यूपी में बीजेपी ने मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर क्यों किया भरोसा? - BBC News हिंदी
यूपी में बीजेपी ने मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर क्यों किया भरोसा? राज्यसभा की 12 सीटों के लिए आगामी 16 अक्तूबर को चुनाव होने हैं. इनमें सबसे अधिक 10 सीटें उत्तर प्रदेश की हैं. छह अक्तूबर को नामा…

सौजन्य से:- bbc.com
यूपी में बीजेपी ने मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों पर क्यों किया भरोसा?
राज्यसभा की 12 सीटों के लिए आगामी 16 अक्तूबर को चुनाव होने हैं. इनमें सबसे अधिक 10 सीटें उत्तर प्रदेश की हैं. छह अक्तूबर को नामांकन दाख़िल करने की आख़िरी तारीख़ है.
इससे ठीक एक दिन पहले, पांच अक्तूबर को बीजेपी ने उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए अपने आठ उम्मीदवारों के नाम का ऐलान कर दिया.
हालांकि, उम्मीदवारों के नाम सामने आने से पहले बीजेपी की संभावित सूची को लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे.
मीडिया में स्मृति ईरानी, कुमार विश्वास, संजीव बालियान, हरीश द्विवेदी, कौशल किशोर और राजवीर सिंह जैसे नाम चर्चा में थे.
पार्टी के भीतर करीब 20 नामों पर विचार किए जाने की भी खबरें थीं. लेकिन आधिकारिक सूची में ये नाम नहीं थे. बीजेपी ने यूपी से अपने मौजूदा सात राज्यसभा सांसदों में से किसी एक को भी इस सूची में जगह नहीं दी है.
ये सात सांसद हैं, हरदीप सिंह पुरी, बीएल वर्मा, अरुण सिंह, सीमा द्विवेदी, नीरज शेखर, बृजलाल और गीता शाक्य.
हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा मोदी कैबिनेट में मंत्री भी हैं.
इसके अलावा, पूर्व उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा की खाली हुई सीट भी इस चुनाव में शामिल है. दिनेश शर्मा ने सितंबर में अंडमान-निकोबार के उपराज्यपाल बनाए जाने के बाद राज्यसभा से इस्तीफा दिया था.
बीजेपी ने यूपी की अपनी सभी आठ सीटों के लिए नए उम्मीदवार उतारे हैं. पार्टी इसे एक रूटीन वर्क बताती है.
बीजेपी के राकेश त्रिपाठी के मुताबिक, पार्टी अपने कार्यकर्ताओं की भूमिका समय और जरूरत के हिसाब से तय करती है. वह कहते हैं कि इस सूची में संगठन में लंबे समय से काम करने वाले नेताओं के साथ-साथ अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों से आने वाले लोगों को भी जगह दी गई है.
राकेश त्रिपाठी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी को बताया, "इस बार जिन लोगों को राज्यसभा के लिए चुना गया है, उनमें लंबे राजनीतिक और संगठनात्मक अनुभव वाले नेता भी हैं और ऐसे चेहरे भी हैं, जिनका अनुभव विधानसभा या लोकसभा की राजनीति का नहीं रहा है."
"धर्मपाल सिंह कई बार विधायक और प्रदेश सरकार में मंत्री रहे हैं, प्रकाश पाल लंबे समय से संगठन में हैं और ओबीसी मोर्चे के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. इसी तरह विद्यासागर सोनकर पहले सांसद और विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं, प्रियंका रावत लोकसभा की पूर्व सांसद हैं और राम प्रताप सिंह चौहान संगठन में लंबे समय से काम कर रहे हैं. गोपी कृष्ण पांडेय जैसे नेता भी वर्षों से पार्टी के संगठन से जुड़े रहे हैं."
"यानी पार्टी ने सोच-विचार और अलग-अलग स्तर पर परामर्श के बाद यह तय किया है कि किस कार्यकर्ता को किस समय कौन सी भूमिका देनी है."
कौन हैं ये आठ नए चेहरे?
लेकिन सवाल यही है कि क्या यह फैसला सिर्फ बीजेपी के अनुभवी और संगठन से जुड़े कार्यकर्ताओं को राज्यसभा भेजने तक सीमित है?
या इसके पीछे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए बड़ा सामाजिक और जातीय संदेश भी है?
इसे समझने के लिए पहले देखना होगा कि बीजेपी ने जिन आठ चेहरों को चुना है, वे कौन हैं और किस सामाजिक या क्षेत्रीय आधार का प्रतिनिधित्व करते हैं.
धर्मपाल सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में पशुधन मंत्री और बरेली की आंवला सीट से विधायक हैं. वह लोध समुदाय से आते हैं.
प्रकाश पाल उत्तर प्रदेश बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष हैं और इससे पहले कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के क्षेत्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं.
श्रुति गंगवार बीजेपी के वरिष्ठ नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की बेटी हैं. वह बरेली की अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक की चेयरपर्सन और सामाजिक कार्यकर्ता हैं. श्रुति गंगवार भी ओबीसी समुदाय से आती हैं.
विद्यासागर सोनकर बीजेपी के प्रमुख दलित नेताओं में गिने जाते हैं. वह लोकसभा सांसद और विधान परिषद सदस्य रह चुके हैं और पार्टी में प्रदेश महामंत्री की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं.
राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के वरिष्ठ अधिवक्ता हैं और दो बार बार एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके हैं.
गोपी कृष्ण पांडेय लंबे समय से बीजेपी संगठन से जुड़े रहे हैं और पार्टी के वरिष्ठ संगठनकर्ता माने जाते हैं.
प्रियंका सिंह रावत बाराबंकी से लोकसभा की पूर्व सांसद हैं और बीजेपी की महिला नेताओं में प्रमुख नाम हैं. वहीं, राम प्रताप सिंह चौहान आगरा की एत्मादपुर सीट से पूर्व विधायक हैं और फिलहाल उत्तर प्रदेश बीजेपी के प्रदेश महामंत्री हैं.
सामाजिक प्रतिनिधित्व के लिहाज से बीजेपी की सूची में तीन ओबीसी, दो दलित और तीन सामान्य वर्ग के उम्मीदवार हैं. इनमें दो ब्राह्मण और एक राजपूत हैं. दो महिलाएं भी इस सूची में शामिल हैं.
क्षेत्रीय स्तर पर भी पश्चिमी यूपी, रुहेलखंड, कानपुर-बुंदेलखंड और पूर्वांचल को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश दिखाई देती है.
यूपी चुनाव को ध्यान में रखकर लिया गया फ़ैसला
यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक इस सूची को सिर्फ राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों के चयन के तौर पर नहीं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की सामाजिक रणनीति के हिस्से के तौर पर भी देख रहे हैं.
वरिष्ठ पत्रकार मुदित माथुर बताते हैं, "बीजेपी ने जिस तरह अलग-अलग पिछड़ी जातियों और दूसरे सामाजिक समूहों को प्रतिनिधित्व दिया है, उसके पीछे यूपी के विधानसभा चुनाव की तैयारी दिखाई देती है."
उनका कहना है कि बीजेपी ने 2014 से 2017 के बीच जिस सामाजिक समीकरण के जरिए गैर-यादव पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ा था, उसमें ऐसे समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना अहम था.
मुदित माथुर ने बताया, "अब जब इन समुदायों के बीच बीजेपी को लेकर कुछ दूरी या असंतोष के संकेत दिखाई दे रहे हैं, तो राज्यसभा की यह सूची उस सामाजिक समीकरण को फिर से मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखी जा सकती है."
वरिष्ठ पत्रकार निस्तुल्ला हेब्बार का विश्लेषण भी इसी दिशा में है.
हेब्बार ने बताया, "उम्मीदवारों की सूची में संगठन के साथ-साथ जातीय और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व पर ध्यान दिया गया है. ख़ासकर गैर-यादव ओबीसी और दलित समुदायों को प्रतिनिधित्व देकर बीजेपी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने सामाजिक गठबंधन को मजबूत रखने का प्रयास करती दिखती है. साथ ही, नए लोगों को मौका देकर कार्यकर्ताओं में यह संदेश देने की कोशिश है कि पार्टी में सबके लिए जगह है."
उत्तर प्रदेश की सियासत पर नज़र रखने वाले क्राइस्ट कॉलेज, कानपुर के पूर्व प्रोफ़ेसर डॉ. एके वर्मा को लगता है कि बीजेपी ने जो क़दम उठाए, उसकी तीन वजहें हैं.
"सबसे पहले बीजेपी शायद यह सिग्नल देना चाहती है कि राज्यसभा की सीट पर किसी का एकाधिकार नहीं है. मतलब ऐसा नहीं कि जो मौजूदा सांसद हैं, उन्हीं को कंटिन्यू करने का राइट है."
डॉ. एके वर्मा कहते हैं, "दूसरी बात है कि पार्टी इंक्लूसिव अप्रोच अपनाना चाहती है. और इंक्लूसिव अप्रोच का मतलब यह है कि बहुत सारे वे लोग जो कि पार्टी के संगठन में काम करते रहे हैं और मेन स्ट्रीम में नहीं आए हैं, उनको मेन स्ट्रीम में लाने की भावना है."
"तीसरी चीज़ यह लगती है कि पार्टी सोशल प्रोफाइल को बैलेंस करना चाहती है ताकि कह सके कि हर जाति-धर्म के लोग इसमें आए हैं. युवाओं को ख़ास रूप से प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गई है."
हरदीप पुरी और बीएल वर्मा को मौक़ा क्यों नहीं?
इस पूरी सूची का एक अहम पहलू यह भी है कि बीजेपी ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा, दोनों को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजने का फ़ैसला किया है.
दोनों का राज्यसभा कार्यकाल 25 नवंबर 2026 को समाप्त हो रहा है. पुरी 2018 में राज्यसभा पहुंचे थे और 2020 में दोबारा चुने गए थे.
पुरी के राज्यसभा में दोबारा नहीं भेजे जाने के बाद उनके भविष्य को लेकर अटकलें जरूर शुरू हो गई हैं. हालांकि, इसे सीधे तौर पर उन्हें पार्टी में किनारे किए जाने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी. बीजेपी के भीतर यह संभावना भी देखी जा रही है कि उन्हें आगे किसी दूसरी जिम्मेदारी में रखा जा सकता है.
बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी भी इसी ओर इशारा करते हैं.
उनका कहना है, "बीजेपी में हमने कई नेताओं को अलग-अलग भूमिकाओं में काम करते देखा है. उदाहरण के तौर पर डॉ. दिनेश शर्मा पहले उपमुख्यमंत्री रहे, फिर उन्हें राज्यसभा भेजा गया और अब उन्हें उपराज्यपाल की जिम्मेदारी दी गई है. इसलिए किसी नेता को राज्यसभा का टिकट नहीं मिलने का मतलब यह नहीं है कि उसकी राजनीतिक भूमिका खत्म हो गई. हरदीप पुरी और बीएल वर्मा की आगे क्या भूमिका होगी, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
BBC World Service के नए ऐप को डाउनलोड करें
BBC News हिन्दी को चुनें और पाइए न्यूज़ अलर्ट, लाइव टीवी, पॉडकास्ट... सब एक जगह
कृपया नोट करें: नया ऐप ब्रिटेन और अमेरिका में उपलब्ध नहीं है.
Powered by CM Sarkar Geeta Reporter
संबंधित ख़बरें

राज्यसभा चुनाव का यूपी इलेक्शन से कनेक्शन! CM योगी ने कर दिया बड़ा दावा

लखनऊ में RMLNLU का पांचवां दीक्षांत समारोह 17 अक्टूबर को: CM योगी होंगे मुख्य अतिथि, 260 स्टूडेंट्स-रिसर्चर को मिलेंगी उपाधियां - Lucknow News

उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव में दो निर्दलीय प्रत्याशियों के नामांकन रद, नतीजे की तस्वीर हो गई साफ - up rajya sabha polls two independent nominations rejected


