हर समीकरण की सीमा लांघने वाला यूपी का यक्ष प्रश्न: जातिगत गणित, क्षेत्रीय गोलबंदी और चुनावी वादों से आगे निकली राजनीति; 2027 में योगी की छवि का विकल्प विपक्ष कैसे देगा?
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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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हर समीकरण की सीमा लांघने वाला यूपी का यक्ष प्रश्न:जातिगत गणित, क्षेत्रीय गोलबंदी और चुनावी वादों से आगे निकली राजनीति; 2027 में योगी की छवि का विकल्प विपक्ष कैसे देगा?
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उत्तर प्रदेश की राजनीति में चुनावी जीत का गणित लंबे समय से जातीय समीकरण, सामाजिक गोलबंदी, क्षेत्रीय प्रभाव और चुनावी घोषणाओं के आसपास घूमता रहा है। रैलियों की भीड़ से लेकर चुनावी नारों और राजनीतिक विश्लेषणों तक हर चीज को अपने-अपने आंकड़ों में तौला जाता है। लेकिन कुछ राजनीतिक छवियां ऐसी होती हैं, जिन्हें सिर्फ चुनावी अंकगणित से समझना आसान नहीं होता। उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की तस्वीर जब आकार लेगी, तब एक सवाल भी सामने रहेगा- आखिर वह क्या है, जो योगी आदित्यनाथ को दूसरे नेताओं से अलग करता है? नितिन श्रीवास्तव के मुताबिक, इसका जवाब सिर्फ किसी एक जातीय समीकरण या चुनावी रणनीति में नहीं, बल्कि योगी की राजनीतिक छवि, शासन शैली और सांस्कृतिक पहचान के मेल में तलाशना होगा।
जातीय समीकरणों से अलग पहचान बनाने का दावा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण हमेशा महत्वपूर्ण रहे हैं। राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने के लिए जातियों और उपजातियों के बीच गठजोड़ बनाते रहे हैं। नितिन श्रीवास्तव का मानना है कि योगी आदित्यनाथ की संन्यासी और गोरक्षपीठाधीश्वर की पहचान इस पारंपरिक राजनीति से अलग एक व्यापक सांस्कृतिक छवि बनाती है। उनके अनुसार, पारिवारिक राजनीति और निजी हितों से दूरी की यह छवि योगी को जातिगत पहचान से ऊपर स्थापित करने में मदद करती है। यही वजह है कि नितिन श्रीवास्तव के आकलन में योगी की राजनीति को केवल जातिगत वोटों के जोड़-घटाव से समझना अधूरा होगा।
'जीरो टॉलरेंस' और बुलडोजर नीति बनी राजनीतिक पहचान
योगी सरकार की कानून-व्यवस्था की नीति भी उनकी राजनीतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। 'जीरो टॉलरेंस' और 'बुलडोजर कार्रवाई' जैसे शब्द उत्तर प्रदेश की राजनीति में शासन की एक खास शैली के प्रतीक बन गए हैं। नितिन श्रीवास्तव के मुताबिक, लंबे समय तक अपराध और कानून-व्यवस्था को लेकर चर्चा में रहे उत्तर प्रदेश में सरकार की सख्त कार्रवाई ने लोगों के बीच सुरक्षा और प्रशासनिक दृढ़ता की एक धारणा बनाई है। विपक्ष इन कार्रवाइयों की प्रक्रिया और संवैधानिकता को लेकर सवाल उठाता रहा है। लेकिन नितिन श्रीवास्तव का तर्क है कि राजनीतिक रूप से इसका एक दूसरा असर भी हुआ है—इन आलोचनाओं ने योगी की 'सख्त प्रशासक' वाली छवि को और स्पष्ट किया है।
विकास के साथ विरासत को जोड़ने की कोशिश
नितिन श्रीवास्तव के अनुसार, योगी सरकार की राजनीति की एक और खासियत विकास और सांस्कृतिक विरासत को एक साथ प्रस्तुत करना है। एक तरफ जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट, गंगा एक्सप्रेस-वे, बुंदेलखंड एक्सप्रेस-वे और डिफेंस कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं हैं, तो दूसरी ओर अयोध्या का राम मंदिर, काशी विश्वनाथ धाम, मथुरा-वृंदावन और महाकुंभ जैसे सांस्कृतिक केंद्र हैं। नितिन श्रीवास्तव का मानना है कि योगी ने आधुनिक बुनियादी ढांचे और सांस्कृतिक पहचान को एक-दूसरे के विरोध में रखने के बजाय दोनों को अपनी राजनीतिक कथा का हिस्सा बनाया है। उनके मुताबिक, यही वह संयोजन है जिसे दोहराना उन नेताओं के लिए आसान नहीं होगा, जो सांस्कृतिक मुद्दों पर राजनीतिक संकोच महसूस करते हैं।
महिलाओं के बीच सुरक्षा का भरोसा कितना बड़ा फैक्टर?
चुनावों में महिला मतदाताओं को साधने के लिए राजनीतिक दल आर्थिक योजनाओं और विभिन्न तरह की घोषणाओं का सहारा लेते हैं। लेकिन नितिन श्रीवास्तव के मुताबिक महिला सशक्तीकरण को सिर्फ आर्थिक सहायता के नजरिए से नहीं देखा जा सकता। गांवों और छोटे शहरों में महिलाओं का सुरक्षित महसूस करना, बेटियों का स्कूल-कॉलेज जाना और सार्वजनिक स्थानों पर महिलाओं की आवाजाही का भरोसा भी राजनीतिक धारणा को प्रभावित करता है। नितिन श्रीवास्तव का तर्क है कि महिला सुरक्षा को लेकर बनी धारणा योगी सरकार की राजनीतिक पूंजी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हालांकि 2027 में इसका वास्तविक चुनावी प्रभाव कितना होगा, यह मतदाताओं के फैसले पर निर्भर करेगा।
मजबूत नेतृत्व की छवि के सामने विपक्ष की चुनौती
उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविध राज्य में नेतृत्व का चेहरा भी चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। नितिन श्रीवास्तव के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की पहचान एक ऐसे नेता की बनी है जो कठिन और अप्रिय फैसले लेने से पीछे नहीं हटते। लेकिन किसी भी चुनाव की जीत सिर्फ नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होती। सरकार की उपलब्धियों को जमीन तक पहुंचाना, संगठन की सक्रियता, जनसंपर्क और स्थानीय समस्याओं का समाधान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। अतीत की उपलब्धियां भविष्य की गारंटी नहीं होतीं। 2027 का चुनाव सरकार के कामकाज, संगठन की ताकत, स्थानीय मुद्दों, विपक्ष की रणनीति और जनता के बदलते मूड समेत कई व्यावहारिक मानदंडों पर तय होगा।
असली सवाल: क्या विपक्ष दे पाएगा इस मॉडल का विकल्प?
नितिन श्रीवास्तव के मुताबिक, 2027 के विधानसभा चुनाव में विपक्ष के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा के चुनावी संगठन से मुकाबले की नहीं होगी। उसे योगी आदित्यनाथ की उस राजनीतिक छवि का भी जवाब देना होगा, जो सुरक्षा, सख्त प्रशासन, विकास और सांस्कृतिक विरासत के मेल से बनी है। जातीय समीकरण चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाए रखेंगे, लेकिन सवाल यह है कि क्या वे इस व्यापक राजनीतिक छवि का प्रभाव पूरी तरह काट पाएंगे? यही उत्तर प्रदेश की आगामी चुनावी राजनीति का 'यक्ष प्रश्न' है। इसका उत्तर 2027 में मतदाता देंगे।
(नोट- यह लेखक के निजी विचार हैं।)
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