदैव माना है कि स्वस्थ शरीर ही समस्त धर्मों और लक्ष्यों की सिद्धि का प्रथम साधन है।
उत्तर प्रदेश ने खेल को केवल एक अतिरिक्त गतिविधि के दायरे से बाहर निकालकर उसे करियर, प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय गौरव के केंद्रीय ढांचे में स्थापित किया है।
सभी जिलों में खेलो इंडिया सेंटर की स्थापना गांव की छिपी प्रतिभाओं को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाने की सकारात्मक पहल है। 44 आवासीय क्रीड़ा छात्रावासों में निशुल्क प्रशिक्षण, 534 से अधिक खिलाड़ियों को सरकारी नियुक्ति, पांच स्पोर्ट्स कॉलेजों में 14 खेलों का प्रशिक्षण और ‘एक मंडल-एक स्पोर्ट्स कॉलेज’ का लक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि खेल अब आकस्मिक शौक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक करियर-नीति का विषय है।
सरकारी और संस्थागत प्रयासों से आगे बढ़कर अर्थव्यवस्था के वास्तविक इंजन के रूप में युवाओं को स्वावलंबी बनाना सबसे स्थायी समाधान होता है। उत्तर प्रदेश ने अपनी सदियों पुरानी पारंपरिक कारीगरी और क्षेत्रीय शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने का जो साहसिक प्रयोग 'एक जनपद-एक उत्पाद' (ओडीओपी) के माध्यम से किया, उसने रोजगार के नए क्षितिज खोले। ओडीओपी योजना को एमएसएमई से जोड़ने का जो सूत्र अपनाया गया, उसने प्रदेश की आर्थिक संरचना को पुनर्परिभाषित किया।
आज 96 लाख से अधिक एमएसएमई इकाइयों में 3 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त है, जिसमें सबसे बड़ी संख्या युवाओं की है। यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने युवा-शक्ति को केवल नौकरी-प्रार्थी के रूप में नहीं, बल्कि उद्यमी और सृजनकर्ता के रूप में भी देखा।
इस पूरे विमर्श को यदि वैचारिक गंभीरता के साथ देखा जाए, तो यह उस राष्ट्रवादी चिंतन-परंपरा से जुड़ता है जिसमें राष्ट्र की शक्ति को उसकी युवा-शक्ति का ही प्रतिबिंब माना गया है। वीर सावरकर का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि किसी राष्ट्र की सीमाएं नदियों और पर्वतों से नहीं, बल्कि उसके नवयुवकों के शौर्य और पराक्रम से निर्धारित होती हैं।
इस दृष्टि से देखें तो भर्ती-नीतियां, स्वरोजगार की योजनाएं और खेल-अवसंरचना राष्ट्र की भावी सीमाओं और सामर्थ्य को गढ़ने वाले उपक्रम हैं। जो शासन युवाओं की ऊर्जा को दिशाहीनता से निकालकर सृजन के मार्ग पर लगाता है, वह वस्तुतः राष्ट्र के भविष्य की नींव रख रहा होता है।
किसी भी बड़े परिवर्तन के साथ आलोचना और चुनौतियां स्वाभाविक रूप से जुड़ी रहती हैं, और लोकतंत्र में यह स्वस्थ बहस का अनिवार्य अंग भी है। परंतु आंकड़ों की यह सतत शृंखला, नीतियों की यह निरंतरता और भर्ती-प्रक्रिया में लौटी पारदर्शिता इस बात की गवाही देती है कि उत्तर प्रदेश ने एक गंभीर और दूरदर्शी दिशा पकड़ी है।
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