होमक्राइमयूपी चुनाव 2027 में 'जेन-Z' वोटर पर रुख क्या है? दलों की ओर से चल रही तैयारियों को समझिए, क्या बदलेंगे समीकरण
क्राइम

यूपी चुनाव 2027 में 'जेन-Z' वोटर पर रुख क्या है? दलों की ओर से चल रही तैयारियों को समझिए, क्या बदलेंगे समीकरण

क्यों अहम हुआ वोट बैंक? 'जेन-Z' वोट बैंक को यूपी चुनाव के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। दरअसल, प्रदेश में 'जेन-Z' वोटर्स की संख्या कुल वोटरों का करीब 15 फीसदी है। यह वोट बैंक कभी भी स्थायी तौर पर एकजुट होकर वोट करता…

Navbharat Times के अनुसार10 अगस्त 2026 को 05:18 pm बजे
यूपी चुनाव 2027 में 'जेन-Z' वोटर पर रुख क्या है? दलों की ओर से चल रही तैयारियों को समझिए, क्या बदलेंगे समीकरण

सौजन्य से:- Navbharat Times

क्यों अहम हुआ वोट बैंक?

'जेन-Z' वोट बैंक को यूपी चुनाव के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। दरअसल, प्रदेश में 'जेन-Z' वोटर्स की संख्या कुल वोटरों का करीब 15 फीसदी है। यह वोट बैंक कभी भी स्थायी तौर पर एकजुट होकर वोट करता नहीं दिखा है। इस वर्ग पर अपने परिवार के राजनीतिक पार्टियों के प्रति झुकाव की तरफ ही रुझान दिखता रहा है। ऐसे में युवा वोटर्स कभी वो ताकत नहीं बन पाए, जो जातीय पॉकेट्स वाले वोट बैंक प्रदेश की राजनीति में अपना रसूख रखते हैं।

युवाओं ने जिस प्रकार से अपनी सोच बदली है। पेपर लीक, शिक्षा, बेरोजगारी जैसे मुद्दों को उठाया जा रहा है, वह स्थिति में एक बड़े बदलाव की तरफ संकेत दे रहा है। हालांकि, उत्तर प्रदेश में ये मुद्दे कितने प्रभावी होंगे, यह देखने वाली होगी। लेकिन, 'जेन-Z' वोट बैंक अगर एकजुट होकर 5-7 फीसदी भी किसी एक पार्टी की तरफ झुक गया तो फिर चुनावी परिणाम में बड़ा अंतर साफ तौर पर देखने को मिल जाएगा।

किस दल की क्या है तैयारी?

समाजवादी पार्टी: सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जंतर मंतर पर छात्र आंदोलन के समय से ही 'जेन-Z' के मु्द्दों को अपना समर्थन देते दिखे हैं। दिल्ली छात्र आंदोलन पर पार्टी का रुख आक्रामक रहा। सांसद डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, प्रिया सरोज से लेकर विधायक रागिनी सोनकर तक आंदोलन के मंच पर दिखीं। इसके जरिए युवाओं को संदेश दिया कि पेपर लीक जैसी समस्या के खिलाफ पार्टी युवा वर्ग के साथ है।

हालांकि, रांची में चल रहे झारखंड के छात्र आंदोलन के बीच सपा नेताओं के बयान उस तरह से सामने नहीं आए। रांची में पिछले पांच सालों में जेपीएससपी, जेएसएससी और अन्य भर्ती परीक्षाओं की धांधली का मुद्दा गरमाया हुआ है। इन मुद्दों पर केवल सांसद पुष्पेंद्र सरोज ही मुखर दिखे। ऐसे में सपा पर युवाओं के बीच भी भेदभाव जैसे आरोप लग रहे हैं।

कांग्रेस: कांग्रेस की ओर से भी 'जेन-Z' वोटर्स को आकर्षित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी देहरादून और प्रयागराज में 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम के जरिए वोट बैंक को साधने का प्रयास करते दिखे हैं। लेकिन, कर्नाटक और झारखंड में कांग्रेस के सरकार में होने के बाद भी उनकी ओर से छात्र आंदोलन के मुद्दे पर कोई बयान नहीं आया।

झारखंड के छात्रों ने सोमवार को विधानसभा मार्च किया। इस दौरान दिल्ली के आंदोलन की तरह ही यहां भी छात्रों पर जमकर पुलिस ने लाठियां बजाई। ऐसे में 'जेन-Z' वोटर इस मसले पर भी सवाल करता दिख रहा है। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के इस आंदोलन तक न पहुंच पाने की खूब चर्चा है।

बहुजन समाज पार्टी: बहुजन समाज पार्टी सुप्रीमो मायावती ने छात्रों के मुद्दे पर सरकार को आवश्यक कार्रवाई की बात कही। उन्होंने समय-समय पर छात्रों के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। साथ ही, युवा वर्ग को साधने के लिए यूपी के चुनावी मैदान में भतीजे आकाश आनंद को उतार कर 'जेन-Z' वर्ग को आकर्षित करने की रणनीति अपनाई है। आकाश आनंद भी प्रदेश की राजनीति में 'यूपी के लड़के' कहलाने वाले राहुल गांधी और अखिलेश यादव को अंकल कहकर इस वर्ग में अलग हलचल पैदा की है।

आजाद समाज पार्टी: आजाद समाज पार्टी खुद को बहुजन और युवाओं की पार्टी बताती है। चंद्रशेखर आजाद भी छात्र राजनीति के जरिए ही मुख्य धारा की राजनीति में आए हैं। उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई है। पिछले दिनों दिल्ली में हुए छात्र आंदोलन के दौरान वे भी धरने पर बैठे रहे थे। इसकी तस्वीरों ने उन्हें सुर्खियों में लाया। हालांकि, झारखंड छात्र आंदोलन पर अब तक उनकी ओर से कोई बड़ा स्टेटमेंट नहीं आया है। इस पर भी सवाल उठ रहे हैं।

भारतीय जनता पार्टी: भाजपा सत्ताधारी पार्टी है। उत्तर प्रदेश में सीएम योगी आदित्यनाथ लगातार युवाओं की बात करते रहे हैं। केंद्र सरकार की ओर से एंटी पेपर लीक कानून से पहले यूपी सरकार ने सिपाही भर्ती परीक्ष पेपर लीक के बाद कड़े एक्शन के जरिए लीक गैंग को सीधे निशाने पर लिया था। लोकसभा चुनाव से पहले सिपाही भर्ती परीक्षा के पेपर लीक का मुद्दा खासा गरमाया था। इसके बाद योगी सरकार ने दोबारा सफलतापूर्वक परीक्षा आयोजित भर्ती प्रक्रिया को पूरा कराया।

योगी सरकार ने हाल के समय में हुई भर्ती और प्रतियोगी परीक्षाओं को बिना लीक संपन्न कराने में सफलता हासिल की है। साथ ही, सरकार के स्तर पर हुई भर्तियों में गड़बड़ी या भ्रष्टाचार के आरोप अब तक नहीं लगे हैं। हालांकि, बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर विपक्ष सरकार को घेरता रहा है। ऐसे में योगी सरकार इससे निपटने की रणनीति तैयार करती दिख रही है।

'जेन-Z' वोटर्स पर नजर

दरअसल, यूपी चुनाव में बहुत कम वोटों के अंतर से सरकार बनती और बिगड़ती रही हैं। राजनीतिक पार्टियां ऐसे में अब एक ऐसे वोट बैंक पर निशाना साध रही हैं जो एक दशक पहले तकअलग चुनावी ताकत के तौर पर मौजूद नहीं था। यूपी चुनाव में करीब छह माह का समय बचा हुआ है। इस प्रकार की स्थिति में भाजपा, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और आजाद समाज पार्टी इस वर्ग को साधने में जुट गई है। दरअसल, प्रदेश का चुनावी इतिहास 'जेन-Z' वोटों की अहमियत को साफ करता है।

यूपी चुनाव 2012 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच सीधा मुकाबला हुआ था। सपा को 29.15 फीसदी वोट मिले थे और बसपा के पाले में 25.91 फीसदी वोट आए। मतलब, दोनों पार्टियों के महज 3.24 फीसदी वोटों का अंतर था। इसके बाद भी सीटों के मामले में यह अंतर बहुत बड़ा था। सपा ने 224 सीटें जीतीं और बसपा 80 सीटों पर सिमट गई। भाजपा को लगभग 15 प्रतिशत वोट मिले और उसने 47 सीटें जीतीं।

यूपी 2022 की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। हालांकि, वोटों का अंतर ज़्यादा था। भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 43.82 प्रतिशत वोट मिले और उसने 273 सीटें जीतीं। वहीं, सपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को 36.60 प्रतिशत वोट मिले और उसने 125 सीटें जीतीं। वोट शेयर में 7.22 प्रतिशत अंकों के अंतर का नतीजा 148 सीटों की बढ़त के तौर पर सामने आया। ऐसे में 'जेन-Z' वोटर अगर किसी एक दल के पक्ष में एकजुट हुआ तो दूसरे का खेल पूरी तरह से बिगड़ सकता है।

Powered by CM Sarkar Geeta Reporter

संबंधित ख़बरें