1 परिवार, 5 सांसद और मुख्यमंत्री की वो भविष्यवाणी! जानें यूपी की सभी पार्टियों का 'कुनबा तंत्र'
1 परिवार, 5 सांसद और मुख्यमंत्री की वो भविष्यवाणी! जानें यूपी की सभी पार्टियों का 'कुनबा तंत्र' आशुतोष सहाय के संपादन के साथ संवाददाता अखिलेश्वर पांडेय की स्पेशल रिपोर्ट... By ETV Bharat Uttar Pradesh Team Published : Se…

सौजन्य से:- etvbharat.com
1 परिवार, 5 सांसद और मुख्यमंत्री की वो भविष्यवाणी! जानें यूपी की सभी पार्टियों का 'कुनबा तंत्र'
आशुतोष सहाय के संपादन के साथ संवाददाता अखिलेश्वर पांडेय की स्पेशल रिपोर्ट...
By ETV Bharat Uttar Pradesh Team
Published : September 11, 2026 at 6:15 PM IST
लखनऊ: उत्तर प्रदेश की सियासत में 'परिवारवाद' का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा है कि जिस पार्टी में एक ही परिवार के पांच सांसद हों, उसका हश्र जनता पार्टी जैसा होना तय है. मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद यूपी की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है.
सवाल यह है कि क्या वाकई परिवारवाद की वजह से जनता पार्टी खत्म हुई थी और क्या समाजवादी पार्टी भी उसी रास्ते पर जा सकती है?
जनता पार्टी से सपा की तुलना कितनी सही: यह बहस सिर्फ एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है. देश की राजनीति में लगभग हर बड़े दल में किसी न किसी रूप में राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी रही है. क्षेत्रीय दलों में परिवारवाद की चर्चा ज्यादा होती है, लेकिन राष्ट्रीय पार्टियां भी इससे पूरी तरह अछूती नहीं रही हैं. ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या परिवारवाद किसी राजनीतिक दल के कमजोर होने और टूटने की वजह बन सकता है?
भारत की राजनीति में जनता पार्टी का इतिहास इस बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है. 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाया था, जिसका कई विपक्षी दलों ने विरोध किया. इसी विरोध के बीच कई राजनीतिक दल एकजुट हुए और 1977 में जनता पार्टी का गठन हुआ. इस गठबंधन में भारतीय जनसंघ, कांग्रेस (ओ), भारतीय लोक दल और समाजवादी धारा से जुड़े कई नेता शामिल हुए.
आपातकाल के विरोध से सत्ता तक पहुंची जनता पार्टी: 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी को बड़ी जीत मिली. 542 लोकसभा सीटों में से पार्टी ने 298 सीटों पर जीत दर्ज की. कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई और मोरारजी देसाई देश के पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री बने. जनता पार्टी की इस जीत को भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा गया.
जनता पार्टी के गठन के पीछे आपातकाल का विरोध एक बड़ा कारण था. 1971 के रायबरेली चुनाव को लेकर राज नारायण ने इंदिरा गांधी के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी थी. 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के चुनाव को लेकर फैसला दिया, जिसके बाद राजनीतिक संकट और गहरा गया. इसके बाद आपातकाल लागू हुआ, प्रेस सेंसरशिप शुरू हुई और राजनीतिक गतिविधियों पर कई तरह की पाबंदियां लगीं.
अलग-अलग विचारधाराओं का गठबंधन बनी थी जनता पार्टी: आपातकाल के खिलाफ अलग-अलग विचारधाराओं के नेता एक मंच पर आए. लेकिन सत्ता में आने के बाद इन दलों और नेताओं के बीच मतभेद सामने आने लगे. समाजवादी नेता मधु लिमये ने जनता पार्टी के भीतर जनसंघ से जुड़े नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका को लेकर सवाल उठाए. यही विवाद आगे चलकर जनता पार्टी के लिए बड़ी चुनौती बना.
जनता पार्टी के भीतर यह सवाल लगातार उठता रहा कि एक ही पार्टी में अलग-अलग संगठनों और विचारधाराओं से जुड़े नेता कैसे साथ काम करेंगे. चंद्रशेखर समेत कई नेताओं ने इस विवाद को सुलझाने की कोशिश की. 19 मार्च 1980 को जनता पार्टी के संसदीय बोर्ड ने अपने पदाधिकारियों के आरएसएस की रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल होने को लेकर फैसला लिया. इसके बाद भारतीय जनसंघ से जुड़े नेताओं ने अलग राजनीतिक रास्ता अपनाया.
जनता पार्टी से निकला बीजेपी का रास्ता: 6 अप्रैल 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी को भारतीय जनसंघ से अलग बने नए राजनीतिक संगठन का अध्यक्ष चुना गया. इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. चुनाव आयोग ने भी अलग-अलग गुटों के दावों पर विचार किया. इस तरह जनता पार्टी के भीतर का राजनीतिक संकट और गहरा गया.
बाद के वर्षों में जनता पार्टी और जनता दल की राजनीति कई हिस्सों में बंटती चली गई. जनता दल से जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय लोक दल, समता पार्टी और कई अन्य राजनीतिक दलों का जन्म हुआ. चंद्रशेखर ने भी जनता दल से अलग होकर अपनी सरकार बनाई, हालांकि उनकी सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी. इस तरह जनता पार्टी की मूल राजनीतिक संरचना धीरे-धीरे खत्म हो गई.
क्या जनता पार्टी का अंत परिवारवाद से हुआ था: यही वह बिंदु है, जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बयान को लेकर राजनीतिक बहस शुरू होती है. योगी का इशारा समाजवादी पार्टी में यादव परिवार के प्रभाव की ओर है. उनका तर्क है कि जब किसी पार्टी में एक परिवार का वर्चस्व बढ़ता है तो दूसरे नेताओं में असंतोष पैदा हो सकता है. यही असंतोष भविष्य में पार्टी के टूटने की वजह बन सकता है.
लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक विजय शंकर पंकज इस तुलना को सही नहीं मानते. उनका कहना है कि 1977 में बनी जनता पार्टी मूल रूप से कई राजनीतिक दलों और विचारधाराओं का गठबंधन थी. उस समय पार्टी के सामने परिवारवाद का सवाल नहीं था. उनके मुताबिक जनता पार्टी में टूट की मुख्य वजह अलग-अलग विचारधाराओं और नेताओं के बीच मतभेद थे.
राजनीतिक विश्लेषक बोले- जनता पार्टी और सपा की स्थिति अलग: विजय शंकर पंकज का कहना है कि समाजवादी पार्टी में परिवारवाद जरूर है, लेकिन जनता पार्टी की तुलना परिवारवाद के आधार पर करना सही नहीं है. उनका मानना है कि क्षेत्रीय दलों में परिवार का प्रभाव ज्यादा दिखाई देता है. राष्ट्रीय लोक दल, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और कई अन्य क्षेत्रीय दलों में राजनीतिक परिवारों की मजबूत भूमिका रही है.
विजय शंकर पंकज के मुताबिक कांग्रेस में भी राजनीतिक परिवार का प्रभाव रहा है, लेकिन पार्टी ने कई बार परिवार से बाहर के नेताओं को भी बड़े पद दिए हैं. उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी में भी राजनीतिक परिवारों से आने वाले नेता हैं, लेकिन उनके मुताबिक पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में केवल परिवार के आधार पर सर्वोच्च पद हासिल करना आसान नहीं है. इसी आधार पर वह अलग-अलग दलों में परिवारवाद की प्रकृति को अलग मानते हैं.
यूपी में परिवारवाद का राजनीतिक गणित: परिवारवाद को लेकर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स यानी ADR की रिपोर्ट भी चर्चा में है. रिपोर्ट के मुताबिक उत्तर प्रदेश के विधायक, सांसद, एमएलसी और राज्यसभा सदस्यों में करीब 23 प्रतिशत का राजनीतिक पारिवारिक बैकग्राउंड रहा है. आंकड़ों के अनुसार 535 पुरुष जनप्रतिनिधियों में 112 का राजनीतिक परिवार से संबंध बताया गया है. महिलाओं में यह अनुपात और अधिक है.
रिपोर्ट के मुताबिक 69 महिला जनप्रतिनिधियों में 29 यानी करीब 42 प्रतिशत का राजनीतिक परिवार से संबंध रहा है. उत्तर प्रदेश में 91 विधायक अपने परिवार की राजनीतिक विरासत से जुड़े बताए गए हैं. इसके अलावा करीब 50 सांसद, एमएलसी और राज्यसभा सदस्य भी राजनीतिक परिवारों से जुड़े हैं. ये आंकड़े यूपी की राजनीति में परिवार की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं.
सपा में परिवारवाद का मुद्दा सबसे ज्यादा चर्चा में: पार्टीवार आंकड़ों की बात करें तो बीजेपी के 53 विधायक और 24 सांसद, एमएलसी या राज्यसभा सदस्य राजनीतिक परिवारों से जुड़े बताए गए हैं. अपना दल (सोनेलाल) के भी कुछ जनप्रतिनिधियों की राजनीतिक पृष्ठभूमि पारिवारिक रही है. समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव समेत कई सांसद और विधायक राजनीतिक परिवारों से आते हैं. कांग्रेस में भी कई ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार पहले से राजनीति में रहे हैं.
सपा को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा उसके विधायकों की राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि को लेकर है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सपा के 37 सांसदों में 15 और 37 विधायकों में 32 का राजनीतिक परिवार से संबंध बताया गया है. यानी विधायकों के मामले में यह अनुपात करीब 89 प्रतिशत बैठता है. यही आंकड़ा बीजेपी समेत दूसरे दलों को सपा पर परिवारवाद के मुद्दे पर हमला करने का मौका देता है.
कौन-कौन से नेता राजनीतिक परिवारों से आए: उत्तर प्रदेश और देश की राजनीति में कई ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार पहले से राजनीति में रहे हैं. इनमें कांग्रेस के राहुल गांधी, उज्ज्वल रमण सिंह, इमरान मसूद और तनुज पुनिया शामिल हैं. समाजवादी पार्टी में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, आदित्य यादव, अक्षय यादव, जिया उर रहमान, अफजाल अंसारी और रामगोपाल यादव जैसे नाम शामिल हैं. राष्ट्रीय लोक दल के जयंत चौधरी भी राजनीतिक परिवार से आते हैं.
बीजेपी में पंकज सिंह, दिनेश प्रताप सिंह और जितिन प्रसाद जैसे नेताओं की राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि रही है. अपना दल (सोनेलाल) के आशीष पटेल भी राजनीतिक परिवार से आते हैं. इसका मतलब यह है कि परिवारवाद का सवाल किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है. अंतर सिर्फ इतना है कि अलग-अलग दलों में परिवार की भूमिका और संगठन में उसका प्रभाव अलग-अलग दिखाई देता है.
सपा बोली- परिवारवाद अब बड़ा मुद्दा नहीं: समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक बाजपेई परिवारवाद के आरोपों को खारिज करते हैं. उनका कहना है कि आज के समय में परिवारवाद कोई बड़ा राजनीतिक मुद्दा नहीं है और जनता अपने जनादेश से नेताओं को चुनती है. उन्होंने बीजेपी के कई नेताओं के परिवारों का उदाहरण देते हुए कहा कि परिवार से राजनीति में आने वाले नेता सिर्फ विपक्ष में नहीं हैं.
अभिषेक बाजपेई का कहना है कि बीजेपी अपने काम और उपलब्धियों पर चर्चा करने के बजाय परिवारवाद, हिंदू-मुस्लिम जैसे मुद्दों को सामने लाती है. उन्होंने बेरोजगारी, महंगाई, पेपर लीक और युवाओं के मुद्दे उठाए. उनका कहना है कि वह खुद सैफई के नहीं हैं और फिर भी अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी है. उनके मुताबिक इससे साफ है कि सपा में सिर्फ परिवार के लोगों को ही आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलता.
कांग्रेस ने भी बीजेपी पर लगाए परिवारवाद के आरोप: कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता संजय सिंह ने भी बीजेपी पर पलटवार किया. उनका कहना है कि परिवारवाद का मुद्दा बीजेपी विपक्ष पर हमला करने के लिए उठाती है. उन्होंने राजनाथ सिंह, ओम प्रकाश राजभर और दूसरे नेताओं के परिवारों का उदाहरण देते हुए कहा कि राजनीति और सार्वजनिक जीवन में राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी कई दलों में है. उनके मुताबिक बीजेपी को पहले अपने भीतर झांकना चाहिए.
संजय सिंह का आरोप है कि बीजेपी महंगाई, रोजगार और आम लोगों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय विपक्ष के परिवारों को निशाना बनाती है. उनका कहना है कि अगर परिवारवाद गलत है तो यह नियम सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से लागू होना चाहिए. उन्होंने कहा कि सिर्फ विपक्ष के नेताओं के परिवारों पर सवाल उठाना राजनीतिक रूप से उचित नहीं है. कांग्रेस के मुताबिक चुनाव में जनता को मुद्दों और काम के आधार पर फैसला करना चाहिए.
छोटे दल भी परिवारवाद के आरोपों से नहीं बचे: राष्ट्रीय अधिकार मोर्चा प्रमुख अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि परिवारवाद लगभग सभी पार्टियों में मौजूद है. उनका सवाल है कि अगर किसी नेता के बच्चे राजनीति में हैं तो सिर्फ विपक्षी दलों के परिवारों को निशाना क्यों बनाया जाए. उन्होंने बीजेपी समेत कई दलों में राजनीतिक परिवारों की मौजूदगी का जिक्र किया. उनके मुताबिक कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए.
अलंकार अग्निहोत्री का कहना है कि सिर्फ किसी राजनीतिक परिवार में पैदा हो जाना और चुनाव लड़ने का टिकट मिल जाना परिवारवाद है. दूसरी तरफ अगर किसी व्यक्ति का परिवार राजनीति में है लेकिन वह अपनी मेहनत और क्षमता से आगे बढ़ता है तो इसे अलग नजरिए से देखना चाहिए. उनके मुताबिक राजनीतिक दलों को परिवार और व्यक्ति से ऊपर जनता के मुद्दों को रखना चाहिए. यही लोकतंत्र की असली कसौटी है.
अमिताभ ठाकुर बोले- परिवार नहीं, उम्मीदवार की क्षमता देखे जनता: आजाद अधिकार सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमिताभ ठाकुर का कहना है कि परिवारवाद को लेकर बहस से ज्यादा जरूरी यह देखना है कि चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार कैसा है. उनके मुताबिक लगभग सभी पार्टियां अपने समर्थकों और उनसे जुड़े लोगों को टिकट देती हैं. कई बार एक ही परिवार के कई लोगों को टिकट भी मिलता है. लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए कि चुना गया व्यक्ति जनता की समस्याओं के लिए कितना काम करता है.
अमिताभ ठाकुर के मुताबिक राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए. उन्होंने कहा कि चुनाव जीतने के बाद धन, ताकत और सत्ता का दुरुपयोग सबसे बड़ी समस्या है. ऐसे में सिर्फ परिवारवाद पर बहस करने के बजाय जनता को उम्मीदवार के काम और छवि पर ध्यान देना चाहिए. उनके मुताबिक अच्छा जनप्रतिनिधि किसी परिवार से आए या किसी दूसरे सामाजिक वर्ग से, उसकी क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण है.
बीजेपी ने परिवारवाद को अलग तरह से परिभाषित किया: अमिताभ ठाकुर का कहना है कि भारतीय राजनीति में व्यक्तिवादी, परिवारवादी और विचार आधारित पार्टियां दिखाई देती हैं. उनके मुताबिक बीजेपी खुद को विचार आधारित और राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में पेश करती है. उनका कहना है कि परिवारवाद तब माना जाना चाहिए जब एक ही परिवार के कई सदस्य पार्टी के महत्वपूर्ण पदों और जनप्रतिनिधि की भूमिकाओं पर लगातार कब्जा कर लें. सिर्फ किसी राजनीतिक परिवार में पैदा होना अपने आप में पर्याप्त आधार नहीं है.
उनके मुताबिक अगर किसी परिवार में डॉक्टर का बेटा मेहनत करके परीक्षा पास करता है और डॉक्टर बनता है तो उसे परिवारवाद नहीं कहा जा सकता. इसी तरह किसी राजनीतिक परिवार का बच्चा अपनी योग्यता और मेहनत के आधार पर राजनीति में आगे बढ़ता है तो उसके मामले को अलग तरीके से देखना चाहिए. लेकिन अगर सिर्फ परिवार की पहचान के कारण टिकट और पद मिलते रहें तो यह परिवारवाद की श्रेणी में आता है. यही अंतर राजनीतिक बहस का अहम हिस्सा है.
क्या परिवारवाद क्षेत्रीय दलों की मजबूरी है: क्षेत्रीय दलों के सामने एक अलग तरह की राजनीतिक चुनौती होती है. इन पार्टियों का संगठन अक्सर किसी एक नेता या परिवार के इर्द-गिर्द मजबूत होता है. ऐसे में परिवार के सदस्यों को पार्टी में आगे लाना संगठनात्मक निरंतरता का एक तरीका भी माना जाता है. लेकिन यही व्यवस्था लंबे समय में दूसरे नेताओं में असंतोष पैदा कर सकती है.
समाजवादी पार्टी में भी समय-समय पर नेताओं के नाराज होने और पार्टी छोड़ने की घटनाएं सामने आई हैं. बीजेपी इसे परिवारवाद की कमजोरी के तौर पर पेश करती है. सपा का कहना है कि पार्टी में परिवार के बाहर के नेताओं को भी सम्मान और जिम्मेदारी मिलती है. इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी के भीतर परिवार और संगठन के बीच संतुलन कैसे बना रहता है.
क्या सपा का हश्र जनता पार्टी जैसा होगा: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान इसी राजनीतिक संभावना की ओर इशारा करता है. उनका कहना है कि जिस तरह जनता पार्टी के भीतर मतभेद बढ़े और पार्टी टूट गई, उसी तरह सपा में भी परिवार के वर्चस्व से असंतोष बढ़ सकता है. अगर ऐसा हुआ तो पार्टी कमजोर हो सकती है. हालांकि यह एक राजनीतिक आकलन है और इसका जवाब आने वाला समय ही देगा.
जनता पार्टी के इतिहास को देखें तो उसके टूटने की वजह सिर्फ एक परिवार का वर्चस्व नहीं था. अलग-अलग राजनीतिक दलों की विचारधारा, नेतृत्व संघर्ष और आरएसएस से जुड़े विवाद जैसे कई कारण इसके पीछे थे. वहीं सपा का संगठन एक अलग राजनीतिक और सामाजिक आधार पर खड़ा है. इसलिए दोनों पार्टियों के भविष्य की तुलना करते समय इन अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है.
यूपी की सियासत में परिवारवाद बनाम विकास के मुद्दे: उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा नया नहीं है. चुनाव के समय राजनीतिक दल अक्सर एक-दूसरे के परिवारों और राजनीतिक विरासत पर सवाल उठाते रहे हैं. लेकिन मतदाताओं के सामने बेरोजगारी, महंगाई, कानून-व्यवस्था, विकास और रोजगार जैसे मुद्दे भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यही मुद्दे किसी भी चुनाव के नतीजे को प्रभावित कर सकते हैं.
अब सवाल यह है कि क्या परिवारवाद का नैरेटिव जनता के बीच बड़ा असर पैदा करेगा. क्या सपा के लिए परिवारवाद राजनीतिक कमजोरी बनेगा या पार्टी अपने संगठन और सामाजिक गठजोड़ के दम पर इसे चुनौती देगी. दूसरी तरफ बीजेपी और कांग्रेस समेत दूसरे दलों के भीतर मौजूद राजनीतिक परिवारों को लेकर भी सवाल उठेंगे. आखिरकार जनता किसे चुनती है, इसका फैसला परिवारवाद से ज्यादा उम्मीदवार, मुद्दों और जमीनी प्रदर्शन के आधार पर हो सकता है.
परिवारवाद की बहस का अंतिम सवाल: उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवारवाद को लेकर बहस आने वाले समय में और तेज हो सकती है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता पार्टी का उदाहरण देकर इस बहस को ऐतिहासिक संदर्भ दे दिया है. विपक्षी दल इस तुलना को खारिज करते हुए बीजेपी और दूसरे दलों में मौजूद राजनीतिक परिवारों का उदाहरण दे रहे हैं. यानी फिलहाल परिवारवाद पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है.
असल सवाल यह नहीं है कि किस पार्टी में कितने राजनीतिक परिवार हैं, बल्कि यह है कि क्या किसी पार्टी में परिवार की मौजूदगी संगठन और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर रही है. अगर परिवार के साथ-साथ दूसरे नेताओं को भी आगे बढ़ने का मौका मिलता है तो राजनीतिक दल ज्यादा मजबूत रह सकता है. लेकिन अगर पार्टी का पूरा संगठन एक ही परिवार तक सीमित हो जाए तो असंतोष की संभावना बढ़ सकती है. यूपी की सियासत में अब देखना यही होगा कि जनता परिवारवाद की बहस को कितना महत्व देती है और बेरोजगारी, महंगाई, विकास तथा कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे चुनावी फैसले पर कितना असर डालते हैं.
समाजवादी पार्टी का 'सैफई कुनबा':
- अखिलेश यादव: पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री (दिवंगत मुलायम सिंह यादव के पुत्र).
- डिंपल यादव: मैनपुरी से सांसद (अखिलेश यादव की पत्नी).
- शिवपाल सिंह यादव: जसवंतनगर से विधायक और सपा के वरिष्ठ नेता (मुलायम सिंह के भाई).
- रामगोपाल यादव: राज्यसभा सांसद और पार्टी के मुख्य रणनीतिकार (मुलायम सिंह के चचेरे भाई).
- धर्मेंद्र यादव: आजमगढ़ से सांसद (मुलायम सिंह के भतीजे).
- अक्षय यादव: फिरोजाबाद से सांसद (रामगोपाल यादव के पुत्र).
- आदित्य यादव: बदायूं से सांसद (शिवपाल सिंह यादव के पुत्र).
कांग्रेस में वंशवाद 'रायबरेली-अमेठी केंद्रित':
- सोनिया गांधी: राज्यसभा सांसद (पार्टी के निर्णयों में अहम भूमिका), राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की मां.
- राहुल गांधी: रायबरेली से सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (गांधी-नेहरू परिवार की पांचवीं पीढ़ी).
- प्रियंका गांधी वाड्रा: पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव, केरल के वायनाड से लोकसभा सांसद और प्रमुख चेहरा (राहुल गांधी की बहन).
बहुजन समाज पार्टी - 'उत्तराधिकारी मॉडल':
- मायावती: बसपा प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री
- आनंद: पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष (मायावती के भाई, आकाश आनंद के पिता)
- आकाश आनंद: बसपा के मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक और मायावती के घोषित राजनीतिक उत्तराधिकारी (मायावती के भतीजे).
- ईशान आनंद: मायावती के भतीजे, आनंद के बेटे और आकाश आनंद के भाई. (मायावती की मीटिंग के मंचों पर नजर आने लगे हैं. दो बार ऐसा हो चुका है. जल्द एक्टिव पॉलिटिक्स में आने की उम्मीद से इंकार नहीं)
भाजपा और एनडीए सहयोगी दल: भाजपा खुद को कैडर-बेस्ड बताती है, लेकिन टिकट वितरण और सहयोगी दलों के स्तर पर परिवारवाद की यहां भी गहरी पैठ है.
अपना दल (सोनेलाल): अनुप्रिया पटेल (केंद्रीय मंत्री और सोनेलाल पटेल की बेटी) पार्टी प्रमुख हैं. उनके पति आशीष पटेल यूपी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. मां कृष्णा पटेल और बहन पल्लवी पटेल की अपनी पार्टी अपना दल कमेरवादी है. पल्लवी पटेल विधायक हैं.
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा): ओम प्रकाश राजभर (कैबिनेट मंत्री) पार्टी प्रमुख हैं. उनके बेटे अरविंद राजभर और अरुण राजभर पार्टी के शीर्ष पदों पर हैं.
निषाद पार्टी: संजय निषाद (यूपी सरकार में मंत्री) पार्टी प्रमुख हैं. उनके एक बेटे सांसद रह चुके हैं. पार्टी में बड़े पद पर हैं. दूसरे बेटे श्रवण निषाद विधायक हैं.
भाजपा के आंतरिक उदाहरण: राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह (नोएडा से विधायक और यूपी भाजपा उपाध्यक्ष), रीता बहुगुणा जोशी के बेटे मयंक जोशी (जिन्होंने बाद में पाला बदला), और स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी संघमित्रा मौर्य (पूर्व भाजपा सांसद) जैसे कई उदाहरण यूपी भाजपा के अंदर भी दिखते हैं.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में परिवारवाद का मुद्दा नया नहीं है, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जनता पार्टी का उदाहरण देकर इस बहस को एक नया ऐतिहासिक मोड़ दे दिया है. हकीकत यह है कि कोई भी दल इस 'कुनबा तंत्र' से पूरी तरह अछूता नहीं है. अब देखना दिलचस्प होगा कि क्या जनता वाकई इस नैरेटिव से प्रभावित होती है या फिर ज़मीनी मुद्दे जैसे बेरोजगारी, महंगाई और विकास इस चुनावी जंग का रुख तय करेंगे.
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