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एससी-एसटी एक्ट में एक ही परिवार को 23 लाख, हाईकोर्ट को गड़बड़ी की आशंका, पूरे यूपी में जांच का आदेश

एससी-एसटी एक्ट में एक ही परिवार को 23 लाख, हाईकोर्ट को गड़बड़ी की आशंका, पूरे यूपी में जांच का आदेश एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। इस एक्ट के तहत बार-बार दावा करने वालों की पूरे यूपी में जा…

Hindustan के अनुसार12 सितंबर 2026 को 01:04 am बजे
एससी-एसटी एक्ट में एक ही परिवार को 23 लाख, हाईकोर्ट को गड़बड़ी की आशंका, पूरे यूपी में जांच का आदेश

सौजन्य से:- Hindustan

एससी-एसटी एक्ट में एक ही परिवार को 23 लाख, हाईकोर्ट को गड़बड़ी की आशंका, पूरे यूपी में जांच का आदेश

एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। इस एक्ट के तहत बार-बार दावा करने वालों की पूरे यूपी में जांच का आदेश दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 यानी एससी-एसटी एक्ट के तहत पीड़ितों को दी जाने वाली आर्थिक राहत राशि से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए न सिर्फ पीड़ितों के अधिकारों की पुष्टि की, बल्कि इस बहुचर्चित योजना के संभावित दुरुपयोग को लेकर पूरे उत्तर प्रदेश में जांच के आदेश भी दिए हैं। झांसी के अरविंद कुमार व दो अन्य और संतोष कुमार धोहरे की आपराधिक अपीलों की सुनवाई करते हुए दिया है। दोनों मामले झांसी की विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट, अत्याचार निवारण) अदालत के 23 जुलाई 2024 के फैसले के खिलाफ दाखिल किए गए थे। दरअसल कोर्ट की संज्ञान में आया की एक परिवार को 23 लाख से अधिक का मुआवजा दिया गया है।

समाज कल्याण अधिकारी पर मनमानी का आरोप

पहला मामला थाना कोतवाली में आईपीसी की धारा 170, 323, 504, 506, एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r), 3(1)(s), 3(2)(va) और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत दर्ज है। दूसरा मामला थाना सिपरी बाजार में दर्ज केस से संबंधित है। अपीलकर्ताओं का कहना था कि विवेचक द्वारा प्रत्येक पीड़ित को 2 लाख रुपये की राहत राशि का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसके तहत चार्जशीट दाखिल होने तक 75 प्रतिशत यानी 1,50,000 रुपये मिलने चाहिए थे। लेकिन जिला समाज कल्याण अधिकारी, झांसी ने मनमाने ढंग से केवल 37.5 प्रतिशत यानी 75,000 रुपये ही जारी किए। बार-बार प्रत्यावेदन देने के बावजूद बकाया राशि नहीं दी गई, जिसके बाद अपीलकर्ताओं ने नियम 12(4) और 12(7) के तहत विशेष न्यायाधीश की अदालत में आवेदन दिया, जिसे निचली अदालत ने खारिज कर दिया था।

निचली अदालत ने व्याख्या में गलती की

न्यायमूर्ति संतोष राय की एकल पीठ ने पाया कि निचली अदालत ने नियम 12(7) की व्याख्या में गलती की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह नियम विशेष न्यायालय को केवल औपचारिकता निभाने वाला निकाय नहीं बनाता, बल्कि उसे यह अधिकार भी देता है कि वह जांच करे कि पीड़ित को समय पर पर्याप्त राहत मिली या नहीं, और यदि नहीं मिली तो बकाया राशि के भुगतान का आदेश दे। कोर्ट ने कहा कि निचली अदालत का यह मानना गलत था कि उसे अपराध की प्रकृति तय करने या राशि बढ़ाने का अधिकार नहीं है । यह व्याख्या नियम के मूल उद्देश्य के विपरीत है।

23 लाख राहत राशि को अनदेखा नहीं किया जा सकता

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह जानकारी दी गई कि अपीलकर्ता संतोष कुमार धोहरे जो स्वयं अधिवक्ता हैं और उनके परिवार के सदस्यों को अब तक विभिन्न आपराधिक मामलों में कुल 23,36,250 रुपये की राहत राशि मिल चुकी है, और लगभग 10 से 12 और मामले जिला स्तरीय समिति के समक्ष लंबित हैं। इन तथ्यों को अपीलकर्ताओं की ओर से नकारा नहीं गया। इस पर कोर्ट ने कहा कि बार-बार मामले दर्ज कराना अपने आप में दुरुपयोग साबित नहीं करता, लेकिन इतनी बड़ी संख्या और राशि को अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इसे "जांच योग्य" पैटर्न बताया।

डीएम-एसएसपी को तीन महीने में जांच का आदेश

हाईकोर्ट ने आदेश पारित किया कि झांसी के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ मिलकर संतोष कुमार धोहरे और उनके परिवार द्वारा दर्ज कराए गए मामलों और प्राप्त राहत राशि की तीन महीने में निष्पक्ष जांच पूरी करेंगे। यदि जांच में योजना के दुरुपयोग की पुष्टि होती है, तो दोषी व्यक्तियों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी।

बार-बार दावा करने वालों की पूरे यूपी में जांच

कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट और नियमावली 1995 के तहत बार-बार दावा करने वालों के मामलों की प्रदेश व्यापी व्यापक जांच कर एक प्रभावी नियामक तंत्र और निगरानी व्यवस्था विकसित करने का निर्देश दिया गया। हर जिले के विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) को सतर्क रहने को कहा गया है कि यह योजना वास्तविक पीड़ितों तक ही सीमित रहे, हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि किसी वास्तविक दावे को पूर्वाग्रह से देखा जाए।

दोनों मामलों में झांसी की विशेष अदालत को छह सप्ताह के भीतर आवेदनों पर नए सिरे से निर्णय लेने का आदेश दिया गया, यह तय करते हुए कि पीड़ितों को 1 लाख या 2 लाख रुपये की राहत राशि में से कौन सी दर लागू होगी। यह स्पष्ट किया गया कि यह आदेश धोहरे या पीड़ितों के दावों के गुण-दोष पर कोई राय नहीं है, और जांच स्वतंत्र रूप से अपने आधार पर चलेगी।

एससी-एसटी एक्ट एक कल्याणकारी प्रावधान

कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि एससी/एसटी एक्ट के तहत राहत योजना अत्याचार के वास्तविक पीड़ितों के पुनर्वास के लिए एक कल्याणकारी प्रावधान है, और इसकी पवित्रता बनाए रखना जरूरी है। कोर्ट ने कहा कि बार-बार आपराधिक मामले दर्ज कराकर सरकारी खजाने से धन प्राप्त करने के लिए इस योजना का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

रजिस्ट्रार जनरल को आदेश दिया गया कि इस फैसले की प्रति दस दिनों के भीतर प्रदेश के सभी जिलों के जिला एवं सत्र न्यायाधीश, जिलाधिकारी, एसएसपी/एसपी, पुलिस आयुक्त, विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट), मुख्य सचिव, गृह विभाग के प्रमुख सचिव और विधि/न्याय विभाग के प्रमुख सचिव को भेजी जाए। अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ब्रज मोहन सिंह और राज्य की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता राजेश कुमार शुक्ल तथा शिखर टंडन पेश हुए।

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