काशी से जेवर तक: उत्तर प्रदेश की टेक्नोक्रांति: प्रोफेसर पुनीत कुमार बोले- एक लाख करोड़ का आईटी-आईटीईएस निर्यात मंजिल नहीं, एक पड़ाव है
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सौजन्य से:- Dainik Bhaskar
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काशी से जेवर तक: उत्तर प्रदेश की टेक्नोक्रांति:प्रोफेसर पुनीत कुमार बोले- एक लाख करोड़ का आईटी-आईटीईएस निर्यात मंजिल नहीं, एक पड़ाव है
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काशी के रुद्राक्ष इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर में आबे मेमोरियल कॉरिडोर का उद्घाटन सिर्फ एक स्मृति को सम्मान देने का अवसर नहीं था। इसे थोड़ा व्यापक नजरिए से देखें तो यह उत्तर प्रदेश की बदलती आर्थिक और तकनीकी तस्वीर का भी एक प्रतीक है।
काशी में जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की स्मृति, जेवर में सेमीकंडक्टर इकाई, यमुना एक्सप्रेसवे के किनारे प्रस्तावित जापान सिटी और लखनऊ में एआई व आईटी का विस्तार- इन सबको एक साथ रखें तो एक ऐसा उत्तर प्रदेश दिखाई देता है, जो सिर्फ बाजार नहीं रहना चाहता, बल्कि उत्पादन और तकनीक का केंद्र बनने की कोशिश कर रहा है। यही बदलाव सबसे महत्वपूर्ण है। जिस प्रदेश की पहचान लंबे समय तक उसकी विशाल आबादी और बड़े उपभोक्ता बाजार से होती थी, वहां अब निर्यात, विनिर्माण, चिप, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईटी और स्टार्टअप की चर्चा बढ़ रही है। यानी आर्थिक भूगोल बदल रहा है और उसके साथ प्रदेश की भूमिका भी।
उपभोक्ता से उत्पादक बनने की यात्रा
उपभोक्ता वह है जो किसी दूसरे के बनाए उत्पाद को खरीदता है। उत्पादक वह है जो पहल करता है, जोखिम लेता है और अपने श्रम, कौशल और तकनीक से मूल्य पैदा करता है। उत्तर प्रदेश की चुनौती लंबे समय तक यही रही कि यहां प्रतिभा और बाजार दोनों थे, लेकिन बड़े पैमाने पर आधुनिक तकनीकी उत्पादन का इकोसिस्टम सीमित था। प्रदेश के युवा बेहतर अवसरों के लिए दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहरों की ओर जाते थे। अब तस्वीर पूरी तरह बदल गई है, ऐसा कहना शायद जल्दबाजी होगी, लेकिन दिशा जरूर बदलती दिखाई दे रही है। आंकड़े इसका एक संकेत देते हैं।
वित्तीय वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश से आईटी और आईटीईएस का निर्यात पहली बार एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचकर 1,01,970 करोड़ रुपये हुआ। 2020-21 में यह 48,004 करोड़ रुपये था। यानी पांच साल में निर्यात दोगुने से ज्यादा हुआ। एसटीपीआई इकाइयों से निर्यात 25,642 करोड़ से बढ़कर 52,778 करोड़ रुपये और एसईजेड से 22,362 करोड़ से बढ़कर 49,192 करोड़ रुपये हुआ। यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है। निर्यात का अर्थ है कि प्रदेश में बनी सेवा या उत्पाद के लिए दुनिया भुगतान कर रही है। इसलिए एक लाख करोड़ का आंकड़ा उत्तर प्रदेश की तकनीकी अर्थव्यवस्था के आकार में आए बदलाव को समझने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है।
लखनऊ से नोएडा तक बन रहा तकनीकी गलियारा
आईटी का विस्तार अब सिर्फ नोएडा तक सीमित रखने की कोशिश नहीं है। लखनऊ में आईबीएम, जेनपैक्ट और टेलीपरफॉर्मेंस जैसी कंपनियों की मौजूदगी ने राजधानी के आईटी इकोसिस्टम को विस्तार दिया है। राज्य सरकार की मौजूदा योजनाओं में लखनऊ को एआई और उभरती तकनीकों के केंद्र के रूप में विकसित करने की महत्वाकांक्षा भी शामिल है।
एचसीएलटेक ने लखनऊ में आईटी सिटी के दूसरे चरण की शुरुआत की है। करीब 500 करोड़ रुपये के निवेश वाले इस विस्तार से लगभग 6 हजार रोजगार अवसरों की उम्मीद जताई गई है। कंपनी ने 1,000 छात्रों को एआई प्रशिक्षण देने की योजना भी बताई है। इसका महत्व केवल एक कंपनी या एक कैंपस तक सीमित नहीं है। जब किसी शहर में कंपनियां आती हैं, तो उनके साथ प्रशिक्षण संस्थान, छोटे आपूर्तिकर्ता, स्टार्टअप, सेवा क्षेत्र और नई नौकरियां भी आती हैं। तकनीक का इकोसिस्टम इसी तरह बनता है।
मोबाइल से मॉड्यूल और अब माइक्रोचिप तक
उत्तर प्रदेश की टेक्नोलॉजी कहानी का अगला बड़ा अध्याय इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर है। राज्य सरकार के अनुसार, उत्तर प्रदेश देश में उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स का सबसे बड़ा निर्यातक है। राज्य में देश के करीब 40 प्रतिशत मोबाइल का विनिर्माण होता है और देश की 55 प्रतिशत मोबाइल कंपोनेंट विनिर्माण इकाइयां उत्तर प्रदेश में संचालित हैं। लेकिन असली बदलाव असेंबली से आगे बढ़ने में है। जेवर के पास एचसीएल-फॉक्सकॉन की सेमीकंडक्टर इकाई को 3,706 करोड़ रुपये के निवेश से मंजूरी मिली है। यह इकाई डिस्प्ले ड्राइवर चिप का उत्पादन करेगी और इसकी प्रस्तावित क्षमता 3.6 करोड़ यूनिट प्रतिमाह है। यानी यात्रा मोबाइल फोन बनाने से चिप बनाने तक पहुंच रही है। यही वह बदलाव है जो किसी विनिर्माण अर्थव्यवस्था को अगली सीढ़ी पर ले जाता है।
लखनऊ की एआई महत्वाकांक्षा
तकनीक की यह कहानी सिर्फ हार्डवेयर तक सीमित नहीं है। लखनऊ को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर, साइबर सुरक्षा और उभरती कंप्यूटिंग तकनीकों के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजना भी इसी दिशा का हिस्सा है। राज्य सरकार ने अगले कुछ वर्षों में लखनऊ में 50 विश्वस्तरीय एआई स्टार्टअप विकसित करने का लक्ष्य रखा है। प्रदेश में स्टार्टअप इकोसिस्टम भी तेजी से विस्तार कर रहा है। इन्वेस्ट यूपी के अनुसार राज्य में 12 हजार से ज्यादा डीपीआईआईटी-मान्यता प्राप्त स्टार्टअप और 8 यूनिकॉर्न का इकोसिस्टम मौजूद है। इसका मतलब यह है कि टेक्नोक्रांति केवल बड़ी फैक्ट्रियों से नहीं आएगी। इसका एक हिस्सा विश्वविद्यालयों, कोडिंग लैब, स्टार्टअप और युवा उद्यमियों के जरिए भी बनेगा।
जापान के साथ रिश्ते अब तकनीक और निवेश तक
यहीं काशी और जेवर की कहानी एक-दूसरे से जुड़ती है। काशी में आबे मेमोरियल कॉरिडोर भारत-जापान के उस रिश्ते की स्मृति है, जिसे नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे के दौर में नई गहराई मिली। लेकिन यह रिश्ता अब सिर्फ कूटनीति और सांस्कृतिक संबंधों तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश इसे निवेश, तकनीक, कौशल और विनिर्माण से जोड़ने की कोशिश कर रहा है।
फरवरी 2026 में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जापान और सिंगापुर यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार 1.5 लाख करोड़ रुपये के एमओयू और 2.5 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव सामने आए। इसी निवेश पहल में यीडा क्षेत्र में करीब 500 एकड़ में जापान सिटी विकसित करने की योजना भी सामने आई।
जापान डेस्क को मुख्यमंत्री कार्यालय की सीधी निगरानी में मजबूत करने की योजना और तकनीक हस्तांतरण, कौशल विकास तथा एमएसएमई क्षेत्र में साझेदारी पर जोर इसी रणनीति का हिस्सा है। काशी में बनी दोस्ती अगर जेवर और यीडा के औद्योगिक गलियारे तक पहुंचती है, तो यह सिर्फ शहरों के बीच संबंध नहीं, बल्कि संस्कृति से तकनीक और तकनीक से कारोबार तक बनता हुआ एक आर्थिक पुल है।
एक लाख करोड़ मंजिल नहीं, अगला पड़ाव है
टेक्नोक्रांति का मतलब केवल बड़े निवेश की घोषणा या कुछ बड़ी कंपनियों का आ जाना नहीं है। असली कसौटी यह होगी कि इन परियोजनाओं से कितने स्थानीय युवाओं को उच्च गुणवत्ता के रोजगार मिलते हैं, कितनी तकनीक प्रदेश में आती है, कितने स्थानीय उद्यम आपूर्ति श्रृंखला का हिस्सा बनते हैं और कितना उत्पादन दुनिया के बाजार तक पहुंचता है। इसलिए एक लाख करोड़ रुपये का आईटी-आईटीईएस निर्यात मंजिल नहीं, एक पड़ाव है। आगे की चुनौती इससे कई गुना बड़ी है।
जेवर की चिप इकाई, लखनऊ की एआई महत्वाकांक्षा, नोएडा का इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम, यीडा की प्रस्तावित जापा सिटी और काशी के रुद्राक्ष में बना आबे मेमोरियल कॉरिडोर—ये अलग-अलग परियोजनाएं जरूर हैं, लेकिन इन्हें एक साथ देखने पर उत्तर प्रदेश की बदलती दिशा दिखाई देती है। एक ऐसा प्रदेश, जो केवल दुनिया के उत्पादों का बड़ा बाजार नहीं बनना चाहता, बल्कि दुनिया के लिए उत्पाद और तकनीक बनाने वाला राज्य बनने की कोनशिश कर रहा है। यही इस टेक्नोक्रांति की सबसे बड़ी कहानी है। (नोट- ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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